अध्याय 18 - श्लोक 22

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम् ।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥ २२ ॥

yattu kṛtsnavadekasminkārye saktamahaitukam .
atattvārthavadalpaṃ ca tattāmasamudāhṛtam .. 22 ..


जो ज्ञान, किसी एक कार्यमें, शरीरमें या शरीर से बाहर प्रतिमादिमें, सर्ववस्तुविषयक सम्पूर्ण ज्ञानकी भाँति आसक्त है, अर्थात् (यह समझता है कि) यह आत्मा या ईश्वर इतना ही है इससे परे और कुछ भी नहीं है, जैसे दिगम्बर जैनियों का (माना हुआ) आत्मा शरीरमें रहनेवाला और शरीरके बराबर है और पत्थर या काष्ठ (की प्रतिमा)-मात्र ही ईश्वर है, इसी प्रकार जो ज्ञान किसी एक कार्यमें ही आसक्त है।

तथा जो हेतुरहित—युक्ति रहित और तत्त्वार्थसे भी रहित है। यथार्थ अर्थका नाम तत्त्वार्थ है, ऐसा तत्त्वार्थ जिस ज्ञानका ज्ञेय हो, वह ज्ञान तत्त्वार्थयुक्त होता है और जो तत्त्वार्थयुक्त न हो वह अतत्त्वार्थवत् अर्थात् तत्त्वार्थसे रहित होता है। एवं जो हेतुरहित होनेके कारण ही अल्प है अथवा अल्पविषयक होनेसे या अल्प फलवाला होनेसे अल्प है, वह ज्ञान तामस कहा गया है; क्योंकि अविवेकी तामसी प्राणियों में ही ऐसा ज्ञान देखा जाता है ॥ २२ ॥

अब कर्मके तीन भेद कहे जाते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

यत् तु ज्ञानं कृत्स्नवत् समस्तवत् सर्वविषयम् इव एकस्मिन् कार्ये देहे बहिः वा प्रतिमादौ सक्तम् एतावान् एव आत्मा ईश्वरो वा न अतः परम् अस्ति इति यथा नग्नक्षपणकादीनां शरीरानुवर्ती देहपरिमाणो जीव ईश्वरो वा पाषाणदार्वादिमात्र इति एवम् एकस्मिन् कार्ये सक्तम्।

अहेतुकं हेतुवर्जितं निर्युक्तिकम् अतत्त्वार्थवद् यथाभूतः अर्थः तत्त्वार्थः सः अस्य ज्ञेयभूतः अस्ति इति तत्त्वार्थवद् न तत्त्वार्थवद् अतत्त्वार्थ-वद् अहेतुकत्वाद् एव अल्पं च अल्पविषय-त्वाद् अल्पफलत्वाद् वा तत् तामसम् उदाहृतम् । तामसानां हि प्राणिनाम् अविवेकिनाम् ईदृशं ज्ञानं दृश्यते ॥ २२ ॥

अथ कर्मणः त्रैविध्यम् उच्यते—