पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥ १६ ॥
tatraivaṃ sati kartāramātmānaṃ kevalaṃ tu yaḥ.
paśyatyakṛtabuddhitvānna sa paśyati durmatiḥ .. 16 ..
‘तत्र’ शब्द प्रकरण से सम्बन्ध जोड़ता है। ऐसा होने से, यानी पहले बतलाये हुए पाँच कारणों द्वारा ही समस्त कर्म सिद्ध होते हैं, इसलिये, जो अज्ञानी पुरुष, वेदान्त और आचार्य के उपदेश द्वारा तथा तर्क द्वारा संस्कृतबुद्धि न होने के कारण, उन अधिष्ठानादि पाँचों कारणों के साथ अविद्या से आत्मा की एकता मानकर, उनके द्वारा किये हुए कर्मों का ‘मैं ही कर्ता हूँ’ इस प्रकार केवल—शुद्ध आत्मा को (उन कर्मों का) कर्ता समझता है, (वह वास्तव में कुछ भी नहीं समझता)।
तथा आत्मा को शरीरादि से अलग माननेवाला भी, जो शरीरादि से अलग केवल आत्मा को ही कर्ता समझता है, वह भी अकृतबुद्धि ही है। अत: असंस्कृतबुद्धि होने के कारण वह भी वास्तव में आत्मा का या कर्म का तत्त्व नहीं समझता, यह अभिप्राय है।
इसलिये वह दुर्बुद्धि है। जिस की बुद्धि कुत्सित, विपरीत, दुष्ट और बारम्बार जन्म-मरण देने में कारणरूप हो उसे दुर्बुद्धि कहते हैं; ऐसा मनुष्य देखता हुआ भी वास्तव में नहीं देखता। जैसे तिमिररोगवाला अनेक चन्द्र देखता है, या जैसे बालक दौड़ते हुए बादलों में चन्द्रमा को दौड़ता हुआ देखता है, अथवा जैसे (पालकी आदि) किसी सवारी पर चढ़ा हुआ मनुष्य दूसरों के चलने में अपना चलना समझता है (वैसे ही उसका समझना है) ॥ १६ ॥
तो फिर जो वास्तव में देखता है (ऐसा) सुबुद्धि कौन है ? इसपर कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
तत्र इति प्रकृतेन संबध्यते, एवं सति, एवं यथोक्तैः पञ्चभिः हेतुभिः निर्वर्त्ये सति कर्मणि। *तत्र एवं सति इति दुर्मतित्वस्य हेतुत्वेन संबध्यते। तत्र तेषु आत्मानम् अनन्यत्वेन अविद्यया परिकल्प्य तैः क्रियमाणस्य कर्मणः अहम् एव कर्ता इति कर्तारम् आत्मानं केवलं शुद्धं तु यः पश्यति अविद्वान्, कस्मात्, वेदान्ताचार्योपदेशन्यायैः अकृतबुद्धित्वाद् असंस्कृतबुद्धित्वात्।
यः अपि देहादिव्यतिरिक्तात्मवादी अन्यम् आत्मानम् एव केवलं कर्तारं पश्यति असौ अपि अकृतबुद्धिः एव अतः अकृतबुद्धित्वाद् न स पश्यति आत्मनः तत्त्वं कर्मणो वा इत्यर्थः ।
अतः दुर्मतिः कुत्सिता विपरीता दुष्टा अजस्रं जननमरणप्रतिपत्तिहेतुभूता मतिः अस्य इति दुर्मतिः स पश्यन् अपि न पश्यति, यथा तैमिरिकः अनेकं चन्द्रम्, यथा वा अभ्रेषु धावत्सु चन्द्रं धावन्तम्, यथा वा वाहने उपविष्टः अन्येषु धावत्सु आत्मानं धावन्तम् ॥ १६ ॥
कः पुनः सुमतिः यः सम्यक् पश्यति इति उच्यते—