सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः ॥ ४० ॥
na tadasti pṛthivyāṃ vā divi deveṣu vā punaḥ.
sattvaṃ prakṛtijairmuktaṃ yadebhiḥ syāttribhirguṇaiḥ .. 40 ..
ऐसा कोई सत्त्व अर्थात् मनुष्यादि प्राणी या अन्य कोई भी प्राणरहित वस्तुमात्र पृथिवी में, स्वर्ग में अथवा देवताओं में भी नहीं है, जो कि इन प्रकृति से उत्पन्न हुए सत्त्वादि तीनों गुणों से मुक्त अर्थात् रहित हो। ‘ऐसा कोई नहीं है’ इस पूर्व के पद से इस वाक्य का सम्बन्ध है ॥ ४० ॥
क्रिया, कारक और फल ही जिसका स्वरूप है, ऐसा यह सारा संसार सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणों का ही विस्तार है, अविद्या से कल्पित है और अनर्थरूप है, (पंद्रहवें अध्याय में) वृक्षरूप की कल्पना करके ‘ऊर्ध्वमूलम्’ इत्यादि वाक्यों द्वारा मूलसहित इसका वर्णन किया गया है।
तथा यह भी कहा है कि ‘उसको दृढ़ असंगशस्त्र-द्वारा छेदन करके उसके पश्चात् उस परम पदको खोजना चाहिये।’
उसमें यह शङ्का होती है कि तब तो सब कुछ तीनों गुणों का ही कार्य होने से संसार के कारण की निवृत्ति नहीं हो सकती। इसलिये जिस उपाय से उसकी निवृत्ति हो, वह बतलाना चाहिये।
तथा सम्पूर्ण गीताशास्त्र का इस प्रकार उपसंहार भी किया जाना चाहिये कि ‘परम पुरुषार्थकी सिद्धि चाहनेवालों के द्वारा अनुष्ठान किये जाने-योग्य यह इतना ही समस्त वेद और स्मृतियों का अभिप्राय है’ अतः इस अभिप्राय से ये ‘ब्राह्मण-क्षत्रियविशाम्’ इत्यादि श्लोक आरम्भ किये जाते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
न तद् अस्ति तद् न अस्ति पृथिव्यां वा मनुष्यादि सत्त्वं प्राणिजातम् अन्यद् वा अप्राणिजातं दिवि देवेषु वा पुनः सत्त्वं प्रकृतिजैः प्रकृतितो जातैः एभिः त्रिभिः गुणैः सत्त्वादिभिः मुक्तं परित्यक्तं यत् स्याद् भवेद् न तद् अस्ति इति पूर्वेण सम्बन्धः ॥ ४० ॥
सर्वः संसारः क्रियाकारकफललक्षणः सत्त्व-रजस्तमोगुणात्मकः अविद्यापरिकल्पितः समूलः
अनर्थ उक्तो वृक्षरूपकल्पनया च ‘ऊर्ध्वमूलम्’ इत्यादिना।
तं च ‘असङ्गशस्त्रेण दृढेन छित्त्वा ततः पदं तत् परिमार्गितव्यम्’ इति च उक्तम्।
तत्र च सर्वस्य त्रिगुणात्मकत्वात् संसार-कारणनिवृत्त्यनुपपत्तौ प्राप्तायां यथा तन्निवृत्तिः स्यात् तथा वक्तव्यम् ।
सर्वः च गीताशास्त्रार्थं उपसंहर्तव्यं एतावान् एव च सर्वो वेदस्मृत्यर्थः पुरुषार्थम् इच्छद्धिः अनुष्ठेय इति एवम् अर्थं च ब्राह्मण-क्षत्रियविशाम् इत्यादिः आरभ्यते—