दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥ १ ॥
abhayaṃ sattvasaṃśuddhirjñānayogavyavasthitiḥ .
dānaṃ damaśca yajñaśca svādhyāyastapa ārjavam .. 1 ..
अभय—निर्भयता, सत्त्वसंशुद्धि—अन्तःकरण की शुद्धि व्यवहार में दूसरे के साथ ठगाई, कपट और झूठ आदि अवगुणों को छोड़कर शुद्ध भाव से आचरण करना।
ज्ञान और योग में निरन्तर स्थिति—शास्त्र और आचार्य से आत्मादि पदार्थों को जानना ‘ज्ञान’ है और उन जाने हुए पदार्थों का इन्द्रियादि के निग्रह से (प्राप्त) एकाग्रता द्वारा अपने आत्मा में प्रत्यक्ष अनुभव कर लेना ‘योग’ है। उन ज्ञान और योग दोनों में स्थिति अर्थात् स्थिर हो जाना—तन्मय हो जाना, यही प्रधान सात्त्विकी—दैवी संपद है।
और भी जिन अधिकारियों की जिस विषय में जो सात्त्विकी प्रकृति हो सकती है वह कही जाती है—
दान—अपनी शक्ति के अनुसार अन्नादि वस्तुओं का विभाग करना।
दम—बाह्य इन्द्रियोंका संयम। अन्त:करणकी उपरामता तो शान्ति के नामसे आगे कही जायगी।
यज्ञ—अग्निहोत्रादि श्रौतयज्ञ और देवपूजनादि स्मार्तयज्ञ।
स्वाध्याय—अदृष्टलाभ के लिये ऋक् आदि वेदों का अध्ययन करना।
तप—शारीरिक आदि तप जो आगे बतलाया जायगा और आर्जव अर्थात् सदा सरलता सीधापन ॥ १ ॥
तात्पर्य पढ़ें
अभयम् अभीरुता सत्त्वसंशुद्धिः सत्त्वस्य अन्तःकरणस्य संव्यवहारेषु परवञ्चनमायानृता-दिपरिवर्जनं शुद्धभावेन व्यवहार इत्यर्थः ।
ज्ञानयोगव्यवस्थितिः ज्ञानं शास्त्रत आचार्यतः च आत्मादिपदार्थानाम् अवगमः अवगतानाम् इन्द्रियाद्युपसंहारेण एकाग्रतया स्वात्मसंवेद्यता- पादनं योगः तयोः ज्ञानयोगयोः व्यवस्थितिः व्यवस्थानं तन्निष्ठता एषा प्रधाना दैवी सात्त्विकी सम्पत् ।
यत्र च येषाम् अधिकृतानां या प्रकृतिः सम्भवति सात्त्विकी सा उच्यते—
दानं यथाशक्ति संविभागः अन्नादीनाम् ।
दमः च बाह्यकरणानाम् उपशमः अन्तःकरणस्य उपशमं शान्तिं वक्ष्यति।
यज्ञः च श्रौतः अग्निहोत्रादिः, स्मार्तः च देवयज्ञादिः ।
स्वाध्याय ऋग्वेदाद्यध्ययनम् अदृष्टार्थम् ।
तपो वक्ष्यमाणं शरीरादि, आर्जवम् ऋजुत्वं सर्वदा ॥ १ ॥