नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां सत्र्यासेनाधिगच्छति ॥ ४९ ॥
asaktabuddhiḥ sarvatra jitātmā vigataspṛhaḥ .
naiṣkarmyasiddhiṃ paramāṃ satryāsenādhigacchati .. 49 ..
जो सर्वत्र असक्तबुद्धि है—पुत्र, स्त्री आदि जो आसक्ति के स्थान हैं, उन सबमें जिसका अन्त:करण आसक्ति से—प्रीति से रहित हो चुका है।
जो जितात्मा है—जिसका आत्मा यानी अन्त:करण जीता हुआ है अर्थात् वशमें किया हुआ है।
जो स्पृहारहित है—शरीर, जीवन और भोगोंमें भी जिसकी स्पृहा—तृष्णा नष्ट हो गयी है।
जो ऐसा आत्मज्ञानी है, वह परम नैष्कर्म्य-सिद्धिको (प्राप्त करता है)। निष्क्रिय ब्रह्म ही आत्मा है यह ज्ञान होनेके कारण जिसके सर्वकर्म निवृत्त हो गये हैं वह ‘निष्कर्मा’ है। उसके भावका नाम ‘नैष्कर्म्य’ है और निष्कर्मतारूप सिद्धिका नाम ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ है। अथवा निष्क्रिय आत्मस्वरूप से स्थित होनारूप निष्कर्मता का सिद्ध होना ही ‘नैष्कर्म्यसिद्धि’ है। ऐसी जो कर्मजनित सिद्धि से विलक्षण और सद्योमुक्तिमें स्थित होने रूप उत्तम सिद्धि है, उसको संन्यासके द्वारा, यानी यथार्थ ज्ञानसे अथवा ज्ञानपूर्वक सर्वकर्मसंन्यासके द्वारा लाभ करता है; ऐसा ही कहा भी है कि ‘सब कर्मोंको मनसे छोड़कर न करता हुआ और न करवाता हुआ रहता है’॥ ४९॥
पूर्वोक्त स्वधर्मानुष्ठानद्वारा ईश्वरार्चनरूप साधनसे उत्पन्न हुई ज्ञाननिष्ठा-प्राप्ति की योग्यतारूप सिद्धिको जो प्राप्त कर चुका है और जिसमें आत्मविषयक विवेकज्ञान उत्पन्न हो गया है, उस पुरुषको जिस क्रमसे केवल आत्म-ज्ञाननिष्ठारूप नैष्कर्म्यसिद्धि मिलती है, वह (क्रम) बतलाना है, अतः कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
असक्तबुद्धिः असक्ता सङ्ग्रहिता बुद्धिः अन्तःकरणं यस्य सः असक्तबुद्धिः सर्वत्र पुत्रदारादिषु आसक्ति निमित्तेषु।
जितात्मा जितो वशीकृत आत्मा अन्तःकरणं यस्य स जितात्मा।
विगतस्पृहो विगता स्पृहा तृष्णा देहजीवित-भोगेषु यस्मात् स विगतस्पृहः।
य एवम्भूत आत्मज्ञः स नैष्कर्म्यसिद्धिं निर्गतानि कर्माणि यस्माद् निष्क्रियब्रह्मात्म-सम्बोधात् स निष्कर्मा तस्य भावो नैष्कर्म्यं नैष्कर्म्यं च तत् सिद्धिः च सा नैष्कर्म्यसिद्धिः नैष्कर्म्यस्य वा सिद्धिः निष्क्रियात्मस्वरूपावस्थानलक्षणस्य सिद्धिः निष्पत्तिः तां नैष्कर्म्यसिद्धिं परमां प्रकृष्टां कर्मजसिद्धिविलक्षणां सद्योमुक्त्यवस्थानरूपां सन्न्यासेन सम्यग्दर्शनेन तत्पूर्वकेण वा सर्वकर्म-सन्न्यासेन अधिगच्छति प्राप्नोति। तथा च उक्तम् ‘सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्य नैव कुर्वन्न कारयन्नास्ते’ इति ॥ ४९ ॥
पूर्वोक्तेन स्वकर्मानुष्ठानेन ईश्वराभ्यर्चन- रूपेण जनितां प्रागुक्तलक्षणां सिद्धिं प्राप्तस्य उत्पन्नात्मविवेकज्ञानस्य केवलात्मज्ञाननिष्ठारूपा नैष्कर्म्यलक्षणा सिद्धिः येन क्रमेण भवति तद् वक्तव्यम् इति आह—