अध्याय 18 - श्लोक 45

स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः।
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ॥ ४५ ॥

sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ.
svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu .. 45 ..


कर्माधिकारी मनुष्य, उक्त लक्षणोंवाले अपने-अपने कर्मोंमें अभिरत—तत्पर हुआ, संसिद्धि लाभ करता है अर्थात् अपने कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे अशुद्धिका क्षय होनेपर, शरीर और इन्द्रियोंकी ज्ञाननिष्ठाकी योग्यतारूप सिद्धि प्राप्त कर लेता है।

तो क्या अपने कर्मोंका अनुष्ठान करनेसे ही साक्षात् संसिद्धि मिल जाती है? नहीं। तो किस तरह मिलती है? अपने कर्मोंमें तत्पर हुआ मनुष्य, जिस प्रकार सिद्धि लाभ करता है, वह तू सुन ॥ ४५ ॥

तात्पर्य पढ़ें

स्वे स्वे यथोक्तलक्षणभेदे कर्मणि अभिरतः तत्परः संसिद्धिं स्वकर्मानुष्ठानाद् अशुद्धिक्षये सति कायेन्द्रियाणां ज्ञाननिष्ठायोग्यतालक्षणां लभते प्राप्नोति नरः अधिकृतः पुरुषः।

किं स्वकर्मानुष्ठानत एव साक्षात् संसिद्धिः। न, कथं तर्हि स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा येन प्रकारेण विन्दति तत् शृणु ॥ ४५ ॥