दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु ॥ ६ ॥
dvau bhūtasargau loke’smindaiva āsura eva ca.
daivo vistaraśaḥ prokta āsuraṃ pārtha me śṛṇu .. 6 ..
इस संसारमें मनुष्यों की दो सृष्टियाँ हैं। जिसकी रचना की जाय वह सृष्टि है, अतः दैवी सम्पत्ति और आसुरी सम्पत्ति से युक्त रचे हुए प्राणी ही यहाँ भूत-सृष्टिके नामसे कहे जाते हैं।
‘प्रजापतिकी दो संतानें हैं देव और असुर’ इस श्रुतिसे भी यही बात सिद्ध होती है। क्योंकि इस संसारमें सभी प्राणियों के दो प्रकार हो सकते हैं।
प्राणियों की वे दो प्रकारकी सृष्टियाँ कौन-सी हैं ? इसपर कहते हैं कि इस प्रकरणमें कही हुई दैवी और आसुरी।
कही हुई दोनों सृष्टियों का पुनः अनुवाद करनेका कारण बतलाते हैं—
दैवी सृष्टिका वर्णन तो ‘अभयं सत्त्वसंशुद्धिः’ इत्यादि श्लोकों द्वारा, विस्तारपूर्वक किया गया। परंतु आसुरी सृष्टिका वर्णन विस्तारसे नहीं हुआ। अतः हे पार्थ! उसका त्याग करनेके लिये, उस आसुरी सृष्टिको, तू मुझसे—मेरे वचनोंसे विस्तारपूर्वक सुन, यानी सुनकर निश्चय कर ॥ ६ ॥
इस अध्याय की समाप्तिपर्यन्त प्राणियों के विशेषणों द्वारा आसुरी सम्पत्ति दिखलायी जाती है, क्योंकि प्रत्यक्ष कर लेनेसे ही उसका त्याग करना बन सकता है—
तात्पर्य पढ़ें
द्वौ द्विसङ्ख्याकौ भूतसर्गौ भूतानां मनुष्याणां सर्गौ सृष्टी भूतसर्गौ सृज्येते इति सर्गौ भूतानि एव सृज्यमानानि दैवासुरसम्पद्युक्तानि द्वौ भूतसर्गौ इति उच्येते ।
‘द्वयो ह प्राजापत्या देवाश्चासुराश्च’ (बृह० उ० १। ३। १) इति श्रुतेः लोके अस्मिन् संसारे इत्यर्थः। सर्वेषां द्वैविध्योपपत्तेः।
कौ तौ भूतसर्गौ इति, उच्येते प्रकृतौ एव
दैव आसुर एव च।
उक्तयोः एव पुनरनुवादे प्रयोजनम् आह—
दैवी भूतसर्गः ‘अभयं सत्त्वसंशुद्धिः’ इत्यादिना विस्तरशो विस्तरप्रकारैः प्रोक्तः कथितो न तु आसुरो विस्तरशः अतः तत्परिवर्जनार्थम् आसुरं पार्थ मे मम वचनाद् उच्यमानं विस्तरशः शृणु अवधारय ॥ ६ ॥
आ अध्याय परिसमाप्तेः आसुरी सम्पत् प्राणिविशेषणत्वेन प्रदर्श्यते प्रत्यक्षीकरणेन च शक्यते अस्याः परिवर्जनं कर्तुम् इति—