यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥ ८ ॥
śarīraṃ yadvāpnoti gṛhītvaitāni saṃyāti
yaccāpyutkrāmatīśvaraḥ .
vāyurgandhānivāśayāt .. 8 ..
जब यह देहादि-संघात का स्वामी जीवात्मा शरीर को छोड़कर जाता है, तब (इनको) आकर्षित करता है। पहले और इस श्लोक के अर्थ की संगति के वश से श्लोक के दूसरे पाद की व्याख्या पहले की गयी है।
तथा जब यह जीवात्मा, पहले शरीर से (निकलकर) दूसरे शरीर को पाता है, तब मन सहित इन छः इन्द्रियों को साथ लेकर जाता है।
कैसे लेकर जाता है ? सो बतलाते हैं—जैसे वायु गन्ध के स्थानों से यानी पुष्पादि से गन्ध को लेकर जाता है, वैसे ही ॥ ८ ॥
वे (मन सहित छः इन्द्रियाँ) कौन-सी हैं?
तात्पर्य पढ़ें
यत् च अपि यदा च अपि उत्क्रामति ईश्वरो देहादिसङ्घातस्वामी जीवः तदा कर्षति इति श्लोकस्य द्वितीयपादः अर्थवशात् प्राथम्येन सम्बध्यते।
यदा च पूर्वस्मात् शरीरात् शरीरान्तरम् अवाप्नोति तदा गृहीत्वा एतानि मनःषष्ठानि इन्द्रियाणि संयाति सम्यग् याति गच्छति।
किम् इव इति आह वायुः पवनो गन्धान् इव आशयात् पुष्पादेः ॥ ८ ॥
कानि पुनः तानि इति—