अध्याय 18 - श्लोक 11

न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११ ॥

na hi dehabhṛtā śakyaṃ tyaktuṃ karmāṇyaśeṣataḥ
yastu karmaphalatyāgī sa tyāgītyabhidhīyate .. 11 ..


देहधारी—देहको धारण करे सो देहधारी, इस व्युत्पत्तिके अनुसार शरीरमें आत्माभिमान रखनेवाला देहभृत् कहा जाता है, विवेकी नहीं। क्योंकि ‘वेदाविनाशिनम्’ इत्यादि श्लोकोंसे वह (विवेकी) कर्तापनके अधिकारसे अलग कर दिया गया है। अतः (यह अभिप्राय समझना चाहिये कि) जिस कारण उस देहधारी-अज्ञानीसे समस्त कर्मोंका पूर्णतया त्याग किया जाना सम्भव नहीं है, इसलिये जो तत्त्वज्ञानरहित अधिकारी, नित्यकर्मोंका अनुष्ठान करता हुआ उन कर्मोंके फलका त्यागी है, अर्थात् कर्मफलकी वासनामात्रको छोड़नेवाला है, वह कर्म करनेवाला होनेपर भी स्तुतिके अभिप्रायसे ‘त्यागी’ कहा जाता है।

सुतरां यह सिद्ध हुआ कि देहात्माभिमानसे रहित परमार्थज्ञानीके द्वारा ही निःशेषभावसे कर्मसंन्यास किया जा सकता है ॥ ११ ॥

सर्व कर्मोंका त्याग करनेसे जो फल होता है, वह क्या है ? इसपर कहते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

न हि यस्माद् देहभृता देहं बिभर्ति इति देहभृद् देहात्माभिमानवान् देहभृद् उच्यते न हि विवेकी स हि ‘वेदाविनाशिनम्’ इत्यादिना कर्तृत्वाधिकाराद् निवर्तितः अतः तेन देहभृता अज्ञेन न शक्यं त्यक्तुं सन्न्यसितुं कर्माणि अशेषतो निःशेषेण। कस्माद् यः तु अज्ञः अधिकृतो नित्यानि कर्माणि कुर्वन् कर्मफलत्यागी कर्मफलाभिसन्धिमात्रसन्न्यासी स त्यागी इति अभिधीयते कर्मी अपि सन् इति स्तुत्यभिप्रायेण।

तस्मात् परमार्थदर्शिना एव अदेहभृता देहात्मभावरहितेन अशेषकर्मसन्न्यासः शक्यते कर्तुम् ॥ ११ ॥

किं पुनः तत् प्रयोजनं यत् सर्वकर्मपरित्यागात् स्याद् इति उच्यते—