अध्याय 18 - श्लोक 24

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः ।
क्रियते बहुलायास
तद्राजसमुदाहृतम् ॥ २४ ॥

yattu kāmepsunā karma sāhaṅkāreṇa vā punaḥ .
kriyate bahulāyāsa
tadrājasamudāhṛtam .. 24 ..


जो कर्म, भोगरूप फलकी इच्छावाले पुरुष द्वारा या अहंकारयुक्त पुरुष द्वारा (किया जाता है)।

इस श्लोकमें ‘साहङ्कारेण’ पद तत्त्वज्ञानकी अपेक्षासे नहीं है। तो क्या है? वेद-शास्त्रको जाननेवाले लौकिक निरहङ्कारीकी अपेक्षासे है; क्योंकि जो वास्तविक निरहङ्कारी आत्मवेत्ता है, उसमें तो फलेच्छुकता और बहुत परिश्रमयुक्त कर्तृत्व की आशंका ही नहीं हो सकती।

सात्त्विक कर्म का भी कर्ता, आत्मतत्त्वको न जाननेवाला अहंकारयुक्त मनुष्य ही होता है, फिर राजस-तामस कर्मों के कर्ता की तो बात ही क्या है ?

संसारमें आत्मतत्त्वको न जाननेवाला भी, वेदशास्त्र का ज्ञाता पुरुष निरहङ्कारी कहा जाता है। जैसे ‘अमुक ब्राह्मण निरहङ्कारी है’ ऐसा प्रयोग होता है। सुतरां ऐसे पुरुषकी अपेक्षासे ही इस श्लोकमें ‘साहङ्कारेण वा’ यह वचन कहा गया है। ‘पुनः’ शब्द पाद-पूर्ण करनेके लिये है।

तथा जो कर्म बहुत परिश्रम से युक्त है, अर्थात् करनेवाला जिसको बहुत परिश्रम से कर पाता है, वह कर्म राजस कहा गया है ॥ २४ ॥

तात्पर्य पढ़ें

यत् तु कामेप्सुना फलप्रेप्सुना इत्यर्थः कर्म साहङ्कारेण वा—

साहङ्कारेण इति न तत्त्वज्ञानापेक्षया । किं तर्हि लौकिकश्रोत्रियनिरहङ्कारापेक्षया । यो

हि परमार्थनिरहङ्कार आत्मविद् न तस्य कामेप्सुत्वबहुलायासकर्तृत्वप्राप्तिः अस्ति।

सात्त्विकस्य अपि कर्मणः अनात्मवित्

साहङ्कारः कर्ता किम् उत राजसतामसयोः ।

लोके अनात्मविद् अपि श्रोत्रियो निरहङ्कार

उच्यते निरहङ्कारः अयं ब्राह्मण इति। तस्मात्

तदपेक्षया एव साहङ्कारेण वा इति उक्तम् । पुनः शब्द पादपूर्णार्थः ।

क्रियते बहुलायासं कर्त्रा महता आयासेन

निर्वर्त्यते तत् कर्म राजसम् उदाहृतम् ॥ २४ ॥