कर्म चैव तदर्थीयं सदित्येवाभिधीयते ॥ २७ ॥
yajñe tapasi dāne ca sthitiḥ saditi cocyate .
karma caiva tadarthīyaṃ sadityevābhidhīyate .. 27 ..
जो यज्ञकर्म में स्थिति है, जो तप में स्थिति है और जो दान में स्थिति है, वह भी ‘सत् है’ ऐसा विद्वानों द्वारा कहा जाता है। तथा उन यज्ञादि के लिये जो कर्म है अथवा जिसके तीन नामों का प्रकरण चल रहा है, उस ईश्वर के लिये जो कर्म है, वह भी ‘सत् है’ यही कहा जाता है। इस प्रकार किये हुए यज्ञ और तप आदि कर्म, यदि असात्त्विक और विगुण हों तो भी श्रद्धापूर्वक परमात्मा के तीनों नामों के प्रयोग से सगुण और सात्त्विक बना लिये जाते हैं ॥ २७ ॥
क्योंकि सभी जगह श्रद्धा की प्रधानता से ही सब कुछ किया जाता है, इसलिये—
तात्पर्य पढ़ें
यज्ञे यज्ञकर्मणि या स्थितिः तपसि च या स्थितिः दाने च या स्थितिः सा च सद् इति उच्यते विद्वद्भिः कर्म च एव तदर्थीयम् अथवा यस्य अभिधानत्रयं प्रकृतं तदर्थीयं यज्ञदान-तपोऽर्थीयम् ईश्वरार्थीयम् इति एतत् । सद् इति एव अभिधीयते । तद् एतद् यज्ञतप-आदिकर्म असात्त्विकं विगुणम् अपि श्रद्धापूर्वकं ब्रह्मणः अभिधानत्रयप्रयोगेण सगुणं सात्त्विकं सम्पादितं भवति ॥ २७ ॥
तत्र च सर्वत्र श्रद्धा प्रधानतया सर्वं सम्पाद्यते यस्मात् तस्मात्—