कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ॥ ४१ ॥
brāhmaṇakṣatriyaviśāṃ śūdrāṇāṃ ca parantapa.
karmāṇi pravibhaktāni svabhāvaprabhavairguṇaiḥ .. 41 ..
हे परन्तप! ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य—इन तीनों के और शूद्रों के भी कर्म विभक्त किये हुए हैं अर्थात् परस्पर विभागपूर्वक निश्चित किये हुए हैं। ब्राह्मणादिके साथ शूद्रों को मिलाकर—समास करके न कहनेका अभिप्राय यह है कि शूद्र द्विज न होनेके कारण वेद-पठनमें उनका अधिकार नहीं है।
किसके द्वारा विभक्त किये गये हैं ? स्वभावसे उत्पन्न हुए गुणोंके द्वारा। स्वभाव यानी ईश्वर की प्रकृति—त्रिगुणात्मिका माया, वह माया जिन गुणोंके प्रभवका यानी उत्पत्तिका कारण है, ऐसे स्वभावप्रभव गुणोंके द्वारा ब्राह्मणादिके शम आदि कर्म विभक्त किये गये हैं।
अथवा यों समझो कि ब्राह्मणस्वभाव का कारण सत्त्वगुण है, वैसे ही क्षत्रियस्वभाव का कारण सत्त्वमिश्रित रजोगुण है, वैश्यस्वभाव का कारण तमोमिश्रित रजोगुण है और शूद्रस्वभाव का कारण रजोमिश्रित तमोगुण है। क्योंकि उपर्युक्त चारों वर्णों में (गुणोंके अनुसार) क्रमसे शान्ति, ऐश्वर्य, चेष्टा और मूढ़ता—ये अलग-अलग स्वभाव देखे जाते हैं।
अथवा यों समझो कि प्राणियों के जन्मान्तरमें किये हुए कर्मोंके संस्कार, जो वर्तमान जन्म में अपने कार्यके अभिमुख होकर व्यक्त हुए हैं, उनका नाम स्वभाव है। ऐसा स्वभाव जिन गुणोंको उत्पत्तिका कारण है, वे स्वभावप्रभव गुण हैं।
गुणोंका प्रादुर्भाव बिना कारणके नहीं बन सकता। इसलिये ‘स्वभाव उनकी उत्पत्तिका कारण है’ यह कहकर कारणविशेषका प्रतिपादन किया गया है।
इस प्रकार स्वभावसे उत्पन्न हुए अर्थात् प्रकृति से उत्पन्न हुए सत्त्व, रज और तम—इन तीनों गुणोंद्वारा अपने-अपने कार्यके अनुरूप शमादि कर्म विभक्त किये गये हैं।
पू०—ब्राह्मणादि वर्णोंके शम आदि कर्म तो शास्त्रद्वारा विभक्त हैं, अर्थात् शास्त्रद्वारा निश्चित किये गये हैं; फिर यह कैसे कहा जाता है कि सत्त्व आदि तीनों गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं ?
उ०—यह दोष नहीं है, क्योंकि शास्त्रद्वारा भी ब्राह्मणादिके शमादि कर्म सत्त्वादि गुण-भेदोंकी अपेक्षासे ही विभक्त किये गये हैं, बिना गुणोंकी अपेक्षासे नहीं। अतः शास्त्रद्वारा विभक्त किये हुए भी कर्म गुणोंद्वारा विभक्त किये गये हैं, ऐसा कहा जाता है ॥ ४१ ॥
वे कर्म कौन-से हैं? यह बतलाया जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
ब्राह्मणाः च क्षत्रियाः च विशः च ब्राह्मणक्षत्रियविशः तेषां ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च शूद्राणाम् असमासकरणम् एकजातित्वे सति वेदे अनधिकारात्, हे परन्तप कर्माणि प्रविभक्तानि इतरेतरविभागेन व्यवस्थापितानि।
केन, स्वभावप्रभवैः गुणैः स्वभाव ईश्वरस्य प्रकृतिः त्रिगुणात्मिका माया सा प्रभवो येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवाः तैः, शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि ब्राह्मणादीनाम् ।
अथवा ब्राह्मणस्वभावस्य सत्त्वगुणः प्रभवः कारणम्, तथा क्षत्रियस्वभावस्य सत्त्वोपसर्जनं रजः प्रभवः, वैश्यस्वभावस्य तम-उपसर्जनं रजः प्रभवः, शूद्रस्वभावस्य रज-उपसर्जनं तमः प्रभवः प्रशान्त्यैश्वर्येहामूढतास्वभावदर्शनात् चतुर्णाम् ।
अथवा जन्मान्तरकृतसंस्कारः प्राणिनां वर्तमानजन्मनि स्वकार्याभिमुखत्वेन अभिव्यक्तः स्वभावः स प्रभवो येषां गुणानां ते स्वभावप्रभवा गुणाः ।
एवं स्वभावप्रभवैः प्रकृतिप्रभवैः सत्त्वरज-स्तमोभिः गुणैः स्वकार्यानुरूपेण शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि।
ननु शास्त्रप्रविभक्तानि शास्त्रेण विहितानि ब्राह्मणादीनां शमादीनि कर्माणि कथम् उच्यते सत्त्वादिगुणप्रविभक्तानि इति।
न एष दोषः, शास्त्रेण अपि ब्राह्मणादीनां सत्त्वादिगुणविशेषापेक्षया एव शमादीनि कर्माणि प्रविभक्तानि न गुणानपेक्षया एव इति शास्त्रप्रविभक्तानि अपि कर्माणि गुण-प्रविभक्तानि इति उच्यन्ते ॥ ४१ ॥
कानि पुनः तानि कर्माणि इति उच्यन्ते—