मा शुचः सम्पदं दैवीमभिजातोऽसि पाण्डव ॥ ५ ॥
daivī sampadvimokṣāya nibandhāyāsurī matā .
mā śucaḥ sampadaṃ daivīmabhijāto’si pāṇḍava .. 5 ..
जो दैवी सम्पत्ति है, वह तो संसार-बन्धन से मुक्त करने के लिये है, तथा आसुरी और राक्षसी सम्पत्ति निःसन्देह बन्धन के लिये मानी गयी है। निश्चित बन्धन का नाम निबन्ध है, उसके लिये मानी गयी है।
इतना कहने के उपरान्त अर्जुन के अन्त:करण में यह संशययुक्त विचार उत्पन्न हुआ देखकर कि ‘क्या मैं आसुरी सम्पत्ति से युक्त हूँ अथवा दैवी सम्पत्ति से’ भगवान् बोले—
हे पाण्डव! शोक मत कर, तू दैवी सम्पत्ति को लेकर उत्पन्न हुआ है। अर्थात् भविष्य में तेरा कल्याण होनेवाला है ॥ ५ ॥
तात्पर्य पढ़ें
दैवी सम्पद् या सा विमोक्षाय संसारबन्धनात्, निबन्धाय नियतो बन्धो निबन्धः तदर्थम् आसुरी सम्पद् मता अभिप्रेता तथा राक्षसी ।
तत्र एवम् उक्ते अर्जुनस्य अन्तर्गतं भावं किम्, अहम् आसुरसम्पद्युक्तः किं वा दैवसम्पद्युक्त इति एवम् आलोचनारूपम् आलक्ष्य आह भगवान्—
मा शुचः शोकं मा कार्षीः सम्पदं दैवीम् अभिजातः असि अभिलक्ष्य जातः असि भावि-कल्याणः त्वम् असि इत्यर्थो हे पाण्डव ॥ ५ ॥