प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि॥ १९ ॥
jñānaṃ karma ca kartā ca tridhaiva guṇabhedataḥ.
procyate guṇasaṅkhyāne yathāvacchṛṇu tānyapi.. 19 ..
यहाँ कर्म शब्द का अर्थ क्रिया है, कर्ता का अत्यन्त इष्ट पारिभाषिक शब्द कारकरूप कर्म नहीं। ज्ञान, कर्म और कर्ता अर्थात् क्रिया करनेवाला—ये तीनों ही, गुणों की संख्या करनेवाले शास्त्रों में अर्थात् कपिलमुनिप्रणीत शास्त्र में गुणों के भेद से यानी सात्त्विक आदि भेद से, प्रत्येक तीन-तीन प्रकार के बतलाये गये हैं। यहाँ त्रिधा के साथ एव शब्द जोड़कर यह आशय प्रकट किया गया है कि उक्त तीनों पदार्थ गुणों से अतिरिक्त अन्य जाति के नहीं हैं।
वह गुणों की संख्या करनेवाला कापिलशास्त्र यद्यपि परमार्थ-ब्रह्म की एकता के विषय में ( भगवान् के सिद्धान्त से ) विरुद्ध है तो भी गुणों के भोक्ता ( जीव ) - के विषय में तो प्रमाण है ही ।
वे कापिलसांख्य के अनुयायी, गुण और गुण के व्यापार का निरूपण करने में निपुण हैं। इसलिये उनका शास्त्र भी आगे कहे हुए अभिप्राय की स्तुति करने के लिये प्रमाणरूप से ग्रहण किया जाता है, सुतरां कोई विरोध नहीं है।
उनको अर्थात् ज्ञान, कर्म और कर्ता को तथा गुणों के अनुसार किये हुए उनके सात्त्विक आदि समस्त भेदों को, तू यथावत्—जैसा शास्त्र में न्यायानुसार कहा है उसी प्रकार सुन; अर्थात् आगे कही जानेवाली बात में चित्त लगा ॥ १९ ॥
पहले (तीन श्लोकों द्वारा) ज्ञान के तीन भेद कहे जाते हैं।
तात्पर्य पढ़ें
ज्ञानं कर्म च, कर्म क्रिया, न कारकं पारि- भाषिकम् ईप्सिततमं कर्म, कर्ता च निर्वर्तकः
क्रियाणां त्रिधा एव अवधारणं गुणव्यतिरिक्त- जात्यन्तराभावप्रदर्शनार्थं गुणभेदतः सत्त्वादि- भेदेन इत्यर्थः, प्रोच्यते कथ्यते गुणसङ्ख्याने कापिले शास्त्रे,
तद् अपि गुणसङ्ख्यानं शास्त्रं गुणभोक्तृ-विषये प्रमाणम् एव परमार्थब्रह्मैकत्वविषये यद्यपि विरुध्यते।
ते हि कापिला गुणगौणव्यापारनिरूपणे अभियुक्ता इति तत् शास्त्रम् अपि वक्ष्यमाणार्थ- स्तुत्यर्थत्वेन उपादीयते इति न विरोधः ।
यथावद् यथान्यायं यथाशास्त्रं शृणु तानि अपि ज्ञानादीनि तद्भेदजातानि गुणभेदकृतानि शृणु वक्ष्यमाणे अर्थे मनःसमाधिं कुरु इत्यर्थः ॥ १९ ॥
ज्ञानस्य तु तावत् त्रिविधत्वम् उच्यते—