बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३० ॥
pravṛttiṃ ca nivṛttiṃ ca kāryākārye bhayābhaye.
bandhaṃ mokṣaṃ ca yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī .. 30 ..
जो बुद्धि, प्रवृत्तिको—बन्धन के हेतुरूप कर्ममार्गको और निवृत्तिको—मोक्ष के हेतुरूप संन्यासमार्गको जानती है। बन्ध और मोक्ष के साथ प्रवृत्ति और निवृत्ति की समानवाक्यता है, इससे यह निश्चय होता है कि प्रवृत्ति और निवृत्ति का अर्थ कर्ममार्ग और संन्यासमार्ग ही है।
तथा कर्तव्य और अकर्तव्यको—विधि और प्रतिषेधको, यानी करनेयोग्य और न करनेयोग्यको (भी जानती है)। यह कहना किसके सम्बन्धमें है ? देश-काल आदिकी अपेक्षासे जिनके दृष्ट और अदृष्ट फल होते हैं, उन कर्मों के सम्बन्धमें।
तथा जो बुद्धि भय और अभयको—(जानती है)। जिससे मनुष्य भयभीत होता है, उसका नाम भय है और उससे विपरीतका नाम अभय है; उन दोनोंको, यानी दृष्टादृष्टविषयक जो भय और अभय हैं उन दोनों के कारणोंको जानती है, एवं हेतुसहित बन्धन और मोक्ष को भी जानती है, हे पार्थ! वह बुद्धि सात्त्विकी है।
पहले जो ज्ञान कहा गया है, वह बुद्धिकी एक वृत्तिविशेष है और बुद्धि वृत्तिवाली है। धृति भी बुद्धिकी वृत्तिविशेष ही है ॥ ३० ॥
तात्पर्य पढ़ें
प्रवृत्तिं च प्रवृत्तिः प्रवर्तनं बन्ध हेतुः कर्ममार्गः निवृत्तिं च निवृत्तिः मोक्ष हेतुः सन्न्यासमार्गः बन्धमोक्षसमानवाक्यत्वात् प्रवृत्तिनिवृत्ती कर्मसन्न्यासमार्गौ इति अवगम्यते ।
कार्याकार्ये विहितप्रतिषिद्धे कर्तव्याकर्तव्ये
करणाकरणे इति एतत्, कस्य, देशकालाद्य-
पेक्षया दृष्टादृष्टार्थानां कर्मणाम्।
भयाभये बिभेति अस्माद् इति भयं तद्विपरीतम्
अभयं भयं च अभयं च भयाभये
दृष्टादृष्टविषययोः भयाभययोः कारणे इत्यर्थः ।
बन्धं सहेतुकं मोक्षं च सहेतुकं या वेत्ति
विजानाति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ।
तत्र ज्ञानं बुद्धेः वृत्तिः बुद्धिः तु वृत्तिमती ।
धृतिः अपि वृत्तिविशेष एव बुद्धेः ॥ ३० ॥