मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ ६ ॥
karśayantaḥ śarīrasthaṃ bhūtagrāmamacetasaḥ .
māṃ caivāntaḥśarīrasthaṃ tānviddhyāsuraniścayān .. 6 ..
वे अविवेकी मनुष्य, शरीर में स्थित इन्द्रियादि करणों के रूप में परिणत भूतसमुदाय को और शरीर के भीतर अन्तरात्मारूप से स्थित, उनके कर्म और बुद्धिके साक्षी, मुझ ईश्वर को भी, कृश (तंग) करते हुए—मेरी आज्ञा को न मानना ही मुझे कृश करना है, इस प्रकार मुझे कृश करते हुए (घोर तप करते हैं) उनको तू आसुरी निश्चयवाले जान। जिनका असुरों का-सा निश्चय हो, वे आसुरी निश्चयवाले कहलाते हैं। उनका सङ्ग त्याग करने के लिये तू उनको जान, यह उपदेश है ॥ ६ ॥
रसयुक्त और स्निग्ध आदि भोजनों में, अपनी रुचिकी अधिकतारूप लक्षण से अपना सात्त्विकत्व, राजसत्व और तामसत्व जानकर, राजस और तामस चिह्नोंवाले आहार का त्याग और सात्त्विक चिह्नयुक्त आहार का ग्रहण करने के लिये, यहाँ रस्य-स्निग्ध आदि (वाक्यों द्वारा वर्णित) तीन वर्गों में विभक्त हुए आहार में, क्रम से सात्त्विक, राजस और तामस पुरुषों की (पृथक्-पृथक्) रुचि दिखलायी जाती है। वैसे ही सात्त्विक आदि गुणों के भेद से यज्ञादिके भेदों का प्रतिपादन भी यहाँ इसीलिये किया जाता है कि राजस और तामस यज्ञादिको जानकर किसी प्रकार लोग उनका त्याग कर दें और सात्त्विक यज्ञादिका अनुष्ठान किया करें—
तात्पर्य पढ़ें
कर्शयन्तः कृशीकुर्वन्तः शरीरस्थं भूतग्रामं करणसमुदायम् अचेतसः अविवेकिनो मां च एव तत्कर्मबुद्धिसाक्षिभूतम् अन्तःशरीरस्थं कर्शयन्तो मदनुशासनाकरणम् एव मत्कर्शनं तान् विद्धि आसुरनिश्चयान् आसुरो निश्चयो येषां ते आसुरनिश्चयाः तान् परिहरणार्थं विद्धि इति उपदेशः ॥ ६ ॥
आहाराणां च रस्य-स्निग्धादिवर्गत्रयरूपेण भिन्नानां यथाक्रमं सात्त्विकराजसतामसपुरुषप्रियत्वदर्शनम् इह क्रियते । रस्य-स्निग्धादिषु आहारविशेषेषु आत्मनः प्रीत्यतिरेकेण लिङ्गेन सात्त्विकत्वं राजसत्वं तामसत्वं च बुद्ध्वा रजस्तमोलिङ्गानाम् आहाराणां परिवर्जनार्थं सत्त्वलिङ्गानां च उपादानार्थम्, तथा यज्ञादीनाम् अपि सत्त्वादिगुणभेदेन त्रिविधत्वप्रतिपादनम् इह राजसतामसान् बुद्ध्वा कथं नु नाम परित्यजेत् सात्त्विकान् एव अनुतिष्ठेद् इति एवम् अर्थम्—