मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥ ६५ ॥
manmanā bhava maddhatto madyājī māṃ namaskuru.
māmevaiṣyasi satyaṃ te pratijāne priyo’si me.. 65 ..
तू मुझमें मनवाला अर्थात् मुझमें चित्तवाला हो, मेरा भक्त अर्थात् मेरा ही भजन करनेवाला हो और मेरा ही पूजन करनेवाला हो, तथा मुझे ही नमस्कार कर, अर्थात् नमस्कार भी मुझे ही किया कर।
इस प्रकार करता हुआ, अर्थात् मुझ वासुदेवमें ही (अपने) समस्त साध्य, साधन और प्रयोजन को समर्पण करके तू मुझे ही प्राप्त होगा। इस विषयमें मैं तुझसे सत्य प्रतिज्ञा करता हूँ; क्योंकि तू मेरा प्रिय है।
कहने का अभिप्राय यह है कि इस प्रकार भगवान् को सत्यप्रतिज्ञ जानकर तथा भगवान् की भक्तिका फल निःसन्देह—ऐकान्तिक मोक्ष है—यह समझकर, मनुष्य को केवल एकमात्र भगवान् की शरणमें ही तत्पर हो जाना चाहिये ॥ ६५ ॥
कर्मयोगनिष्ठा के परम रहस्य ईश्वरशरणागतिका उपसंहार करके, उसके पश्चात् अब कर्मयोगनिष्ठा का फलस्वरूप, समस्त वेदान्तोंमें कहा हुआ यथार्थ ज्ञान कहना है, इसलिये (भगवान्) बोले—
तात्पर्य पढ़ें
मन्मना भव मच्चित्तो भव मद्भक्तो भव मद्भजनो भव मद्याजी मद्यजनशीलो भव मां नमस्कुरु नमस्कारम् अपि मम एव कुरु।
तत्र एवं वर्तमानो वासुदेवे एव सर्वसमर्पित-साध्यसाधनप्रयोजनो माम् एव एष्यसि आ-गमिष्यसि। सत्यं ते तव प्रतिजाने सत्यां प्रतिज्ञां करोमि एतस्मिन् वस्तुनि इत्यर्थः। यतः प्रियः असि मे।
एवं भगवतः सत्यप्रतिज्ञत्वं बुद्ध्वा भगवद्भक्तेः अवश्यम्भाविमोक्षफलम् अवधार्य भगवच्छरणैकपरायणो भवेद् इति वाक्यार्थः ॥ ६५ ॥
कर्मयोगनिष्ठायाः परमरहस्यम् ईश्वरशरणताम् उपसंहृत्य अथ इदानीं कर्मयोगनिष्ठाफलं सम्यग्दर्शनं सर्ववेदान्तविहितं वक्तव्यम् इति आह—