ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ ५२ ॥
viviktasevī laghvāśī yatavākkāyamānasaḥ .
dhyānayogaparo nityaṃ vairāgyaṃ samupāśritaḥ .. 52 ..
किं च—
तथा—
विविक्त देशका सेवन करनेवाला—अर्थात् वन, नदी-तीर, पहाड़की गुफा आदि एकान्त देशका सेवन करना ही जिसका स्वभाव है ऐसा, और हलका आहार करनेवाला होकर, ‘एकान्त-सेवन’ और ‘हलका भोजन’ यह दोनों निद्रादि दोषों के निवर्तक होनेसे चित्त की स्वच्छता में हेतु हैं, इसलिये इनका ग्रहण किया गया है।
तथा मन, वाणी और शरीर को वश में करनेवाला होकर, अर्थात् जिस ज्ञाननिष्ठ यतिके काया, मन और वाणी तीनों जीते हुए होते हैं, वह ‘यतवाक्कायमानस’ होता है—इस प्रकार सब इन्द्रियों को कर्मों से उपराम करके,
तथा नित्य ध्यानयोग के परायण रहता हुआ, आत्मस्वरूप-चिन्तनका नाम ध्यान है और आत्मा में चित्त को एकाग्र करनेका नाम योग है, यह दोनों प्रधानरूपसे जिसके कर्तव्य हों उसका नाम ध्यानयोगपरायण है, उसके साथ नित्य पदका ग्रहण मन्त्र-जप आदि अन्य कर्तव्यों का अभाव दिखाने के लिये किया गया है।
तथा इस लोक और परलोक के भोगों में तृष्णाका अभावरूप जो वैराग्य है, उसके आश्रित होकर अर्थात् सदा वैराग्यसम्पन्न होकर ॥ ५२ ॥
तात्पर्य पढ़ें
विविक्तसेवी अरण्यनदीपुलिनगिरिगुहादीन् विविक्तान् देशान् सेवितुं शीलम् अस्य इति विविक्तसेवी। लघ्वाशी लघ्वशनशीलः। विविक्तसेवालघ्वशनयोः निद्रादिदोषनिवर्तकत्वेन चित्तप्रसादहेतुत्वाद् ग्रहणम्।
यतवाक्कायमानसो वाक् च कायः च मानसं च यतानि संयतानि यस्य ज्ञाननिष्ठस्य स ज्ञाननिष्ठो यतिः यतवाक्कायमानसः स्यात् । एवम् उपरतसर्वकरणः सन्,
ध्यानयोगपरो ध्यानम् आत्मस्वरूपचिन्तनं योग आत्मविषये एव एकाग्रीकरणं तौ ध्यानयोगौ परत्वेन कर्तव्यौ यस्य स ध्यान-योगपरः । नित्यं नित्यग्रहणं मन्त्रजपाद्यन्य-कर्तव्याभावप्रदर्शनार्थम् ।
वैराग्यं विरागभावो दृष्टादृष्टेषु विषयेषु वैतृष्ण्यं समुपाश्रितः सम्यग् उपाश्रितो नित्यम् एव इत्यर्थः ॥ ५२ ॥