हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७ ॥
yasya nāhaṅkṛto bhāvo buddhiryasya na lipyate .
hatvāpi sa imā~llokānna hanti na nibadhyate .. 17 ..
शास्त्र और आचार्य के उपदेश से तथा न्याय से जिसका अन्तःकरण भली प्रकार शुद्ध संस्कृत हो गया है, ऐसे जिस पुरुष के अन्तःकरण में ‘मैं कर्ता हूँ’ इस प्रकार की भावना—प्रतीति नहीं होती, जो ऐसा समझता है कि ‘अविद्या से आत्मा में अध्यारोपित, ये अधिष्ठानादि पाँच हेतु ही समस्त कर्मों के कर्ता हैं, मैं नहीं हूँ, मैं तो केवल उनके व्यापारों का साक्षीमात्र ‘प्राणों से रहित, मन से रहित, शुद्ध, श्रेष्ठ अक्षर से भी पर’ केवल और अक्रिय आत्मस्वरूप हूँ।’
तथा जिसकी बुद्धि यानी आत्मा का उपाधिस्वरूप अन्तःकरण, लिप्त नहीं होता—अनुताप नहीं करता, यानी ‘मैंने अमुक कार्य किया है उससे मुझे नरक में जाना पड़ेगा’ इस प्रकार जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती; वह सुबुद्धि है; वही वास्तव में देखता है।
ऐसा ज्ञानी इन समस्त लोकों को अर्थात् सब प्राणियों को मारकर भी (वास्तव में) नहीं मारता अर्थात् हननक्रिया नहीं करता और उसके परिणाम से अर्थात् पाप के फल से भी नहीं बँधता।
पू०—यद्यपि यह (ज्ञान की) स्तुति है, तो भी यह कहना सर्वथा विपरीत है कि ‘मारकर भी नहीं मारता।’
उ०—यह दोष नहीं है, क्योंकि लौकिक और पारमार्थिक इन दो दृष्टियों की अपेक्षा से ऐसा कहना बन सकता है।
शरीर आदि में आत्मबुद्धि करके ‘मैं मारनेवाला हूँ’ ऐसा माननेवाले लौकिक मनुष्यों की दृष्टि का आश्रय लेकर ‘मारकर भी’ यह कहा है और पूर्वोक्त पारमार्थिक दृष्टि का आश्रय लेकर ‘न मारता है और न बँधता है’ यह कहा है। इस प्रकार ये दोनों कथन बन सकते हैं।
पू०—‘कर्तारमात्मानं केवलं तु’ इस कथन में केवल-शब्द का प्रयोग होने से यह पाया जाता है कि आत्मा (अकेला कर्म नहीं करता, पर) अधिष्ठान आदि अन्य हेतुओं के साथ सम्मिलित होकर निःसंदेह कर्म करता है।
उ०—यह दोष नहीं है, क्योंकि अविक्रिय-स्वभाववाला होने के कारण, आत्मा का अधिष्ठानादि से संयुक्त होना नहीं बन सकता।
विकारवान् वस्तु का ही अन्य पदार्थों के साथ संघात हो सकता है और विकारी पदार्थ ही संहत होकर कर्ता बन सकता है।
निर्विकार आत्मा का, न तो किसी के साथ संयोग हो सकता है और न संयुक्त होकर उसका कर्तृत्व ही बन सकता है। इसलिये (यह समझना चाहिये कि) आत्मा का केवलत्व स्वाभाविक है, अतः यहाँ ‘केवल’ शब्द का अनुवादमात्र किया गया है।
आत्माका अविक्रियत्व श्रुति-स्मृति और न्यायसे प्रसिद्ध है। गीतामें भी ‘यह विकाररहित कहलाता है’ ‘सब कर्म गुणोंसे ही किये जाते हैं’ ‘आत्मा शरीरमें स्थित हुआ भी नहीं करता’ इत्यादि वाक्यों द्वारा अनेक बार प्रतिपादित है और ‘मानो ध्यान करता है’ मानो चेष्टा करता है’ इस प्रकारकी श्रुतियोंमें भी प्रतिपादित है।
तथा न्याय से भी यही सिद्ध होता है, क्योंकि आत्मतत्त्व अवयवरहित, स्वतन्त्र और विकाररहित है। ऐसा मानना ही राजमार्ग है।
यदि आत्मा को विकारवान् मानें तो भी इसका स्वकीय विकार ही अपना हो सकता है। अधिष्ठानादि के किये हुए कर्म आत्मकर्तृक नहीं हो सकते; क्योंकि अन्य के कर्मों को बिना किये ही अन्य के पल्ले बाँध देना उचित नहीं है। जो अविद्या से आरोपित किये जाते हैं, वे वास्तव में उसके नहीं होते।
जैसे सीप में आरोपित चाँदीपन सीप का नहीं होता एवं जैसे मूर्खों द्वारा आकाश में आरोपित की हुई तलमलीनता आकाश की नहीं हो सकती, वैसे ही अधिष्ठानादि पाँच हेतुओं के विकार भी उनके ही हैं, आत्मा के नहीं।
सुतरां यह ठीक ही कहा है कि ‘मैं कर्ता हूँ’ ऐसी भावना का और बुद्धि के लेप का अभाव होने के कारण, पूर्ण ज्ञानी ‘न मारता है और न बँधता है।’
दूसरे अध्याय में ‘यह आत्मा न मारता है और न मारा जाता है’ इस प्रकार प्रतिज्ञा करके, ‘न जायते’ इत्यादि हेतुयुक्त वचनों से आत्मा का अविक्रियत्व बतलाकर, फिर ‘वेदाविनाशिनम्’ इस श्लोक से उपदेश के आदि में विद्वान् के लिये संक्षेप में कर्माधिकार की निवृत्ति कहकर, जगह-जगह, प्रसङ्ग लाकर बीच-बीच में जिसका विस्तार किया गया है, ऐसी कर्माधिकार की निवृत्ति का, अब शास्त्र के अर्थ का संग्रह करने के लिये ‘विद्वान् न मारता है और न बँधता है’ इस कथन से उपसंहार करते हैं।
सुतरां यह सिद्ध हुआ कि विद्वान् में देहभृत्त्वाभिमान न होने के कारण उसके अविद्याकृत अशेष कर्मों का संन्यास हो सकता है, इसलिये संन्यासियों को अनिष्ट आदि तीन प्रकार के कर्मफल नहीं मिलते। साथ ही यह भी अनिवार्य है कि दूसरे (कर्माधिकारी) इससे विपरीत होते हैं। इस कारण तीन प्रकार के कर्मफल (अवश्य) मिलते हैं। इस प्रकार यह गीताशास्त्र के अर्थ का उपसंहार किया गया।
ऐसा यह समस्त वेदों के अर्थ का सार, निपुण-बुद्धिवाले पण्डितों द्वारा विचारपूर्वक धारण किया जाने योग्य है। इस विचार से हमने जगह-जगह प्रकरणों का विभाग करके, शास्त्र-न्याय अनुसार इस तत्त्व को दिखलाया है ॥ १७ ॥
इस प्रकार शास्त्र के आशय का उपसंहार करके अब कर्मों का प्रवर्तक बतलाया जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
यस्य शास्त्राचार्योपदेशन्यायसंस्कृतात्मनो न भवति अहङ्कृतः अहं कर्ता इति एवं लक्षणो भावो भावना प्रत्यय एते एव पञ्चाधिष्ठानादयः अविद्यया आत्मनि कल्पिताः सर्वकर्मणां कर्तारो न अहम्, अहं तु तद्व्यापाराणां साक्षिभूतः ‘अप्राणो ह्यमनाः शुभोऽक्षरात्परतः परः’ (मु० उ० २। १। २) केवलः अविक्रिय इति एवं पश्यति इति एतत्।
बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य आत्मन उपाधिभूता न लिप्यते न अनुशायिनी भवति इदम् अहम् अकार्षं तेन अहं नरकं गमिष्यामि इति एवं यस्य बुद्धिः न लिप्यते स सुमतिः स पश्यति।
हत्वा अपि स इमान् लोकान् सर्वान् प्राणिनः इत्यर्थः । न हन्ति हननक्रियां न करोति न निबध्यते न अपि तत्कार्येण अधर्मफलेन सम्बध्यते ।
ननु हत्वा अपि न हन्ति इति विप्रतिषिद्धम्
उच्यते यद्यपि स्तुतिः ।
न एष दोष:, लौकिकपारमार्थिकदृष्ट्यपेक्षया
तदुपपत्तेः ।
देहाद्यात्मबुद्ध्या हन्ताहम् इति लौकिकीं दृष्टिम् आश्रित्य हत्वा अपि इति आह, यथादर्शितां पारमार्थिकीं दृष्टिम् आश्रित्य न हन्ति न निबध्यते इति तद् उभयम् उपपद्यते एव।
ननु अधिष्ठानादिभिः सम्भूय करोति एव
आत्मा ‘कर्तारमात्मानं केवलं तु’ इति केवल-शब्दप्रयोगात्।
न एष दोष: आत्मनः अविक्रियस्वभावत्वे
अधिष्ठानादिभिः संहतत्वानुपपत्तेः ।
विक्रियावतो हि अन्यैः संहननं सम्भवति
संहत्य वा कर्तृत्वं स्यात्।
न तु अविक्रियस्य आत्मनः केनचित् संहननम्
अस्ति इति न सम्भूय कर्तृत्वम् उपपद्यते ।
अतः केवलत्वम् आत्मनः स्वाभाविकम् इति केवलशब्दः अनुवादमात्रम् ।
अविक्रियत्वं च आत्मनः श्रुतिस्मृतिन्याय-प्रसिद्धम्। ‘अविकार्योऽयमुच्यते,’ ‘गुणैरेव कर्माणि क्रियन्ते’, ‘शरीरस्थोऽपि न करोति’ इत्यादि असकृद् उपपादितं गीतासु एव तावत्। श्रुतिषु च ‘ध्यायतीव’ ‘लेलायतीव’ (छा० उ० ७। ६। १) इति एवम् आद्यासु।
न्यायतः च निरवयवम् अपरतन्त्रम्
अविक्रियम् आत्मतत्त्वम् इति राजमार्गः ।
विक्रियावत्त्वाभ्युपगमे अपि आत्मनः स्वकीया एव विक्रिया स्वस्य भवितुम् अर्हति। न अधिष्ठानादीनां कर्माणि आत्मकर्तृकाणि स्युः। न हि परस्य कर्म परेण अकृतम् आगन्तुम् अर्हति। यत् तु अविद्यया गमितं न तत् तस्य।
यथा रजतत्वं न शुक्तिकायाः। यथा वा तलमलवत्त्वं बालैः गमितम् अविद्यया न आकाशस्य। तथा अधिष्ठानादिविक्रिया अपि तेषाम् एव इति न आत्मनः।
तस्माद् युक्तम् उक्तम् अहङ्कृतत्वबुद्धि-
लेपाभावाद् विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति।
‘नायं हन्ति न हन्यते’ इति प्रतिज्ञाय ‘न जायते’ इत्यादिहेतुवचनेन अविक्रियत्वम् आत्मन उक्त्वा ‘वेदाविनाशिनम्’ इति विदुषः कर्माधिकारनिवृत्तिं शास्त्रादौ सङ्क्षेपत उक्त्वा मध्ये प्रसारितां च तत्र तत्र प्रसङ्गं कृत्वा इह उपसंहरति शास्त्रार्थपिण्डीकरणाय विद्वान् न हन्ति न निबध्यते इति।
एवं च सति देहभृत्त्वाभिमानानुपपत्तौ अविद्याकृताशेषकर्मसन्न्यासोपपत्तेः सन्न्यासिनाम् अनिष्टादि त्रिविधं कर्मणः फलं न भवति इति उपपन्नं तद्विपर्ययात् च इतरेषां भवति इति एतत् च अपरिहार्यम् इति एष गीताशास्त्रस्य अर्थ उपसंहृतः ।
स एष सर्ववेदार्थसारो निपुणमतिभिः पण्डितैः विचार्य प्रतिपत्तव्य इति तत्र तत्र प्रकरणविभागेन दर्शितः अस्माभिः शास्त्र-न्यायानुसारेण ॥ १७ ॥
अथ इदानीं कर्मणां प्रवर्तकम् उच्यते—
- ‘तत्र एवं सति’ यह वाक्य दुर्मतित्वमें हेतुरूपसे सम्बन्ध रखता है।