अध्याय 18 - श्लोक 56

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।
मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥ ५६ ॥

sarvakarmāṇyapi sadā kurvāṇo madvyapāśrayaḥ .
matprasādādavāpnoti śāśvataṃ padamavyayam .. 56 ..


सदा सब कर्मोंको करनेवाला अर्थात् निषिद्ध कर्मों को भी करनेवाला जो मद्व्यपाश्रय भक्त है—जिसका

मैं वासुदेव ही पूर्ण आश्रय हूँ, ऐसा मुझे ही अपना सब कुछ अर्पण कर देनेवाला जो भक्त है, वह भी मुझ ईश्वर के अनुग्रहसे, विष्णुके शाश्वत—नित्य—अविनाशी पदको प्राप्त कर लेता है ॥ ५६ ॥

जब कि यह बात है इसलिये—

तात्पर्य पढ़ें

सर्वकर्माणि प्रतिषिद्धानि अपि सदा कुर्वाणः अनुतिष्ठन् मद्व्यपाश्रयः अहं वासुदेव ईश्वरो

व्यपाश्रयो यस्य स मद्व्यपाश्रयो मय्यर्पित-सर्वात्मभाव इत्यर्थः । सः अपि मत्प्रसादाद् मम ईश्वरस्य प्रसादाद् अवाप्नोति शाश्वतं नित्यं वैष्णवं पदम् अव्ययम् ॥ ५६ ॥

यस्माद् एवं तस्मात्—