काम्यानां कर्मणां न्यासं सन्न्यासं कवयो विदुः ।
सर्वकर्मफलत्यागं प्राहस्त्यागं विचक्षणाः ॥ २ ॥
śrībhagavānuvāca—
kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ sannyāsaṃ kavayo viduḥ .
sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhastyāgaṃ vicakṣaṇāḥ .. 2 ..
कितने ही बुद्धिमान्—पण्डित लोग, अश्वमेधादि सकाम कर्मों के त्याग को संन्यास समझते हैं अर्थात् कर्तव्यरूप से प्राप्त (शास्त्रविहित) सकाम कर्मों के न करने को संन्यास शब्द का अर्थ समझते हैं।
कुछ विचक्षण पण्डितजन अनुष्ठान किये जानेवाले नित्य-नैमित्तिक सम्पूर्ण कर्मों के, अपने से सम्बन्ध रखनेवाले फल का परित्याग करनारूप जो सर्व-कर्म-फल-त्याग है, उसे ही त्याग कहते हैं, अर्थात् ‘त्याग’ शब्द का वे ऐसा अभिप्राय बतलाते हैं।
कहने का अभिप्राय, चाहे काम्य कर्मों का (स्वरूप से) त्याग करना हो और चाहे समस्त कर्मों का फल छोड़ना ही हो, सभी प्रकार से संन्यास और त्याग—इन दोनों शब्दों का अर्थ तो एकमात्र त्याग ही है। ये दोनों शब्द ‘घड़ा’ और ‘वस्त्र’ आदि शब्दों की भाँति भिन्न जातीय अर्थ के बोधक नहीं हैं।
पू०—जब ऐसा कहा जाता है कि नित्य और नैमित्तिक कर्मों का तो फल ही नहीं होता, फिर यहाँ वन्ध्या के पुत्र त्याग की भाँति, उनके फल का त्याग करने के लिये कैसे कहा जाता है?
उ०—नित्यकर्मों का भी फल होता है—यह बात भगवान् को इष्ट है, इसलिये यह दोष नहीं है। क्योंकि भगवान् स्वयं कहेंगे कि ‘मरने के बाद कर्मों का अच्छा-बुरा और मिला हुआ फल असंन्यासियों को होता है’, ‘संन्यासियों को नहीं’ इस प्रकार वहाँ केवल संन्यासियों के लिये कर्मफल का अभाव दिखाकर, असंन्यासियों के लिये कर्मफल की प्राप्ति अवश्यम्भावी दिखलायेंगे ॥ २ ॥
तात्पर्य पढ़ें
काम्यानाम् अश्वमेधादीनां कर्मणां न्यासं परित्यागं सन्न्यासं सन्न्यासशब्दार्थम् अनुष्ठेयत्वेन प्राप्तस्य अननुष्ठानं कवयः पण्डिताः केचिद् विदुः विजानन्ति।
नित्यनैमित्तिकानाम् अनुष्ठीयमानानां सर्व-कर्मणाम् आत्मसम्बन्धितया प्राप्तस्य फलस्य परित्यागः सर्वकर्मफलत्यागः तं प्राहुः कथयन्ति त्यागं त्यागशब्दार्थं विचक्षणाः पण्डिताः ।
यदि काम्यकर्मपरित्यागः फलपरित्यागो वा
अर्थो वक्तव्यः सर्वथा अपि त्यागमात्रं
सन्न्यासत्यागशब्दयोः एकः अर्थो न घटपट-शब्दौ इव जात्यन्तरभूतार्थौ ।
ननु नित्यनैमित्तिकानां कर्मणां फलम् एव
नास्ति इति आहुः कथम् उच्यते तेषां फल-त्याग इति। यथा वन्ध्यायाः पुत्रत्यागः।
न एष दोषः, नित्यानाम् अपि कर्मणां भगवता फलवत्त्वस्य इष्टत्वात् । वक्ष्यति हि भगवान् ‘अनिष्टमिष्टम्’ इति ‘न तु सन्न्यासिनाम्’ इति च । सन्न्यासिनाम् एव हि केवलं कर्मफलासम्बन्धं दर्शयन् असन्न्यासिनां नित्यकर्मफलप्राप्तिम् ‘भवत्यत्यागिनां प्रेत्य’ इति दर्शयति ॥ २ ॥