चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्परः
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥ ५७ ॥
cetasā sarvakarmāṇi mayi sannyasya matparaḥ
buddhiyogamupāśritya maccittaḥ satataṃ bhava .. 57 ..
तू दृष्ट और अदृष्ट फलवाले समस्त कर्मों को विवेक-बुद्धिसे अर्थात् ‘यत्करोषि यदश्नासि’ इस श्लोकमें बतलाये हुए भावसे, मुझ ईश्वरमें समर्पण करके तथा मेरे परायण होकर, अर्थात् मैं वासुदेव ही जिसका पर (परमगति) हूँ, ऐसा होकर, मुझमें बुद्धिको स्थिर करनारूप बुद्धि-योग का आश्रय लेकर—बुद्धियोग के अनन्यशरण होकर, निरन्तर मुझमें चित्तवाला हो, अर्थात् जिसका निरन्तर मुझमें ही चित्त रहे, ऐसा हो ॥ ५७ ॥
तात्पर्य पढ़ें
चेतसा विवेकबुद्ध्या सर्वकर्माणि दृष्टादृष्टार्थानि मयि ईश्वरे सन्न्यस्य ‘यत्करोषि यदश्नासि’ इति उक्तन्यायेन मत्परः अहं वासुदेवः परो यस्य तव स त्वं मत्परः सन् बुद्धियोगं मयि समाहितबुद्धित्वं बुद्धियोगस्तं बुद्धियोगम् उपाश्रित्य आश्रयः अनन्यशरणत्वं मच्चित्तो मयि एव चित्तं यस्य तव स त्वं मच्चित्तः सततं सर्वदा भव ॥ ५७ ॥