समः सर्वेषु भूतेषु मद्धर्त्तिं लभते पराम् ॥ ५४ ॥
brahmabhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati.
samaḥ sarveṣu bhūteṣu maddharttiṃ labhate parām .. 54 ..
ब्रह्मको प्राप्त हुआ, प्रसन्नात्मा अर्थात् जिसको अध्यात्मप्रसाद लाभ हो चुका है ऐसा पुरुष न शोक करता है और न आकांक्षा ही करता है। अर्थात् न तो किसी पदार्थकी हानिके या निजसम्बन्धी विगुणताके उद्देश्यसे सन्ताप करता है और न किसी वस्तुको चाहता ही है।
‘न शोचति न काङ्क्षति’ इस कथनसे ब्रह्मभूत पुरुषके स्वभावका अनुवादमात्र किया गया है।
क्योंकि ब्रह्मवेत्तामें अप्राप्त विषयोंकी आकांक्षा बन ही नहीं सकती। अथवा ‘न काङ्क्षति’ की जगह ‘न हृष्यति’ ऐसा पाठ समझना चाहिये।
तथा जो सब भूतोंमें सम है अर्थात् अपने सदृश सब भूतोंमें सुख और दुःखको जो समान देखता है। इस वाक्यमें आत्माको समभावसे देखना नहीं कहा है; क्योंकि वह तो ‘भक्त्या मामभिजानाति’ इस पदसे आगे कहा जायगा।
ऐसा ज्ञाननिष्ठ पुरुष, मुझ परमेश्वरकी भजनरूप पराभक्तिको पाता है, अर्थात् ‘चतुर्विधा भजन्ते माम्’ इसमें जो चतुर्थ भक्ति कही गयी है उसको पाता है ॥ ५४ ॥
उसके बाद उस ज्ञानलक्षणा—
तात्पर्य पढ़ें
ब्रह्मभूतो ब्रह्मप्राप्तः प्रसन्नात्मा लब्धाध्यात्म-प्रसादो न शोचति किञ्चिद् अर्थवैकल्याम्
आत्मनो वैगुण्यं च उद्दिश्य न शोचति न सन्तप्यते न काङ्क्षति।
ब्रह्मभूतस्य अयं स्वभावः अनूद्यते न शोचति न काङ्क्षति इति।
न हि अप्राप्तविषयाकाङ्क्षा ब्रह्मविद उपपद्यते। न हृष्यति इति वा पाठः।
समः सर्वेषु भूतेषु आत्मौपम्येन सर्वेषु भूतेषु सुखं दुःखं वा समम् एव पश्यति इत्यर्थो न आत्मसमदर्शनम् इह तस्य वक्ष्यमाणत्वात् ‘भक्त्या मामभिजानाति’ इति।
एवम्भूतो ज्ञाननिष्ठो मद्भक्तिं मयि परमेश्वरे भक्तिं भजनं पराम् उत्तमां ज्ञानलक्षणां चतुर्थी लभते ‘ चतुर्विधा भजन्ते माम् ’ इति उक्तम् ॥ ५४ ॥
ततो ज्ञानलक्षणया—