तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥ ६२ ॥
tameva śaraṇaṃ gaccha sarvabhāvena bhārata.
tatprasādātparāṃ śāntiṃ sthānaṃ prāpsyasi śāśvatam .. 62 ..
हे भारत! तू सर्वभाव से उस ईश्वर की ही शरण में जा अर्थात् संसार के समस्त क्लेशों का नाश करने के लिये मन, वाणी और शरीर द्वारा सब प्रकार से उस ईश्वर का ही आश्रय ग्रहण कर। फिर उस ईश्वर के अनुग्रह से परम—उत्तम शान्ति को, अर्थात् उपरति को और शाश्वत स्थान को अर्थात् मुझ विष्णु के परम नित्यधाम को प्राप्त करेगा ॥ ६२ ॥
तात्पर्य पढ़ें
तम् एव ईश्वरं शरणम् आश्रयं संसारार्ति- हरणार्थं गच्छ आश्रयं सर्वभावेन सर्वात्मना हे भारत ततः तत्प्रसादाद् ईश्वरानुग्रहात् परां प्रकृष्टां शान्तिं पराम् उपरतिं स्थानं च मम विष्णोः परमं पदम् अवाप्स्यसि शाश्वतं नित्यम् ॥ ६२ ॥