अध्याय 18 - श्लोक 38

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम् ।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥

viṣayendriyasaṃyogādyattadagre’mṛtopamam .
pariṇāme viṣamiva tatsukhaṃ rājasaṃ smṛtam .. 38 ..


जो सुख विषय और इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होता है, वह पहले—प्रथम क्षण में, अमृत के सदृश होता है, परंतु परिणाम में विष के समान है। अभिप्राय यह है कि बल, वीर्य, रूप, बुद्धि, मेधा, धन और उत्साह की हानि का कारण होने से, तथा अधर्म और उससे उत्पन्न नरकादि का हेतु होने से, वह परिणाम में—अपने उपभोग का अन्त होने के पश्चात् विष के सदृश होता है; अत: ऐसा सुख राजस माना गया है ॥ ३८ ॥
तात्पर्य पढ़ें
विषयेन्द्रियसंयोगाद् यत् तत् सुखं जायते अग्रे प्रथमक्षणे अमृतोपमम् अमृतसमं परिणामे विषम् इव बलवीर्यरूपप्रज्ञामेधाधनोत्साहहानि- हेतुत्वाद् अधर्मतज्जनितनरकादिहेतुत्वात् च परिणामे तदुपभोग विपरिणामान्ते विषम् इव तत् सुखं राजसं स्मृतम् ॥ ३८ ॥