अध्याय 17 - श्लोक 15

अनुद्धेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ १५ ॥

anuddhegakaraṃ vākyaṃ satyaṃ priyahitaṃ ca yat.
svādhyāyābhyasanaṃ caiva vāṅmayaṃ tapa ucyate.. 15 ..


जो वचन किसी प्राणी के अन्तःकरणमें उद्वेग-दुःख उत्पन्न करनेवाले नहीं हैं, तथा जो सत्य, प्रिय और हितकारक हैं; अर्थात् इस लोक और परलोकमें सर्वत्र हित करनेवाले हैं, यहाँ ‘उद्वेग न करनेवाले’ इत्यादि लक्षणोंसे वाक्य को विशेषित किया गया है और ‘च’ शब्द सब लक्षणोंका समुच्चय बतलानेके लिये है (अतः समझना चाहिये कि) दूसरेको किसी बातका बोध करानेके लिये कहे हुए वाक्यमें यदि सत्यता, प्रियता, हितकारिता और अनुद्विग्नता—इन सबका अथवा इनमेंसे किसी एक, दो या तीनका अभाव हो तो वह वाणीसम्बन्धी तप नहीं है।

जैसे सत्य वाक्य यदि अन्य एक, दो या तीन गुणोंसे हीन हो तो वह वाणीका तप नहीं है, वैसे ही प्रिय वचन भी यदि अन्य एक, दो या तीन गुणोंसे हीन हो तो वह वाणीसम्बन्धी तप नहीं है, तथा हितकारक वचन भी यदि अन्य एक, दो या तीन गुणोंसे हीन हो तो वह वाणीका तप नहीं है।

पू०—तो फिर वह वाणीका तप कौन-सा है?

उ०—जो वचन सत्य हो और उद्वेग करनेवाला न हो तथा प्रिय और हितकर भी हो, वह वाणीसम्बन्धी परम तप है। जैसे, ‘हे वत्स! तू शान्त हो स्वाध्याय और योगमें स्थित हो, इससे तेरा कल्याण होगा इत्यादि वचन हैं तथा यथाविधि स्वाध्यायका अभ्यास करना भी वाणीसम्बन्धी तप कहा जाता है ॥ १५ ॥

तात्पर्य पढ़ें

अनुद्वेगकरं प्राणिनाम् अदुःखकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् प्रियहिते दृष्टादृष्टार्थे ।

अनुद्वेगकरत्वादिभिः धर्मैः वाक्यं विशेष्यते ।

विशेषणधर्मसमुच्चयार्थः च शब्दः । परप्रत्याय-

नार्थं प्रयुक्तस्य वाक्यस्य सत्यप्रियहितानुद्वेग-

करत्वानाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा हीनता स्याद् यदि न तद् वाङ्मयं तपः।

यथा सत्यवाक्यस्य इतरेषाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा हीनतायां न वाङ्मयतपस्त्वम् । तथा प्रियवाक्यस्य अपि इतरेषाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा हीनस्य न वाङ्मयतपस्त्वम् । तथा हितवाक्यस्य अपि इतरेषाम् अन्यतमेन द्वाभ्यां त्रिभिः वा वियुक्तस्य न वाङ्मयतपस्त्वम् ।

किं पुनः तत् तपः,

यत् सत्यं वाक्यम् अनुद्वेगकरं प्रियहितं च यत् तत् परमं तपो वाङ्मयम् । यथा शान्तो भव वत्स स्वाध्यायं योगं च अनुतिष्ठ तथा ते श्रेयो भविष्यति । स्वाध्यायाभ्यसनं च एव यथाविधि वाङ्मयं तप उच्यते ॥ १५ ॥