योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥
dhṛtyā yayā dhārayate manaḥprāṇendriyakriyāḥ .
yogenāvyabhicāriṇyā dhṛtiḥ sā pārtha sāttvikī .. 33 ..
‘धृति’ शब्द के साथ दूर पड़े हुए ‘अव्यभिचारिणी’ शब्द का सम्बन्ध है। जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा, अर्थात् सदा समाधिमें लगी हुई जिस धारणाके द्वारा, समाधियोगसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी सब क्रियाएँ धारण की जाती हैं अर्थात् मन, प्राण और इन्द्रियोंकी सब चेष्टाएँ जिसके द्वारा शास्त्रविरुद्ध प्रवृत्तिसे रोकी जाती हैं, (वह धृति सात्त्विकी है)। (सात्त्विकी) धृति द्वारा धारण की हुई (इन्द्रियाँ) ही शास्त्रविरुद्ध विषयमें प्रवृत्त नहीं होतीं।
कहनेका तात्पर्य यह है कि धारण करनेवाला मनुष्य, जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा समाधि-योगसे मन, प्राण और इन्द्रियोंकी चेष्टाओंको धारण किया करता है, हे पार्थ! वह इस प्रकारकी धृति सात्त्विकी है ॥ ३३ ॥
तात्पर्य पढ़ें
धृत्या यया अव्यभिचारिण्या इति व्यवहितेन सम्बन्धः, धारयते किम्, मनःप्राणेन्द्रियक्रिया मनः च प्राणाः च इन्द्रियाणि च मनःप्राणेन्द्रियाणि तेषां क्रियाः चेष्टाः ता उच्छास्त्रमार्गप्रवृत्तेः धारयति। धृत्या हि धार्यमाणा उच्छास्त्रविषया न भवन्ति। योगेन समाधिना अव्यभिचारिण्या नित्यसमाध्यनुगतया इत्यर्थः।
एतद् उक्तं भवति अव्यभिचारिण्या धृत्या मनःप्राणेन्द्रियक्रिया धारयमाणो योगेन धारयति इति। या एवंलक्षणा धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३ ॥