अध्याय 18 - श्लोक 10

न द्वेष्ट्यकुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।
त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशयः ॥ १० ॥

na dveṣṭyakuśalaṃ karma kuśale nānuṣajjate .
tyāgī sattvasamāviṣṭo medhāvī chinnasaṃśayaḥ .. 10 ..


अकुशल—काम्यकर्मों से (वह) द्वेष नहीं करता अर्थात् काम्यकर्म पुनर्जन्म देनेवाले होनेके कारण संसार के कारण हैं, इनसे मुझे क्या प्रयोजन है, इस प्रकार उससे द्वेष नहीं करता।

कुशल—शुभ-नित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता। अर्थात् अन्तःकरण की शुद्धि, ज्ञानकी उत्पत्ति और उसमें स्थितिके हेतु होनेसे नित्यकर्म मोक्ष के कारण हैं, इस प्रकार उनमें आसक्त नहीं होता। यानी उनमें भी अपना कोई प्रयोजन न देखकर प्रीति नहीं करता।

वह कौन है ? त्यागी, जो कि पूर्वोक्त आसक्ति और फल के त्यागसे सम्पन्न है अर्थात् कर्मोंमें आसक्ति और उनका फल छोड़कर नित्यकर्मों का अनुष्ठान करनेवाला है, ऐसा त्यागी।

ऐसा पुरुष किस अवस्थामें, काम्यकर्मों से द्वेष नहीं करता और नित्यकर्मोंमें आसक्त नहीं होता ? सो कहते हैं—

जब कि वह सात्त्विक भावसे युक्त होता है। अर्थात् आत्म-अनात्म विषयक विवेक-ज्ञानके हेतुस्वरूप सत्त्वगुणसे भरपूर—भली प्रकार व्याप्त होता है।

इसीलिये वह मेधावी है अर्थात् आत्मज्ञान रूप बुद्धिसे युक्त है। मेधावी होनेके कारण ही छिन्नसंशय है—अविद्याजनित संशयसे रहित है। अर्थात् आत्मस्वरूप में स्थित हो जाना ही परम कल्याणका साधन है, और कुछ नहीं, इस निश्चय के कारण संशयरहित हो चुका है।

जो अधिकारी पुरुष, पूर्वोक्त प्रकारसे कर्मयोग के अनुष्ठानद्वारा क्रमसे विशुद्धान्त:करण होकर, जन्मादि विकारोंसे रहित और क्रियारहित आत्माको भली प्रकार अपना स्वरूप समझ गया है, वह ‘समस्त कर्मों को मनसे त्यागकर’ ‘न कुछ करता और न कराता हुआ रहनेवाला’ (आत्मज्ञानी) निष्कर्मतारूप ज्ञाननिष्ठाको भोगता है।

इस प्रकार इस श्लोकद्वारा यह पूर्वोक्त कर्मयोगका फल बतलाया गया है ॥ १० ॥

परंतु जो पुरुष कर्माधिकारी है और शरीर में आत्माभिमान रखनेवाला होनेके कारण देहधारी अज्ञानी है, आत्म विषयक कर्तृत्व-ज्ञान नष्ट न होनेके कारण जो ‘मैं करता हूँ’ ऐसी निश्चित बुद्धिवाला है उससे कर्म का अशेष त्याग होना असम्भव होनेके कारण, उसका कर्मफल त्याग के सहित विहित कर्मों के अनुष्ठानमें ही अधिकार है, उनके त्यागमें नहीं। यह अभिप्राय दिखलानेके लिये कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

न द्वेष्टि अकुशलम् अशोभनं काम्यं कर्म शरीरारम्भद्वारेण संसारकारण किम् अनेन इति एवम्।

कुशले शोभने नित्ये कर्मणि सत्त्वशुद्धि- ज्ञानोत्पत्तितन्निष्ठाहेतुत्वेन मोक्षकारणम् इदम् इति एवं न अनुषज्जते तत्र अपि प्रयोजनम् अपश्यन् अनुषङ्गं प्रीतिं न करोति इति एतत्।

कः पुनः असौ, त्यागी पूर्वोक्तेन सङ्गफल-परित्यागेन तद्वान् त्यागी यः कर्मणि सङ्गं त्यक्त्वा तत्फलं च नित्यकर्मानुष्ठायी स त्यागी।

कदा पुनः असौ, अकुशलं कर्म न द्वेष्टि

कुशले च न अनुषज्जते इति उच्यते—

सत्त्वसमाविष्टो यदा सत्त्वेन आत्मानात्म-विवेकविज्ञानहेतुना समाविष्टः सव्याप्तः संयुक्त इति एतत् ।

अत एव च मेधावी मेधया आत्मज्ञान-लक्षणया प्रज्ञया संयुक्तः तद्वान् मेधावी मेधावित्वाद् एव छिन्नसंशयः छिन्नः अविद्याकृतः संशयो यस्य आत्मस्वरूपावस्थानम् एव परं निःश्रेयससाधन न अन्यत् किञ्चिद् इति एवं निश्चयेन छिन्नसंशयः ।

यः अधिकृतः पुरुषः पूर्वोक्तेन प्रकारेण कर्मयोगानुष्ठानेन क्रमेण संस्कृतात्मा सन् जन्मादिविक्रियारहितत्वेन निष्क्रियम् आत्मानम् आत्मत्वेन सम्बुद्धः, सः ‘सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य’ ‘नैव कुर्वन्न कारयन् आसीनः’ नैष्कर्म्यलक्षणां ज्ञाननिष्ठाम् अश्नुते।

इति एतत् पूर्वोक्तस्य कर्मयोगस्य प्रयोजनम् अनेन श्लोकेन उक्तम् ॥ १० ॥

यः पुनः अधिकृतः सन् देहात्माभिमानि- त्वेन देहभृद् अज्ञः अवाधितात्मकर्तृत्वविज्ञान- तया अहं कर्ता इति निश्चितबुद्धिः तस्य अशेषकर्मपरित्यागस्य अशक्यत्वात् कर्मफल- त्यागेन चोदितकर्मानुष्ठाने एव अधिकारो न तत्त्यागे इति एतम् अर्थं दर्शयितुम् आह—