ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् ॥ ५५ ॥
bhaktyā māmabhijānāti yāvānyaścāsmi tattvataḥ .
tato māṃ tattvato jñātvā viśate tadanantaram .. 55 ..
भक्तिसे मैं जितना हूँ और जो हूँ, उसको तत्त्वसे जान लेता है। अभिप्राय यह है कि मैं जितना हूँ, यानी उपाधिकृत विस्तारभेदसे जितना हूँ और जो हूँ, यानी वास्तवमें समस्त उपाधिभेदसे रहित, उत्तमपुरुष और आकाशकी तरह (व्याप्त) जो मैं हूँ, उस अद्वैत, अजर, अमर, अभय और निधनरहित मुझको तत्त्वसे जान लेता है।
फिर मुझे इस तरह तत्त्वसे जानकर तत्काल मुझ में ही प्रवेश कर जाता है।
यहाँ ‘ज्ञात्वा’ ‘विशते तदनन्तरम्’ इस कथनसे ज्ञान और उसके अनन्तर प्रवेशक्रिया, यह दोनों भिन्न-भिन्न विवक्षित नहीं हैं। तो क्या है? फलान्तरके अभावका ज्ञानमात्र ही विवक्षित है; क्योंकि ‘क्षेत्रज्ञ भी तू मुझे ही समझ’ ऐसे कहा गया है।
पू०—यह कहना विरुद्ध है कि ज्ञानकी जो परा निष्ठा है उससे मुझे जानता है। यदि कहो कि विरुद्ध कैसे है तो बतलाते हैं, जब ज्ञाताको
जिस विषयका ज्ञान होता है, वह उसी समय उस विषयको जान लेता है, ज्ञानकी बारम्बार आवृत्ति करनारूप ज्ञाननिष्ठाकी अपेक्षा नहीं करता। इसलिये ‘वह (ज्ञेय पदार्थको) ज्ञानसे नहीं जानता, ज्ञानावृत्तिरूप ज्ञाननिष्ठासे जानता है’ यह कहना विरुद्ध है।
उ०—यह दोष नहीं है; क्योंकि अपनी उत्पत्ति और परिपाकके हेतुओंसे युक्त एवं विरोधरहित ज्ञानका जो अपने स्वरूपानुभवमें निश्चयरूपसे पर्यवसान—स्थित हो जाना है, उसीको निष्ठा शब्दसे कहा गया है।
अभिप्राय यह है कि ज्ञानकी उत्पत्ति और परिपाकके हेतु, जो विशुद्ध-बुद्धि आदि और अमानित्वादि सहकारी कारण हैं, उनकी सहायतासे, शास्त्र और आचार्यके उपदेशसे उत्पन्न हुआ, जो ‘मैं कर्ता हूँ, मेरा यह कर्म है’ इत्यादि कारक-भेदबुद्धिजनित समस्त कर्मोंके संन्याससहित क्षेत्रज्ञ और ईश्वरकी एकताका ज्ञान है, उसका जो अपने स्वरूपके अनुभवमें निश्चयरूपसे स्थित रहना है, उसे ‘परा ज्ञाननिष्ठा’ कहते हैं।
वही यह ज्ञाननिष्ठा आर्त आदि तीन भक्तियोंकी अपेक्षासे चतुर्थ परा भक्ति कही गयी है। उस (ज्ञान-निष्ठारूप) परा भक्तिसे भगवान्को तत्त्वसे जानता है जिससे उसी समय ईश्वर और क्षेत्रज्ञविषयक भेदबुद्धि पूर्णरूपसे निवृत्त हो जाती है। इसलिये ज्ञाननिष्ठारूप भक्तिसे मुझे जानता है यह कहना विरुद्ध नहीं होता।
ऐसा मान लेनेसे वेदान्त, इतिहास, पुराण और स्मृतिरूप समस्त निवृत्तिविधायक शास्त्र सार्थक हो जाते हैं अर्थात् उन सबका अभिप्राय सिद्ध हो जाता है।
‘आत्माको जानकर ( तीनों तरहकी एषणाओंसे ) विरक्त होकर फिर भिक्षाचरण करते हैं’, ‘पुरुषार्थका अन्तरंग साधन होनेके कारण संन्यास हो इन सब तपोंमें अधिक कहा गया है’, ‘अकेला संन्यास ही उन सबको उल्लङ्घन कर जाता है’, कर्मोंके त्यागका नाम संन्यास है,
‘वेदोंको तथा इस लोक और परलोकको परित्याग करके’, ‘धर्म-अधर्मको छोड़’ इत्यादि शास्त्रवाक्य हैं। तथा यहाँ भी (संन्यासपरक) बहुत-से वचन दिखाये गये हैं।
उन सब वचनोंको व्यर्थ मानना उचित नहीं और अर्थवादरूप मानना भी ठीक नहीं; क्योंकि वे अपने प्रकरणमें स्थित हैं।
इसके सिवा अन्तरात्माके अविक्रियस्वरूपमें निश्चयरूपसे स्थित हो जाना ही मोक्ष है। इसलिये भी (पूर्वोक्त बात ही सिद्ध होती है); क्योंकि पूर्वसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेका उसके प्रतिकूल पश्चिमसमुद्रपर जानेकी इच्छावालेके साथ समान मार्ग नहीं हो सकता।
अन्तरात्मविषयक प्रतीतिका निरन्तरता रखनेके आग्रहका नाम ‘ज्ञाननिष्ठा’ है। उसका कर्मोंके साथ रहना (पूर्वकी ओर जानेकी इच्छावालेके लिये) पश्चिमसमुद्रकी ओर जानेकी मार्गकी भाँति विरुद्ध है।
प्रमाणवेत्ताओंने उनका पर्वत और राईके समान भेद निश्चित किया है। सुतरां यह सिद्ध हुआ कि सर्वकर्म-संन्यासपूर्वक ही ज्ञाननिष्ठा करनी चाहिये ॥ ५५ ॥
अपने कर्मों द्वारा भगवान्की पूजा करनारूप भक्तियोगकी सिद्धि, अर्थात् फल, ज्ञाननिष्ठाकी योग्यता है। जिस ( भक्तियोग )-से होनेवाली ज्ञाननिष्ठा, अन्तमें मोक्षरूप फल देनेवाली होती है, उस भगवद्भक्ति-योगकी अब शास्त्राभिप्रायके उपसंहार-प्रकरणमें, शास्त्र-अभिप्रायके निश्चयको दृढ़ करनेके लिये स्तुति की जाती है—
तात्पर्य पढ़ें
भक्त्या माम् अभिजानाति यावान् अहम् उपाधिकृतविस्तरभेदो यः च अहं विध्वस्त-सर्वोपाधिभेद उत्तमपुरुष आकाशकल्पः तं माम् अद्वैतं चैतन्यमात्रैकरसम् अजम् अजरम् अमरम् अभयम् अनिधनं तत्त्वतः अभिजानाति ।
ततो माम् एवं तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरं माम् एव।
न अत्र ज्ञानानन्तरप्रवेशक्रिये भिन्ने विवक्षिते ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम् इति, किं तर्हि, फलान्तराभावज्ञानमात्रम् एव, ‘क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि’ इति उक्तत्वात्।
ननु विरुद्धम् इदम् उक्तं ज्ञानस्य या परा निष्ठा तया माम् अभिजानाति इति। कथं विरुद्धम् इति चेद् उच्यते, यदा एव यस्मिन्
विषये ज्ञानम् उत्पद्यते ज्ञातुः तदा एव तं विषयम् अभिजानाति ज्ञाता इति न ज्ञाननिष्ठां ज्ञानावृत्तिलक्षणाम् अपेक्षते इति। ततः च ज्ञानेन न अभिजानाति ज्ञानावृत्त्या तु ज्ञाननिष्ठया अभिजानाति इति।
न एष दोषो ज्ञानस्य स्वात्मोत्पत्तिपरिपाक-
हेतुयुक्तस्य प्रतिपक्षविहीनस्य यद् आत्मानुभव- निश्चयावसानत्वं तस्य निष्ठाशब्दाभिलापात् ।
शास्त्राचार्योपदेशेन ज्ञानोत्पत्तिपरिपाकहेतुं सहकारिकारणं बुद्धिविशुद्ध्यादि अमानित्वादि च अपेक्ष्य जनितस्य क्षेत्रज्ञपरमात्मैकत्व-ज्ञानस्य कर्त्रादिकारकभेदबुद्धिनिबन्धन-सर्वकर्मसन्न्याससहितस्य स्वात्मानुभवनिश्चय-रूपेण यद् अवस्थानं सा परा ज्ञाननिष्ठा इति उच्यते ।
सा इयं ज्ञाननिष्ठा आर्तादिभक्तित्रयापेक्षया परा चतुर्थी भक्तिः इति उक्ता। तया परया भक्त्या भगवन्तं तत्त्वतः अभिजानाति। यदनन्तरम् एव ईश्वरक्षेत्रज्ञभेदबुद्धिः अशेषतो निवर्तते। अतो ज्ञाननिष्ठालक्षणया भक्त्या माम् अभिजानाति इति वचनं न विरुध्यते।
अत्र च सर्वं निवृत्तिविधायि शास्त्रं वेदान्तेतिहासपुराणस्मृतिलक्षणम् अर्थवद् भवति ।
‘विदित्वा व्युत्थायाथ भिक्षाचर्यं चरन्ति’ (बृह० उ० ३। ५। १) ‘तस्मान्न्यासमेषां तपसामतिरिक्तमाहुः’ (ना० उ० २। ७९) ‘न्यास एवात्यरेचयत्’ (ना० उ० २। ७८) इति सन्न्यासः कर्मणां न्यासो
‘वेदानिमं च लोकममुं च परित्यज्य’ (आप० ध० १। २३। १३) ‘त्यज धर्ममधर्मं च’ (महा० शां० ३२९। ४०) इत्यादि। इह च दर्शितानि वाक्यानि।
न च तेषां वाक्यानाम् आनर्थक्यं युक्तम्।
न च अर्थवादत्वं स्वप्रकरणस्थत्वात्।
प्रत्यगात्माविक्रियस्वरूपनिष्ठत्वात् च
मोक्षस्य। न हि पूर्वसमुद्रं जिगमिषोः प्राति-
लोम्येन प्रत्यक्समुद्रं जिगमिषुणा समानमार्गत्वं सम्भवति।
प्रत्यगात्मविषयप्रत्ययसन्तानकरणाभिनिवेशः
च ज्ञाननिष्ठा। सा च प्रत्यक्समुद्रगमनवत् कर्मणा सहभावित्वेन विरुध्यते।
पर्वतसर्षपयोः इव अन्तरवान् विरोधः प्रमाणविदां निश्चितः । तस्मात् सर्वकर्मसन्न्या-सेन एव ज्ञाननिष्ठा कार्या इति सिद्धम् ॥ ५५ ॥
स्वकर्मणा भगवतः अभ्यर्चनभक्तियोगस्य सिद्धिप्राप्तिः फलं ज्ञाननिष्ठायोग्यता । यन्निमित्ता ज्ञाननिष्ठा मोक्षफलावसाना स भगवद्भक्तियोगः अधुना स्तूयते शास्त्रार्थोपसंहारप्रकरणे शास्त्रार्थनिश्चयदार्ढ्याय—