अध्याय 18 - श्लोक 47

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥ ४७ ॥

śreyānsvadharmo viguṇaḥ paradharmātsvanuṣṭhitāt .
svabhāvaniyataṃ karma kurvannāpnoti kilbiṣam .. 47 ..


अपना गुणरहित भी धर्म, दूसरे के भली प्रकार अनुष्ठान किये हुए धर्मसे श्रेष्ठतर है। जैसे विषमें उत्पन्न हुए कीड़े के लिये विष दोषकारक नहीं होता, उसी प्रकार स्वभावसे नियत किये हुए कर्मोंको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता। जो बात पहले ‘स्वभावजम्’ इस पदसे कही थी, वही यहाँ ‘स्वभावनियतम्’ इस पदसे कही गयी है। स्वभावसे नियत कर्म का नाम स्वभावनियत है ॥ ४७ ॥

उपर्युक्त श्लोकमें यह बात कही कि स्वभावनियत कर्मोंको करनेवाला मनुष्य, विषमें जन्मे हुए कीड़े की भाँति पापको प्राप्त नहीं होता, तथा (तीसरे अध्यायमें) यह भी कहा है कि दूसरेका धर्म भयावह है और ‘कोई भी अज्ञानी बिना कर्म किये क्षणभर भी नहीं रह सकता।’ इसलिये—

तात्पर्य पढ़ें

श्रेयान् प्रशस्यतरः स्वो धर्मः स्वधर्मो विगुणः अपि इति अपिशब्दो द्रष्टव्यः, * परधर्मात् स्वनुष्ठितात् स्वभावनियतं स्वभावेन नियतम्, यद् उक्तम् ‘स्वभावजम्’ इति तद् एव उक्तं स्वभावनियतम् इति, यथा विषजातस्य इव कृमेः विषं न दोषकरं तथा स्वभावनियतं कर्म कुर्वन् न आप्नोति किल्बिषं पापम् ॥ ४७ ॥

स्वभावनियतं कर्म कुर्वाणो विषजात इव कृमिः किल्बिषं न आप्नोति इति उक्तम्। परधर्मः च भयावह इति। अनात्मज्ञः च न हि कश्चित् क्षणम् अपि अकर्मकृत् तिष्ठति इति, अतः—