अध्याय 17 - श्लोक 2

श्रीभगवानुवाच—
त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु ॥ २ ॥

śrībhagavānuvāca—
trividhā bhavati śraddhā dehināṃ sā svabhāvajā .
sāttvikī rājasī caiva tāmasī ceti tāṃ śṛṇu .. 2 ..


जिस निष्ठा के विषय में तू पूछता है, मनुष्यों की वह स्वभावजन्य श्रद्धा अर्थात् जन्मान्तर में किये हुए धर्म-अधर्म आदिके जो संस्कार मृत्यु के समय प्रकट हुआ करते हैं उनके समुदाय का नाम स्वभाव है, उससे उत्पन्न हुई श्रद्धा—तीन प्रकार की होती है। सत्त्वगुण से उत्पन्न हुई देवपूजादिविषयक श्रद्धा सात्त्विकी है, रजोगुण से उत्पन्न हुई यक्ष-राक्षसादिकी पूजाविषयक श्रद्धा राजसी है और तमोगुण से उत्पन्न हुई प्रेत-पिशाच आदिकी पूजाविषयक श्रद्धा तामसी है। ऐसे तीन प्रकार की श्रद्धा होती है। उस आगे कही जानेवाली (तीन प्रकार की) श्रद्धा को तू सुन ॥ २ ॥

वह श्रद्धा इस तरह तीन प्रकार की होती है—

तात्पर्य पढ़ें

त्रिविधा त्रिप्रकारा भवति श्रद्धा । यस्यां निष्ठायां त्वं पृच्छसि देहिनां सा स्वभावजा जन्मान्तरकृतो धर्मादिसंस्कारो मरणकाले अभिव्यक्तः स्वभाव उच्यते ततो जाता स्वभावजा । सात्त्विकी सत्त्वनिर्वृता देवपूजादिविषया, राजसी रजोनिर्वृता यक्षरक्षःपूजादिविषया, तामसी तमोनिर्वृता प्रेतपिशाचादिपूजाविषया एवं त्रिविधा ताम् उच्यमानां श्रद्धा शृणु ॥ २ ॥

सा एवं त्रिविधा भवति—