सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्र्वम् ॥ १८ ॥
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्र्वम् ॥ १८ ॥
satkāramānapūjārthaṃ tapo dambhena caiva yat.
kriyate tadiha proktaṃ rājasaṃ calamadhrvam .. 18 ..
जो तप सत्कार, मान और पूजा के लिये किया जाता है—यह बड़ा श्रेष्ठ पुरुष है, तपस्वी है, ब्राह्मण है। इस प्रकार जो बड़ाई की जाती है उसका नाम सत्कार है। (आते देखकर) खड़े हो जाना तथा प्रणाम आदि करना—ऐसे सम्मान का नाम मान है। पैर धोना, अर्चन करना, भोजन कराना इत्यादि का नाम पूजा है। इन सबके लिये जो तप किया जाता है और जो दम्भ से किया जाता है, वह तप यहाँ राजसी कहा गया है। तथा अनिश्चित फल वाला होने से नाशवान् और अनित्य भी कहा गया है ॥ १८ ॥
तात्पर्य पढ़ें
सत्कारमानपूजार्थं सत्कारः साधुकारः साधुः अयं तपस्वी ब्राह्मण इति एवम् अर्थं मानो माननं प्रत्युत्थानाभिवादनादिः तदर्थं पूजा पादप्रक्षालनार्चनाशयितृत्वादिः तदर्थं च तपः सत्कारमानपूजार्थं दम्भेन च एव यत् क्रियते तपः तद् इह प्रोक्तं कथितं राजसं चलं कादा-चित्कफलत्वेन अध्रुवम् ॥ १८ ॥