त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ॥ १ ॥
sannyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum .
tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana .. 1 ..
हे महाबाहो! हे हृषीकेश! हे केशिनिषूदन! मैं संन्यास का अर्थात् संन्यास-शब्द के अर्थ का और त्याग का अर्थात् त्याग-शब्द के अर्थ का तत्त्व—यथार्थ स्वरूप अलग-अलग विभागपूर्वक जानना चाहता हूँ।
भगवान् वासुदेव ने छल से घोड़े का रूप धारण करनेवाले केशि नामक असुर को मारा था, इसलिये वे उस (केशिनिषूदन) नाम से अर्जुन द्वारा सम्बोधित किये गये हैं ॥ १ ॥
पहले अध्यायों में जिनका जगह-जगह निर्देश किया गया है, वे संन्यास और त्याग—दोनों शब्द स्पष्टार्थयुक्त नहीं हैं, इसलिये (उनका स्पष्ट अर्थ जानने की इच्छा से) पूछनेवाले अर्जुन को उनका निर्णय सुनाने के लिये श्रीभगवान् बोले—
तात्पर्य पढ़ें
सन्न्यासस्य सन्न्यासशब्दार्थस्य इति एतद् हे महाबाहो तत्त्वं तस्य भावः तत्त्वं याथात्म्यम् इति एतद् इच्छामि वेदितुं ज्ञातुं त्यागस्य च त्यागशब्दार्थस्य इति एतद् हृषीकेश पृथग् इतरेतरविभागतः । केशिनिषूदन ।
केशिनामा हयच्छद्मा असुरः तं निषूदितवान् भगवान् वासुदेवः तेन तन्नाम्ना सम्बोध्यते अर्जुनेन ॥ १ ॥
तत्र तत्र निर्दिष्टौ सन्न्यासत्यागशब्दौ न निलुण्ठितार्थौ पूर्वेषु अध्यायेषु अतः अर्जुनाय पृष्टवते तन्निर्णयाय—