अध्याय 18 - श्लोक 12

अनिष्टमिष्टं मिश्रं च त्रिविधं कर्मणः फलम्
भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन्न्यासिनां क्वचित् ॥ १२ ॥

aniṣṭamiṣṭaṃ miśraṃ ca trividhaṃ karmaṇaḥ phalam
bhavatyatyāgināṃ pretya na tu sannyāsināṃ kvacit .. 12 ..


अनिष्ट—नरक और पशु-पक्षी आदि योनिरूप इष्ट—देवयोनिरूप तथा मिश्र—इष्ट और अनिष्ट मिश्रित मनुष्ययोनिरूप, इस प्रकार यह पुण्य-पापरूप कर्मों का फल तीन प्रकार का होता है।

जो पदार्थ बाह्य कर्ता, कर्म, क्रिया आदि अनेक कारकों द्वारा निष्पन्न हुआ हो और बाजीगर की माया के समान, अविद्याजनित, महामोहकारक हो, एवं जीवात्मा के आश्रित-सा प्रतीत होता हो और साररहित होने के कारण तत्काल ही लय—नष्ट हो जाता हो, उसका नाम फल है। यह फल शब्द की व्याख्या है।

ऐसा यह तीन प्रकार का फल, अत्यागियों को अर्थात् परमार्थ संन्यास न करने वाले कर्मनिष्ठ अज्ञानियों को ही, मरने के पीछे मिलता है। केवल ज्ञान निष्ठा में स्थित परमहंस-परिव्राजक वास्तविक संन्यासियों को, कभी नहीं मिलता।

क्योंकि (वे) केवल सम्यग्ज्ञाननिष्ठ पुरुष, संसार के बीजरूप अविद्यादि दोषों का मूलोच्छेद नहीं करते, ऐसा कभी नहीं हो सकता ॥ १२ ॥

इसलिये क्रिया, कारक और फल आदि आत्मा में अविद्या से आरोपित होने के कारण परमार्थदर्शी (आत्माज्ञानी) ही सम्पूर्ण कर्मों का अशेषतः त्यागी हो सकता है। कर्म करने वाले अधिष्ठान (शरीर)

कर्ता-क्रिया आदि कारणों को, आत्मभाव से देखने वाला अज्ञानी, सम्पूर्ण कर्मों का अशेषतः त्याग नहीं कर सकता। यह बात अगले श्लोक से दिखलाते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

अनिष्टं नरकतिर्यगादिलक्षणम् इष्टं देवादिलक्षणं मिश्रम् इष्टानिष्ट संयुक्तं मनुष्यलक्षणं च एवं त्रिविधं त्रिप्रकारं कर्मणो धर्माधर्मलक्षणस्य फलम् ।

बाह्यानेककारकव्यापारनिष्पन्नं सद्

अविद्याकृतम् इन्द्रजालमायोपमं महामोहकरं

प्रत्यगात्मोपसर्पि इव फल्गुतया लयम् अदर्शनं गच्छति इति फलम् इति फलनिर्वचनम् ।

तद् एतद् एवं लक्षणं फलं भवति अत्यागिनाम् अज्ञानां कर्मिणाम् अपरमार्थसन्न्यासिनां प्रेत्य शरीरपाताद् ऊर्ध्वम् । न तु परमार्थसन्न्यासिनाम् परमहंसपरिव्राजकानां केवलज्ञाननिष्ठानां क्वचित् ।

न हि केवलसम्यग्दर्शननिष्ठा अविद्यादि-संसारबीजं न उन्मूलयन्ति कदाचिद् इत्यर्थः ॥ १२ ॥

अतः परमार्थदर्शिन एव अशेषकर्मसन्न्यासित्वं सम्भवति अविद्याध्यारोपितत्वाद् आत्मनि क्रियाकारकफलानां न तु अज्ञस्य अधिष्ठानादीनि

क्रियाकर्तृणि कारकाणि आत्मत्वेन पश्यतः अशेषकर्मसंन्यासः सम्भवति । तद् एतद् उत्तरैः श्लोकैः दर्शयति—