अध्याय 16 - श्लोक 3

किं च—
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता ।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥ ३ ॥

kiṃ ca—
tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā .
bhavanti sampadaṃ daivīmabhijātasya bhārata .. 3 ..


तेज—प्रागल्भ्य (तेजस्विता), चमड़ीकी चमक नहीं। क्षमा-गाली दी जाने या ताड़ना दी जानेपर भी अन्तःकरणमें विकार उत्पन्न न होना। उत्पन्न हुए विकारको शान्ति कर देना तो पहले अक्रोधके नामसे कह चुके हैं। क्षमा और अक्रोधका इतना ही भेद है।

धृति—शरीर और इन्द्रियादिमें थकावट उत्पन्न होनेपर, उस थकावटको हटानेवाली जो अन्त:करणकी वृत्ति है, उसका नाम ‘धृति’ है, जिसके द्वारा उत्साहित की हुई इन्द्रियाँ और  शरीर कार्यमें नहीं थकते।

शौच—दो प्रकार की शुद्धि, अर्थात् मिट्टी और जल आदिसे बाहरकी शुद्धि, एवं कपट और रागादिकी कालिमाका अभाव होकर मन-बुद्धिकी निर्मलतारूप भीतरकी शुद्धि, इस प्रकार दो तरहकी शुद्धि।

अद्रोह—दूसरेका घात करनेकी इच्छाका अभाव, यानी हिंसा न करना।

अतिमानिता का अभाव—अत्यन्त मानका नाम अतिमान है, वह जिसमें हो वह अतिमानी है, उसका भाव अतिमानिता है, उसका जो अभाव है वह ‘नातिमानिता’ है, अर्थात् अपनेमें अतिशय पूज्य भावनाका न होना।

हे भारत! ‘अभय’ से लेकर यहाँतकके ये सब लक्षण, सम्पत्ति युक्त उत्पन्न हुए पुरुष में होते हैं। कैसी सम्पत्ति से युक्त पुरुष में होते हैं? जो दैवी सम्पत्तिको साथ लेकर उत्पन्न हुआ है, अर्थात् जो देवताओंकी विभूतिका योग्य पात्र है और भविष्यमें जिसका कल्याण होना निश्चित है, उस पुरुषके ये लक्षण होते हैं ॥ ३ ॥

अब आगे आसुरी सम्पत्ति कही जाती है—

तात्पर्य पढ़ें

तेजः प्रागल्भ्यं न त्वग्गता दीप्तिः, क्षमा आक्रुष्टस्य ताडितस्य वा अन्तर्विक्रियानुत्पत्तिः

उत्पन्नायां विक्रियायां प्रशमनम् अक्रोध इति अवोचाम, इत्थं क्षमाया अक्रोधस्य च विशेषः ।

धृतिः देहेन्द्रियेषु अवसादं प्राप्तेषु तस्य

प्रतिषेधकः अन्तःकरणवृत्तिविशेषो येन उत्तम्भितानि करणानि देहः च न अवसीदन्ति।

शौचं द्विविधं मृज्जलकृतं बाह्यम् आभ्यन्तरं

च मनोबुद्धयोः नैर्मल्यं मायारागादिकालुष्याभाव-एवं द्विविधं शौचम्।

अद्रोहः परजिघांसाभावः अहिंसनम् ।

नातिमानिता अत्यर्थं मानः अतिमानः स यस्य विद्यते सः अतिमानी तद्भावः अतिमानिता तदभावो नातिमानिता आत्मनः पूज्यतातिशय-भावनाभाव इत्यर्थः ।

भवन्ति अभयादीनि एतदन्तानि सम्पदम्

अभिजातस्य किंविशिष्टां सम्पदम्, दैवीं देवानां

सम्पदम् अभिलक्ष्य जातस्य दैवविभूत्यर्हस्य

भाविकल्याणस्य इत्यर्थो हे भारत ॥ ३ ॥

अथ इदानीम् आसुरी सम्पद् उच्यते—