अध्याय 18 - श्लोक 48

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्रिरिवावृताः ॥ ४८ ॥

sahajaṃ karma kaunteya sadoṣamapi na tyajet
sarvārambhā hi doṣeṇa dhūmenāgririvāvṛtāḥ .. 48 ..


जो जन्मके साथ उत्पन्न हो उसका नाम सहज है। वह क्या है? कर्म। हे कौन्तेय! त्रिगुणमय होनेके कारण जो दोषयुक्त है, ऐसे दोषयुक्त भी अपने सहज कर्मको नहीं छोड़ना चाहिये।

क्योंकि सभी आरम्भ — जो आरम्भ किये जाते हैं उनका नाम आरम्भ है, अतः यहाँ प्रकरणके अनुसार सर्वारम्भका तात्पर्य समस्त कर्म है। सो स्वधर्म या परधर्मरूप जो कुछ भी कर्म है, वे सभी तीनों गुणोंके कार्य हैं। अतः त्रिगुणात्मक होनेके कारण साथ जन्मे हुए धुएँसे अग्निकी भाँति दोषसे आवृत हैं।

अभिप्राय यह है कि स्वधर्म नामक सहज कर्मका परित्याग करनेसे और परधर्मका ग्रहण करनेसे भी, दोषसे छुटकारा नहीं हो सकता और परधर्म भयावह भी है; तथा अज्ञानी द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका पूर्णतया त्याग होना सम्भव भी नहीं है; सुतरां सहज कर्मको नहीं छोड़ना चाहिये।

(यहाँ यह विचार करना चाहिये कि) क्या कर्मोंका अशेषतः त्याग होना असम्भव है, इसलिये उनका त्याग नहीं करना चाहिये, अथवा सहज कर्मका त्याग करनेमें दोष है इसलिये?

पू०—इसमें क्या सिद्ध होगा?

उ०—यदि यह बात हो कि अशेषतः त्याग होना अशक्य है, इसलिये सहज कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, तब तो यही सिद्ध होगा कि कर्मोंका अशेषतः त्याग करनेमें गुण ही है।

पू०—यह ठीक है, परंतु यदि कर्मोंका पूर्णतया त्याग हो ही नहीं सकता (तो फिर गुण-दोषकी बात ही क्या है?)

उ०—तो क्या सांख्यवादियोंके गुणोंकी भाँति आत्मा सदा चलन-स्वभाववाला है? अथवा बौद्धमतावलम्बियोंके प्रतिक्षणमें नष्ट होनेवाले (रूप, वेदना, विज्ञान, संज्ञा और संस्काररूप) पञ्चस्कन्धोंकी भाँति क्रिया ही कारक है? इन दोनों ही प्रकारोंसे कर्मोंका अशेषतः त्याग नहीं हो सकता।

हाँ, तीसरा एक पक्ष और भी है कि जब आत्मा कर्म करता है तब तो वह सक्रिय होता है और जब कर्म नहीं करता, तब वही निष्क्रिय होता है, ऐसा मान लेनेसे कर्मोंका अशेषतः त्याग भी हो सकता है।

इस तीसरे पक्षमें यह विशेषता है कि न तो आत्मा नित्य चलन-स्वभाववाला माना गया है और न क्रियाको ही कारक माना गया है, तो फिर क्या है कि अपने स्वरूपमें स्थित द्रव्यमें ही अविद्यमान क्रिया उत्पन्न हो जाती है और विद्यमान क्रियाका नाश हो जाता है? शुद्ध द्रव्य क्रियाकी शक्तिसे युक्त होकर स्थित रहता है और वही कारक है। इस प्रकार वैशेषिकमतावलम्बी कहते हैं।

पू०—इस पक्षमें क्या दोष है?

उ०—इसमें प्रधान दोष तो यही है कि यह मत भगवान्को मान्य नहीं है।

पू०—यह कैसे जाना जाता है।

उ०—इसीलिये कि भगवान् तो ‘असत् वस्तुका कभी भाव नहीं होता’ इत्यादि वचन कहते हैं और वैशेषिक-मतवादी असत्का भाव और सत्का अभाव मानते हैं।

पू०—भगवान्का मत न होनेपर भी यदि न्याययुक्त हो तो इसमें क्या दोष है?

उ०—बतलाते हैं (सुनो) सब प्रमाणोंसे इस मतका विरोध होनेके कारण भी यह मत दोषयुक्त है।

पू०—किस प्रकार?

उ०—यदि यह माना जाय कि द्व्यणुक आदि द्रव्य उत्पत्तिसे पहले अत्यन्त असत् हुए ही उत्पन्न हो जाते हैं और किञ्चित् काल स्थित रहकर फिर अत्यन्त ही असत् भावको प्राप्त हो जाते हैं, तब तो यही मानना हुआ कि असत् ही सत् हो जाता है अर्थात् अभाव भाव हो जाता है और भाव अभाव हो जाता है।

अर्थात् (यह मानना हुआ कि) उत्पन्न होनेवाला अभाव, उत्पत्तिसे पहले शश-शृङ्गकी भाँति सर्वथा असत् होता हुआ ही समवायि, असमवायि और निमित्त नामक तीन कारणोंकी सहायतासे उत्पन्न होता है।

परंतु अभाव इस प्रकार उत्पन्न होता है अथवा कारणकी अपेक्षा रखता है—यह कहना नहीं बनता; क्योंकि खरगोशके सींग आदि असत् वस्तुओंमें ऐसा नहीं देखा जाता।

हाँ, यदि यह माना जाय कि उत्पन्न होनेवाले घटादि भावरूप हैं और वे अभिव्यक्तिके किसी कारणकी सहायतासे उत्पन्न होते हैं, तो यह माना जा सकता है।

तथा असत्का सत् और सत्का असत् होना मान लेनेपर तो किसीका प्रमाण-प्रमेय-व्यवहारमें कहीं विश्वास ही नहीं रहेगा; क्योंकि ऐसा मान लेनेसे फिर यह निश्चय नहीं होगा कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है।

इसके सिवा वे ‘उत्पन्न होता है’ इस वाक्यसे द्व्यणुक आदि द्रव्यका अपने कारण और सत्तासे सम्बन्ध होना बतलाते हैं अर्थात् उत्पत्तिसे पहले कार्य असत् होता है, फिर अपने कारणके व्यापारकी अपेक्षासे (सहायतासे) अपने कारणरूप परमाणुओंसे और सत्तासे समवायरूप सम्बन्धके द्वारा संगठित हो जाता है और संगठित होकर कारणसे मिलकर सत् हो जाता है।

इसपर उनको बतलाना चाहिये कि असत्का कारण सत् कैसे हो सकता है? और असत्का किसीके साथ सम्बन्ध भी कैसे हो सकता है? क्योंकि वन्ध्यापुत्रकी सत्ता, उसका किसी सत् पदार्थके साथ सम्बन्ध अथवा उसका कारण किसीके भी द्वारा प्रमाणपूर्वक सिद्ध नहीं किया जा सकता।

पू०—वैशेषिक-मतवादी अभावका सम्बन्ध नहीं मानते। वे तो भावरूप द्वयणुक आदि द्रव्योंका ही अपने कारणके साथ समवायरूप सम्बन्ध बतलाते हैं।

उ०—यह बात नहीं है; क्योंकि (उनके मतमें) कार्य-कारणका सम्बन्ध होनेसे पहले कार्यकी सत्ता नहीं मानी गयी। अर्थात् वैशेषिक-मतावलम्बी कुम्हार और दण्ड-चक्र आदिकी क्रिया आरम्भ होनेसे पहले घट आदिका अस्तित्व नहीं मानते और यह भी नहीं मानते कि मिट्टीको ही घटादिके आकारकी प्राप्ति हुई है। इसलिये अन्तमें असत्का ही सम्बन्ध मानना सिद्ध होता है।

पू०—असत्का भी समवायरूप सम्बन्ध होना विरुद्ध नहीं है।

उ०—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि वन्ध्यापुत्र आदिका किसीके साथ सम्बन्ध नहीं देखा जाता।

अभावकी समानता होनेपर भी यदि कहो कि घटादिके प्रागभावका ही अपने कारणके साथ सम्बन्ध होता है, वन्ध्यापुत्रादिके अभावका नहीं, तो इनके अभावोंका भेद बतलाना चाहिये।

एकका अभाव, दोका अभाव, सबका अभाव, प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव, अत्यन्ताभाव—इन लक्षणोंसे कोई भी अभावकी विशेषता नहीं दिखला सकता।

फिर किसी प्रकारकी विशेषता न होते हुए भी यह कहना कि घटका प्रागभाव ही कुम्हार आदिके द्वारा घटभावको प्राप्त होता है तथा उसका कपाल नामक अपने कारणरूप भावसे सम्बन्ध होता है और वह सब व्यवहारके योग्य भी होता है। परंतु उसी घटका जो प्रध्वंसाभाव है, वह अभावत्व में समान होनेपर भी सम्बन्धित नहीं होता। इस तरह प्रध्वंसादि अभावोंको किसी भी अवस्थामें व्यवहारके योग्य न मानना और केवल द्व्यणुक आदि द्रव्य नामक प्रागभावको ही उत्पत्ति आदि व्यवहारके योग्य मानना, असमञ्जसरूप ही है; क्योंकि अत्यन्ताभाव और प्रध्वंसाभावके समान ही प्रागभावका भी अभावत्व है, उसमें कोई विशेषता नहीं है।

पू०—हमने प्रागभावका भावरूप होना नहीं बतलाया है।

उ०—तब तो तुमने भावका ही भावरूप हो जाना कहा है, जैसे घटका घटरूप हो जाना, वस्त्रका वस्त्ररूप हो जाना; परंतु यह भी अभावके भावरूप होनेकी भाँति ही प्रमाण-विरुद्ध है।

सांख्य-मतावलम्बियोंका जो परिणामवाद है, उसमें अपूर्व धर्मकी उत्पत्ति और विनाश स्वीकार किया जानेके कारण, वह भी (इस विषयमें) वैशेषिक-मतसे कुछ विशेषता नहीं रखता।

अभिव्यक्ति (प्रकट होना) और तिरोभाव (छिप जाना) स्वीकार करनेसे भी अभिव्यक्ति और तिरोभावकी विद्यमानता और अविद्यमानताका निरूपण करनेमें पहलेकी भाँति ही प्रमाणसे विरोध होगा।

इस विवेचनसे ‘कारणका कार्यरूपमें स्थित होना ही उत्पत्ति आदि हैं’ ऐसा निरूपण करनेवाले मतका भी खण्डन हो जाता है।

इन सब मतोंका खण्डन हो जानेपर अन्तमें यही सिद्ध होता है कि ‘एक ही सत्य तत्त्व (आत्मा) अविद्या द्वारा नटकी भाँति उत्पत्ति, विनाश आदि धर्मोंसे अनेक रूपमें कल्पित होता है।’ यही भगवान्का अभिप्राय ‘नासतो विद्यते भावः’ इस श्लोकमें बतलाया गया है; क्योंकि सत्प्रत्ययका व्यभिचार नहीं होता और अन्य (असत्) प्रत्ययोंका व्यभिचार होता है (अतः सत् ही एकमात्र तत्त्व है)।

पू०—यदि (भगवान्के मतमें) आत्मा निर्विकार है तो (वे) यह कैसे कहते हैं कि ‘अशेषतः कर्मोंका त्याग नहीं हो सकता?’

उ०—शरीर-इन्द्रियादिरूप गुण चाहे सत्य वस्तु हों, चाहे अविद्याकल्पित हों, जब कर्म उन्हींका धर्म है, तब आत्मामें तो वह अविद्याध्यारोपित ही है। इस कारण ‘कोई भी अज्ञानी अशेषतः कर्मोंका त्याग क्षणभर भी नहीं कर सकता’ यह कहा गया है।

परंतु विद्याद्वारा अविद्या निवृत्त हो जानेपर ज्ञानी तो कर्मोंका अशेषतः त्याग कर ही सकता है; क्योंकि अविद्या नष्ट होनेके उपरान्त, अविद्या से अध्यारोपित वस्तुका अंश बाकी नहीं रह सकता।

(यह प्रत्यक्ष ही है कि) तिमिर-रोगसे विकृत हुई दृष्टि द्वारा अध्यारोपित दो चन्द्रमा आदिका कुछ भी अंश तिमिर-रोग नष्ट हो जानेपर शेष नहीं रहता।

सुतरां ‘सब कर्मोंको मनसे छोड़कर’ इत्यादि कथन ठीक ही हैं। तथा ‘अपने-अपने कर्मोंमें लगे हुए मनुष्य संसिद्धिको प्राप्त होते हैं’ ‘मनुष्य अपने कर्मोंसे उसकी पूजा करके सिद्धि प्राप्त करता है’—ये कथन भी ठीक हैं ॥ ४८ ॥

ज्ञाननिष्ठाकी योग्यताप्राप्तिरूप जो कर्मजनित सिद्धि कही गयी है, उसकी फलभूत ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि भी कही जानी चाहिये। इसलिये अगला श्लोक आरम्भ किया जाता है—

तात्पर्य पढ़ें

सहजं सह जन्मना एव उत्पन्नं सहजं किं तत् कर्म कौन्तेय सदोषम् अपि त्रिगुणत्वाद् न त्यजेत्।

सर्वारम्भा आरभ्यन्ते इति आरम्भाः सर्व-कर्माणि इति एतत् प्रकरणात्। ये केचिद् आरम्भाः स्वधर्माः परधर्माः च ते सर्वे हि यस्मात् त्रिगुणात्मकत्वम् अत्र हेतुः त्रिगुणात्मकत्वाद् दोषेण धूमेन सहजेन अग्निः इव आवृताः ।

सहजस्य कर्मणः स्वधर्माख्यस्य परित्यागेन परधर्मानुष्ठाने अपि दोषाद् न एव मुच्यते, भयावहः च परधर्मः । न च शक्यते अशेषतः त्यक्तुम् अज्ञेन कर्म यतः तस्माद् न त्यजेद् इत्यर्थः ।

किम् अशेषतः त्यक्तुम् अशक्यं कर्म इति न त्यजेत् किं वा सहजस्य कर्मणः त्यागे दोषो भवति इति।

किं च अतः ?

यदि तावद् अशेषतः त्यक्तुम् अशक्यम् इति न त्याज्यं सहजं कर्म एवं तर्हि अशेषतः त्यागे गुण एव स्याद् इति सिद्धं भवति।

सत्यम् एवम् अशेषतः त्याग एव न

उपपद्यते इति चेत्।

किं नित्यप्रचलितात्मकः पुरुषो यथा साड्ख्यानां गुणाः किं वा क्रिया एव कारकं यथा बौद्धानां पञ्च स्कन्धाः क्षण-प्रध्वंसिनः, उभयथा अपि कर्मणः अशेषतः त्यागो न भवति।

अथ तृतीयः अपि पक्षो यदा करोति तदा सक्रियं वस्तु यदा न करोति तदा निष्क्रियं वस्तु तद् एव। तत्र एवं सति शक्यं कर्म अशेषतः त्युक्तम्।

अयं तु अस्मिन् तृतीये पक्षे विशेषो न नित्यप्रचलितं वस्तु न अपि क्रिया एव कारकं किं तर्हि व्यवस्थिते द्रव्ये अविद्यमाना क्रिया उत्पद्यते विद्यमाना च विनश्यति। शुद्धं द्रव्यं शक्तिमद् अवतिष्ठते इति एवम् आहुः काणादाः तद् एव च कारकम् इति।

अस्मिन् पक्षे को दोष इति?

अयम् एव तु दोषो यतः तु अभागवतं मतम् इदम्।

कथं ज्ञायते?

यत आह भगवान् ‘नासतो विद्यते भावः’

इत्यादि। काणादानां हि असतो भावः सतः च अभाव इति इदं मतम्।

अभागवतत्वे अपि न्यायवत् चेत् को दोष इति चेत्।

उच्यते, दोषवत् तु इदं सर्वप्रमाण-विरोधात्।

कथम्?

यदि तावद् द्व्यणुकादि द्रव्यं प्राग उत्पत्तेः

अत्यन्तम् एव असद् उत्पन्नं च स्थितं कञ्चित्

कालं पुनः अत्यन्तम् एव असत्त्वम् आपद्यते ।

तथा च सति असद् एव सद् जायते अभावो भावो भवति भावः च अभाव इति।

तत्र अभावो जायमानः प्राग् उत्पत्तेः शश-

विषाणकल्पः समवाय्यसमवायिनिमित्ताख्यं

कारणम् अपेक्ष्य जायते इति।

न च एवम् अभाव उत्पद्यते कारणं वा

अपेक्षते इति शक्यं वक्तुम् असतां शशविषाणा-दीनाम् अदर्शनात् ।

भावात्मकाः चेद् घटादय उत्पद्यमानाः किञ्चिद् अभिव्यक्तिमात्रकारणम् अपेक्ष्य उत्पद्यन्ते इति शक्यं प्रतिपत्तम् ।

किं च असतः च सद्भावे सतः च असद्भावे न क्वचित् प्रमाणप्रमेयव्यवहारे विश्वासः कस्यचित् स्यात्। सत् सद् एव असद् असद् एव इति निश्चयानुपपत्तेः।

किं च उत्पद्यते इति द्व्यणुकादेः द्रव्यस्य स्वकारणसत्तासम्बन्धम् आहुः । प्रागुत्पत्तेः च असत् पश्चात् स्वकारणव्यापारम् अपेक्ष्य स्वकारणैः परमाणुभिः सत्तया च समवाय-लक्षणेन सम्बन्धेन सम्बध्यते सम्बद्धं सत् कारणसमवेतं सद् भवति ।

तत्र वक्तव्यं कथम् असतः सत् कारणं भवेत् सम्बन्धो वा केनचित्। न हि वन्ध्यापुत्रस्य सत्ता सम्बन्धो वा कारणं वा केनचित् प्रमाणतः कल्पयितुं शक्यम्।

ननु न एव वैशेषिकैः अभावस्य सम्बन्धः कल्प्यते द्व्यणुकादीनां हि द्रव्याणां स्वकारणेन समवायलक्षणः सम्बन्धः सताम् एव उच्यते इति।

नः सम्बन्धात् प्राक् सत्त्वानभ्युपगमात्। न हि वैशेषिकैः कुलालदण्डचक्रादिव्यापारात्

प्राग् घटादीनाम् अस्तित्वम् इष्यते। न च मृदः एव घटाद्याकारप्राप्तिम् इच्छन्ति। ततः च असत् एव सम्बन्धः पारिशेष्याद् इष्टो भवति।

ननु असतः अपि समवायलक्षणः सम्बन्धो न विरुद्धः।

नः वन्ध्यापुत्रादीनाम् अदर्शनात् ।

घटादेः एव प्रागभावस्य स्वकारणसम्बन्धो

भवति न वन्ध्यापुत्रादेः अभावस्य तुल्यत्वे अपि इति विशेषः अभावस्य वक्तव्यः।

एकस्य अभावो द्वयोः अभावः सर्वस्य अभावः प्रागभावः प्रध्वंसाभाव इतरेतराभावः अत्यन्ताभाव इति लक्षणतो न केनचिद् विशेषो दर्शयितुं शक्यः।

असति च विशेषे घटस्य प्रागभाव एव कुलालादिभिः घटभावम् आपद्यते सम्बध्यते च भावेन कपालाख्येन स्वकारणेन सर्व-व्यवहारयोग्यः च भवति न तु घटस्य एव प्रध्वंसाभावः अभावत्वे सति अपि इति प्रध्वंसाद्यभावानां न क्वचिद् व्यवहारयोग्यत्वं प्रागभावस्य एव द्व्यणुकादिद्रव्याख्यस्य उत्पत्त्यादिव्यवहारार्हत्वम् इति एतत् असमञ्जसम् अभावत्वाविशेषाद् अत्यन्तप्रध्वंसा-भावयोः इव ।

ननु न एव अस्माभिः प्रागभावस्य भावापत्तिः उच्यते।

भावस्य एव हि तर्हि भावापत्तिः यथा घटस्य घटापत्तिः पटस्य वा पटापत्तिः। एतद् अपि अभावस्य भावापत्तिवद् एव प्रमाणविरुद्धम्।

साङ्ख्यस्य अपि यः परिणामपक्षः सः अपि अपूर्वधर्मोत्पत्तिविनाशाङ्गीकरणाद् वैशेषिक-पक्षाद् न विशिष्यते ।

अभिव्यक्तितिरोभावाङ्गीकरणे अपि

अभिव्यक्तितिरोभावयोः विद्यमानत्वाविद्यमान-त्वनिरूपणे पूर्ववद् एव प्रमाणविरोधः ।

एतेन कारणस्य एव संस्थानम् उत्पत्त्यादि

इति एतद् अपि प्रत्युक्तम् ।

पारिशेष्यात् सद् एकम् एव वस्तु अविद्यया उत्पत्तिविनाशादिधर्मैः नटवद् अनेकधा विकल्प्यते इति इदं भागवतं मतम् उक्तम् ‘नासतो विद्यते भावः’ इति अस्मिन् श्लोके । सत्प्रत्ययस्य अव्यभिचाराद् व्यभिचारात् च इतरेषाम् इति ।

कथं तर्हि आत्मनः अविक्रियत्वे अशेषतः

कर्मणः त्यागो न उपपद्यते इति।

यदि वस्तुभूता गुणा यदि वा अविद्या-कल्पिताः तद्धर्मः कर्म तदा आत्मनि अविद्याध्यारोपितम् एव इति अविद्वान् न हि कश्चित् क्षणमपि अशेषतः त्यक्तुं शक्नोति इति उक्तम् ।

विद्वान् तु पुनः विद्यया अविद्यायां निवृत्तायां

शक्रोति एव अशेषतः कर्म परित्यक्तुम् अविद्याध्यारोपितस्य शेषानूपपत्तेः ।

न हि तैमिरिकटुष्ट्या अध्यारोपितस्य

द्विचन्द्रादेः तिमिरापगमे शेषः अवतिष्ठते ।

एवं च सति इदं वचनम् उपपन्नम् ‘सर्व-कर्माणि मनसा’ इत्यादि ‘स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः’ ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ इति च ॥ ४८ ॥

या च कर्मजा सिद्धिः उक्ता ज्ञाननिष्ठा-योग्यतालक्षणा तस्याः फलभूता नैष्कर्म्यसिद्धिः ज्ञाननिष्ठालक्षणा वक्तव्या इति श्लोक आरभ्यते—

  • भाष्यकार विगुण शब्दके बाद ‘अपि’ वाक्यशेष मानते हैं, इसलिये भाषामें अपि शब्दका अर्थ कर दिया गया है।