अध्याय 18 - श्लोक 66

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शूचः ॥ ६६ ॥

sarvadharmānparityajya māmekaṃ śaraṇaṃ vraja.
ahaṃ tvā sarvapāpebhyo mokṣayiṣyāmi mā śūcaḥ .. 66 ..


समस्त धर्मों को, अर्थात् जितने भी धर्म हैं उन सबको, यहाँ नैष्कर्म्य (कर्माभाव) का प्रतिपादन करना है, इसलिये ‘धर्म’ शब्द से अधर्म का भी ग्रहण किया जाता है। ‘जो बुरे चरित्रों से विरक्त नहीं हुआ’ ‘धर्म और अधर्म दोनों को छोड़’ इत्यादि श्रुति-स्मृतियोंसे भी यही सिद्ध होता है।

सब धर्मों को छोड़कर—सर्व-कर्मों का संन्यास करके, मुझ एक की शरण में आ, अर्थात् मैं जो कि सबका आत्मा, समभाव से सर्व-भूतों में स्थित, ईश्वर, अच्युत तथा गर्भ, जन्म, जरा और मरण से रहित हूँ, उस एक के इस प्रकार शरण हो। अभिप्राय यह कि ‘मुझ परमेश्वर से अन्य कुछ है ही नहीं’ ऐसा निश्चय कर।

तुझ इस प्रकार निश्चयवाले को मैं अपना स्वरूप प्रत्यक्ष कराके, समस्त धर्माधर्मबन्धनरूप पापों से मुक्त कर दूँगा। पहले कहा भी है कि—‘मैं हृदय में स्थित हुआ प्रकाशमय ज्ञान-दीपक से (अज्ञानजनित अन्धकार का) नाश करता हूँ’ इसलिये तू शोक न कर अर्थात् चिन्ता मत कर ॥ ६६ ॥

यह विचार करना चाहिये कि इस गीताशास्त्र में निश्चय किया हुआ, परम कल्याण (मोक्ष)-का साधन ज्ञान है या कर्म, अथवा दोनों?

पू०—यह सन्देह क्यों होता है?

उ०—‘जिसको जानकर अमरता प्राप्त कर लेता है’ ‘तदनन्तर मुझे तत्त्व से जानकर मुझ में ही प्रविष्ट हो जाता है’ इत्यादि वाक्य तो केवल ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति दिखला रहे हैं; तथा ‘तेरा कर्म में ही अधिकार है’ ‘तू कर्म ही कर’ इत्यादि वाक्य कर्मों की अवश्य-कर्तव्यता दिखला रहे हैं।

इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनों की कर्तव्यता का उपदेश होने से ऐसा संशय भी हो सकता है कि सम्भवतः दोनों समुच्चित (मिलकर) ही मोक्ष के साधन होंगे।

पू०—परंतु इस मीमांसा का फल क्या होगा?

उ०—यही कि इन तीनों में से किसी एक को ही परम कल्याण का साधन निश्चय करना। अतः इसकी विस्तारपूर्वक मीमांसा कर लेनी चाहिये।

केवल आत्मज्ञान ही परम कल्याण (मोक्ष)-का हेतु (साधन) है; क्योंकि भेद-प्रतीति का निवर्तक होने के कारण, कैवल्य (मोक्ष)-की प्राप्ति ही उसकी अवधि है।

आत्मा में क्रिया, कारक और फलविषयक भेद-बुद्धि अविद्या के कारण सदा से प्रवृत्त हो रही है। ‘कर्म मेरे हैं, मैं उनका कर्ता हूँ, मैं अमुक फल के लिये यह कर्म करता हूँ’ यह अविद्या अनादिकाल से प्रवृत्त हो रही है।

‘यह केवल, (एकमात्र) अकर्ता, क्रियारहित और फल से रहित आत्मा मैं हूँ, मुझसे भिन्न और कोई भी नहीं है’ ऐसा आत्मविषयक ज्ञान इस अविद्या का नाशक है; क्योंकि यह उत्पन्न होते ही, कर्म-प्रवृत्ति की हेतुरूप भेदबुद्धि का नाश करनेवाला है।

उपर्युक्त वाक्य में ‘तु’ शब्द दोनों पक्षों की निवृत्ति के लिये है अर्थात् मोक्ष न तो केवल कर्म से मिलता है और न ज्ञान-कर्म के समुच्चय से ही। इस प्रकार ‘तु’ शब्द दोनों पक्षों का खण्डन करता है।

मोक्ष अकार्य अर्थात् स्वतःसिद्ध है, इसलिये कर्मों को उसका साधन मानना नहीं बन सकता; क्योंकि कोई भी नित्य (स्वतःसिद्ध) वस्तु कर्म या ज्ञान से उत्पन्न नहीं की जाती।

पू०—तब तो केवल ज्ञान भी व्यर्थ ही है?

उ०—यह बात नहीं है; क्योंकि अविद्याका नाशक होनेके कारण उसकी मोक्षप्राप्तिरूप फल-पर्यन्तता प्रत्यक्ष है। अर्थात् जैसे दीपकके प्रकाश-का, रज्जु आदि वस्तुओंमें होनेवाली सर्पादिकी भ्रान्तिको और अन्धकारको नष्ट कर देना ही फल है और जैसे उस प्रकाशका फल सर्पविषयक

विकल्प को हटाकर, केवल रज्जु को प्रत्यक्ष कराके समाप्त हो जाता है, वैसे ही अविद्यारूप अन्धकार के नाशक आत्मज्ञान का भी फल, केवल आत्मस्वरूप को प्रत्यक्ष कराके ही समाप्त होता देखा गया है।

जिनका फल प्रत्यक्ष है, ऐसी जो लकड़ी को चीरना अथवा अरणीमन्थन द्वारा अग्नि उत्पन्न करना आदि क्रियाएँ हैं, उनमें लगे हुए कर्ता आदि कारकों की, जैसे अलग-अलग टुकड़े हो जाना, अथवा अग्नि प्रज्वलित हो जाना आदि फल से अतिरिक्त किसी अन्य फल देनेवाले कर्म में प्रवृत्ति नहीं हो सकती, वैसे ही जिसका फल प्रत्यक्ष है, ऐसी ज्ञाननिष्ठारूप क्रिया में लगे हुए ज्ञाता आदि कारकों की भी आत्मकैवल्यरूप फल से अतिरिक्त फलवाले किसी अन्य कर्म में प्रवृत्ति नहीं हो सकती। अतः ज्ञाननिष्ठा कर्मसहित नहीं हो सकती।

यदि कहो कि भोजन और अग्निहोत्र आदि क्रियाओं के समान (इसमें भी समुच्चय) हो सकता है तो ऐसा कहना ठीक नहीं; क्योंकि जिसका फल कैवल्य (मोक्ष) है, उस ज्ञान के प्राप्त होने के पश्चात् कर्मफल की इच्छा नहीं रह सकती, जैसे सब ओर से परिपूर्ण जलाशय के प्राप्त हो जाने पर कूप-तालाब आदि की जल के लिये चाह नहीं रहती, उसी प्रकार मोक्ष जिसका फल है, ऐसे ज्ञान की प्राप्ति होने के बाद क्षणिक सुखरूप फलान्तर की या उसकी साधनभूत क्रिया की इच्छुकता नहीं रह सकती।

क्योंकि जो मनुष्य राज्य प्राप्त करा देनेवाले कर्म में लगा हुआ है उसकी प्रवृत्ति, क्षेत्र-प्राप्ति ही जिसका फल है ऐसे कर्म में नहीं होती और उस कर्म के फल की इच्छा भी नहीं होती।

सुतरां यह सिद्ध हुआ कि परम कल्याण का साधन न तो कर्म है और न ज्ञान-कर्म का समुच्चय ही है तथा कैवल्य (मोक्ष) ही जिसका फल है, ऐसे ज्ञान को कर्मों की सहायता भी अपेक्षित नहीं है; क्योंकि ज्ञान अविद्या का नाशक है; इसलिये उसका कर्मों से विरोध है।

यह प्रसिद्ध ही है कि अन्धकार का नाशक अन्धकार नहीं हो सकता। इसलिये केवल ज्ञान ही परम कल्याण का साधन है।

पू०—यह सिद्धान्त ठीक नहीं; क्योंकि नित्यकर्मों के न करने से प्रत्यवाय होता है और मोक्ष नित्य है। भाव यह कि—पहले जो यह कहा गया कि केवल ज्ञान से ही मोक्ष मिलता है, ठीक नहीं; क्योंकि वेद-शास्त्र में कहे हुए नित्यकर्मों के न करने से नरकादि की प्राप्तिरूप प्रत्यवाय होगा।

यदि कहो कि ऐसा होने से तो कर्मों से छुटकारा ही न होगा, अतः मोक्ष के अभाव का प्रसङ्ग आ जायगा, तो ऐसा दोष नहीं है; क्योंकि मोक्ष नित्यसिद्ध है। नित्यकर्मों का आचरण करने से तो प्रत्यवाय न होगा, निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग कर देने से अनिष्ट (बुरे) शरीरों की प्राप्ति न होगी, काम्यकर्मों का त्याग कर देने के कारण इष्ट (अच्छे) शरीरों की प्राप्ति न होगी तथा वर्तमान शरीर को उत्पन्न करनेवाले कर्मों का, फल के उपभोग से क्षय हो जाने पर, इस शरीर का नाश हो जाने के पश्चात्, दूसरे शरीर की उत्पत्ति का कोई कारण नहीं रहने से तथा शरीरसम्बन्धी आसक्ति आदि के न करने से, जो स्वरूप में स्थित हो जाना है वही कैवल्य है, अतः बिना प्रयत्न के ही कैवल्य सिद्ध हो जायगा।

उ०—किंतु भूतपूर्व अनेक जन्मों के किये हुए जो स्वर्ग-नरक आदि की प्राप्तिरूप फल देनेवाले अनेक अनारब्धफल—सञ्चित कर्म हैं, उनके फल का उपभोग न होने के कारण, उनका तो नाश नहीं होगा—ऐसा कहें तो?

पू०—यह बात नहीं है; क्योंकि नित्यकर्म के अनुष्ठान में होनेवाले परिश्रमरूप दुःखभोग को, उस कर्मों के फल का उपभोग माना जा सकता है। अथवा प्रायश्चित्त की भाँति नित्यकर्म भी पूर्वकृत पाप का नाश करनेवाले मान लिये जायँगे तथा प्रारब्धकर्म का फलभोग से नाश हो जायगा, फिर नये कर्मों का आरम्भ न करने से ‘कैवल्य’ बिना यज्ञ के सिद्ध हो जायगा।

उ०—यह सिद्धान्त ठीक नहीं है; क्योंकि ‘उस (परमात्मा)-को जानकर ही मनुष्य मृत्यु से तरता है; मोक्ष-प्राप्ति के लिये दूसरा मार्ग नहीं है’ इस प्रकार मोक्ष के लिये विद्या के अतिरिक्त अन्य मार्ग का अभाव बतलानेवाली श्रुति है; तथा जैसे चमड़े की भाँति आकाश को लपेटना असम्भव है, उसी प्रकार अज्ञानी की मुक्ति असम्भव बतलानेवाली भी श्रुति है, एवं पुराण और स्मृतियों में भी यही कहा गया है कि ज्ञान से ही कैवल्य की प्राप्ति होती है।

इसके सिवा (उस सिद्धान्त में) जिनका फल मिलना आरम्भ नहीं हुआ है ऐसे पूर्वकृत पुण्यों के नाश की उत्पत्ति न होने से भी यह पक्ष ठीक नहीं है। अर्थात् जिस प्रकार पूर्वकृत सञ्चित पुण्यों का होना सम्भव है, उसी प्रकार सञ्चित पापों का होना भी सम्भव है ही; अतः देहान्तर को उत्पन्न किये बिना उनका क्षय सम्भव न होने से (इस पक्ष के अनुसार) मोक्ष सिद्ध नहीं हो सकेगा।

इसके सिवा, पुण्य-पाप के कारणरूप राग, द्वेष और मोह आदि दोषों का, बिना आत्मज्ञान के मूलोच्छेद होना सम्भव न होने के कारण भी पुण्य-पाप का उच्छेद होना सम्भव नहीं।

तथा श्रुति में नित्यकर्मों का पुण्यलोक की प्राप्तिरूप फल बतलाया जाने के कारण और ‘अपने कर्मों में स्थित वर्णाश्रमावलम्बी’ इत्यादि स्मृतिवाक्यों द्वारा भी यही बात कही जाने के कारण भी कर्मों का क्षय (मानना) सिद्ध नहीं होता।

तथा जो यह कहते हैं कि नित्यकर्म दुःखरूप होने के कारण पूर्वकृत पापों का फल ही है, उनका अपने स्वरूप से अतिरिक्त और कोई फल नहीं है; क्योंकि श्रुति में उनका कोई फल नहीं बतलाया गया तथा उनका ‘विधान जीवननिर्वाह आदि के लिये किया गया है।’ उनका कहना ठीक नहीं है; क्योंकि जो कर्म फल देने के लिये प्रवृत्त नहीं हुए, उनका फल होना असम्भव है और नित्यकर्म के अनुष्ठान का परिश्रम, अन्य कर्म का फलविशेष है यह बात भी सिद्ध नहीं की जा सकेगी।

तुमने जो यह कहा कि पूर्वजन्मकृत पापकर्मों का फल, नित्यकर्मों के अनुष्ठान में होनेवाले परिश्रमरूप दुःख के द्वारा भोगा जाता है, सो ठीक नहीं; क्योंकि मरने के समय जो कर्म भविष्य में फल देने के लिये अङ्कुरित नहीं हुए उनका फल दूसरे कर्मों द्वारा उत्पन्न हुए शरीर में भोगा जाता है, यह कहना युक्तियुक्त नहीं है।

यदि ऐसा न हो तो स्वर्गरूप फल का भोग करने के लिये अग्निहोत्रादि कर्मों से उत्पन्न हुए जन्म में नरक के कारणभूत कर्मों का फल भोगा जाना भी युक्तिविरुद्ध नहीं होगा।

इसके सिवा यह (नित्यकर्म के अनुष्ठान में होने-वाला परिश्रमरूप दुःख) पापों की फलरूप दुःख-विशेष सिद्ध न हो सकने के कारण भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं है; क्योंकि भिन्न-भिन्न प्रकार के दुःख-साधनरूप फल देनेवाले, अनेक (सञ्चित) पापों के होने की सम्भावना होते हुए भी नित्यकर्म अनुष्ठान के परिश्रममात्र को ही उन सबका फल मान लेने पर शीतोष्णादि द्वन्द्वों की अथवा रोगादि की पीड़ा से होने-वाले दुःखों को पापों का फल नहीं माना जा सकेगा; तथा यह हो भी कैसे सकता है कि नित्यकर्म के अनुष्ठान का परिश्रम ही पूर्वकृत पापों का फल है, सिर पर पत्थर आदि ढोने का दुःख उसका फल नहीं?

इसके सिवा, नित्यकर्मों के अनुष्ठान से होनेवाला परिश्रमरूप दुःख पूर्वकृत पापों का फल है, यह कहना प्रकरणविरुद्ध भी है।

पू० —कैसे?

उ०—जो पूर्वकृत पाप, फल देने के लिये अङ्कुरित नहीं हुए हैं, उसका क्षय नहीं हो सकता ऐसा प्रकरण है, उसमें तुमने फल देने के लिये प्रस्तुत हुए पूर्वकृत पापों का ही फल, नित्यकर्मों के अनुष्ठान से होनेवाला परिश्रमरूप दुःख बतलाया है, जो कर्म फल देने के लिये प्रस्तुत नहीं हुए हैं उनका फल नहीं बतलाया।

यदि तुम यह मानते हो कि पूर्वकृत सभी पाप-कर्म फल देने के लिये प्रवृत्त हो चुके हैं, तो फिर नित्यकर्मों के अनुष्ठान का परिश्रमरूप दुःख ही उनका फल है, यह विशेषण देना अयुक्त ठहरता है। और नित्यकर्मविधायक शास्त्र को भी व्यर्थ मानने का प्रसङ्ग आ जाता है। क्योंकि फल देने के लिये अङ्कुरित हुए पापों का तो उपभोग से ही क्षय हो जायगा (उनके लिये नित्यकर्मों की क्या आवश्यकता है)।

इसके सिवा (वास्तव में) वेद-विहित नित्यकर्मों से होनेवाला परिश्रमरूप दुःख यदि कर्म का फल हो तो वह उन (विहित नित्यकर्मों)-का ही फल होना चाहिये; क्योंकि वह व्यायाम आदि की भाँति उनके ही अनुष्ठान से होता हुआ दिखलायी देता है, अतः यह कल्पना करना कि ‘वह किसी अन्य कर्म का फल है’ युक्तियुक्त नहीं है।

नित्यकर्मों का विधान जीवनादि के लिये किया गया है इसलिये भी नित्यकर्मों को प्रायश्चित्त की भाँति पूर्वकृत पापों का फल मानना युक्तियुक्त नहीं है। जिस पापकर्म के लिये जो प्रायश्चित्त विहित है, वह उस पाप का फल नहीं है। तथापि यदि ऐसा मानें कि प्रायश्चित्तरूप दुःख (जिसके लिये प्रायश्चित्त किया जाय) उस पापरूप निमित्त का ही फल होता है, तो जीवनादि के लिये किये जानेवाले नित्यकर्मों का परिश्रमरूप दुःख भी जीवन आदि हेतुओं का ही फल सिद्ध होगा; क्योंकि नित्य और प्रायश्चित्त ये दोनों ही किसी-न-किसी निमित्त से किये जानेवाले हैं, इनमें कोई भेद नहीं है।

इसके सिवा दूसरा दोष यह भी है कि नित्यकर्म के परिश्रम की और काम्य-अग्निहोत्रादि कर्म के परिश्रम की समानता होने के कारण, नित्यकर्म का परिश्रम ही पूर्वकृत पाप का फल है, काम्य-कर्मानुष्ठान का परिश्रमरूप दुःख उसका फल नहीं है, ऐसा मानने के लिये कोई विशेष कारण नहीं है, अतः वह काम्यकर्म का परिश्रमरूप दुःख भी पूर्वकृत पाप का ही फल माना जायगा।

ऐसा होने से ‘नित्यकर्मों का फल नहीं बतलाया गया है और उनके अनुष्ठान का विधान किया गया है, उस विधान की अन्य प्रकार से उपपत्ति न होने के कारण, नित्यकर्मों के अनुष्ठान से होनेवाला दुःख, पूर्वकृत पापों का ही फल है’, इस प्रकार की जो अर्थापत्ति की कल्पना की गयी थी, उसका खण्डन हो गया।

इस तरह प्रकारान्तर से नित्यकर्मों के विधान की अनुपपत्ति होने से और नित्यकर्मों का अनुष्ठान सम्बन्धी परिश्रमरूप दुःख के सिवा दूसरा फल होता है, ऐसा अनुमान होने से भी ( यह पक्ष खण्डित हो जाता है ) ।

इसके सिवा ऐसा मानने में विरोध होने के कारण भी (यह पक्ष कट जाता है)। नित्यकर्मों का अनुष्ठान करते हुए दूसरे कर्मों का फल भोगा जाता है, ऐसा मान लेने से यह कहना होता है कि वह उपभोग ही नित्यकर्म का फल है और साथ ही यह भी प्रतिपादन करते जाते हो कि नित्यकर्म का फल नहीं है; अतः यह कथन परस्पर विरुद्ध होता है।

इसके अतिरिक्त, (तुम्हारे मतानुसार) काम्य-अग्निहोत्रादि का अनुष्ठान करते हुए तन्त्र से नित्य-अग्निहोत्रादि भी उन्हीं के साथ अनुष्ठित हो जाते हैं। अतः उस परिश्रमरूप दुःखभोग से ही काम्य-अग्निहोत्रादि का फल भी क्षीण हो जायगा; क्योंकि वह उसके अधीन है।

यदि ऐसा मानें कि काम्य-अग्निहोत्रादिका स्वर्गादि प्राप्तिरूप दूसरा ही फल होता है तो उनके अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखको भी नित्यकर्मके परिश्रमसे भिन्न मानना आवश्यक होगा। परंतु प्रत्यक्ष प्रमाणसे विरुद्ध होनेके कारण यह नहीं हो सकता। क्योंकि काम्यकर्मोंके अनुष्ठानसे होनेवाले परिश्रमरूप दुःखसे, केवल नित्यकर्म-अनुष्ठानमें होनेवाले परिश्रमरूप दुःखका भेद नहीं है।

इसके सिवा दूसरी बात यह भी है कि जो कर्म न विहित हो और न प्रतिषिद्ध हो, वही तत्काल फल देनेवाला होता है, शास्त्रविहित या प्रतिषिद्ध कर्म तत्काल फल देनेवाला नहीं होता। यदि ऐसा

होता तो स्वर्ग आदि लोकोंका प्रतिपादन करनेमें और अदृष्ट फलोंके बतलानेमें शास्त्रकी प्रवृत्ति नहीं होती।

कर्मत्वमें किसी प्रकारका भेद न होनेपर तथा अंग और इतिकर्तव्यता आदिकी कोई विशेषता न होनेपर भी केवल नित्य-अग्निहोत्रादिका फल तो अनुष्ठान-जनित परिश्रमरूप दुःखके उपभोगसे क्षय हो जाता है और फलेच्छुकतामात्रकी अधिकतासे काम्य-अग्निहोत्रादिका स्वर्गादि महाफल होता है, ऐसी कल्पना नहीं की जा सकती।

सुतरां नित्यकर्मोंका अदृष्ट फल नहीं होता यह बात कभी भी सिद्ध नहीं हो सकती। इसलिये यह सिद्ध हुआ कि अविद्यापूर्वक होनेवाले सभी शुभाशुभ कर्मोंका, अशेषतः नाश करनेवाला हेतु, विद्या (ज्ञान) ही है, नित्यकर्मका अनुष्ठान नहीं।

क्योंकि सभी कर्म अविद्या और कामनामूलक हैं। ऐसा ही हमने सिद्ध किया है कि अज्ञानीका विषय कर्म है और ज्ञानीका विषय सर्वकर्मसंन्यासपूर्वक ज्ञाननिष्ठा है।

‘उभौ तौ न विजानीतः’ ‘वेदाविनाशिनं नित्यम्’ ‘ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्’ ‘अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्’ ‘तत्त्ववित्तु’ ‘गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते’ ‘सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते’ ‘नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ इत्यादि वाक्योंके अर्थसे यही सिद्ध होता है कि अज्ञानी ही ‘मैं कर्म करता हूँ’ ऐसा मानता है (ज्ञानी नहीं)।

आरुरुक्षुके लिये कर्म कर्तव्य बतलाये हैं और आरूढके लिये अर्थात् योगस्थ पुरुषके लिये उपशम कर्तव्य बतलाया है। तथा (ऐसा भी कहा है कि) ‘तीनों प्रकारके अज्ञानी भक्त भी उदार हैं, पर ज्ञानी तो मेरा स्वरूप ही है, ऐसा मैं मानता हूँ।’

कर्म करनेवाले सकाम अज्ञानी लोग आवागमन-को प्राप्त होते हैं और अनन्य भक्त नित्ययुक्त होकर चिन्तन करते हुए आत्मस्वरूप, आकाशके सदृश, मुझ निष्पाप परमात्माकी उपासना किया करते हैं।

‘उनको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ जिससे वे मुझे प्राप्त हो जाते हैं’ इससे यह सिद्ध होता है कि कर्म करनेवाले अज्ञानी भगवान्को प्राप्त नहीं होते।

भगवदर्थ कर्म करनेवाले जो युक्ततम होनेपर भी कर्मी होनेके नाते अज्ञानी हैं, वे चित्तसमाधानसे लेकर कर्मफलत्यागपर्यन्त उत्तरोत्तर हीन बतलाये हुए साधनोंसे युक्त होते हैं।

तथा जो अनिर्देश्य अक्षरके उपासक हैं वे ‘अद्वेष्टा सर्वभूतानाम्’ आदिसे लेकर, बारहवें अध्यायकी समाप्तिपर्यन्त बतलाये हुए साधनोंसे सम्पन्न और तेरहवें अध्यायसे लेकर तीन अध्यायोंमें बतलाये हुए ज्ञान-साधनोंसे भी युक्त होते हैं।

अधिष्ठानादि पाँच जिसके कारण हैं, ऐसे समस्त कर्मोंका जो संन्यास करनेवाले हैं, जो आत्माके एकत्व और अकर्तृत्वको जाननेवाले हैं, जो ज्ञानकी परानिष्ठामें स्थित हो गये हैं, जो भगवत्स्वरूप और आत्माके एकत्वज्ञानकी शरण हो चुके हैं, ऐसे भगवान्के तत्त्वको जाननेवाले परमहंस परिव्राजकोंको इष्ट-अनिष्ट और मिश्र—ऐसा त्रिविध कर्मफल नहीं मिलता। इनसे अन्य जो संन्यास न करनेवाले कर्म-परायण अज्ञानी हैं, उनको कर्मका फल अवश्य भोगना पड़ता है; यही गीताशास्त्रमें कहे हुए कर्तव्य और अकर्तव्यका विभाग है।

पू०—सभी कर्मोंको अविद्यामूलक मानना युक्ति-सङ्गत नहीं है।

उ०—नहीं, ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्मोंकी भाँति (सभी कर्म अविद्यामूलक हैं) नित्यकर्म यद्यपि शास्त्रप्रतिपादित हैं तो भी वे अविद्यायुक्त पुरुषके ही कर्म हैं।

जैसे प्रतिषेध-शास्त्रसे कहे हुए भी अनर्थके कारणरूप ब्रह्महत्यादि निषिद्ध कर्म अविद्या और कामनादि दोषोंसे युक्त पुरुषके द्वारा ही हो सकते हैं:

क्योंकि दूसरी तरह उनमें प्रवृत्ति नहीं हो सकती। उसी प्रकार नित्य-नैमित्तिक और काम्य आदि कर्म भी अविद्या और कामनासे युक्त मनुष्यसे ही हो सकते हैं।

पू०—परंतु आत्माको शरीरसे पृथक् समझे बिना नित्य-नैमित्तिक आदि कर्मोंमें प्रवृत्तिका होना असम्भव है।

उ०—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्मा जिसका कर्ता नहीं है ऐसे चलनरूप कर्ममें (अज्ञानियों-की) ‘मैं करता हूँ’ ऐसी प्रवृत्ति देखी जाती है।

यदि कहो कि शरीर आदिमें जो अहंभाव है वह गौण है, मिथ्या नहीं है। तो ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे उनके कार्यमें भी गौणता सिद्ध होगी।

पू०—जैसे ‘हे पुत्र! तू मेरा आत्मा ही है’ इस श्रुतिवाक्यके अनुसार, अपने पुत्रमें ‘अहंभाव’ होता है तथा संसारमें भी जैसे ‘यह गौ मेरा प्राण ही है’ इस प्रकार प्रिय वस्तुमें ‘अहंभाव’ होता देखा जाता है, उसी प्रकार अपने शरीरादि संघातमें भी अहंभाव गौण ही है। यह प्रतीति मिथ्या नहीं है। मिथ्या प्रतीति तो वह है कि जो स्थाणु और पुरुषके भेदको न जानकर स्थाणुमें पुरुषकी प्रतीति होती है।

उ०—(यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि) गौण प्रयोग लुप्तोपमा शब्दद्वारा अधिकरणकी स्तुति करनेके लिये होता है, इसलिये गौण प्रतीतिसे मुख्यके कार्यकी सिद्धि नहीं होती।

जैसे कोई कहे कि देवदत्त सिंह है या बालक अग्नि है, तो उसका यह कहना, ‘देवदत्त सिंहके सदृश क्रूर और बालक अग्निके समान पिङ्गल (गौर) वर्ण’, इस प्रकारकी समानताके कारण देवदत्त और बालकरूप अधिष्ठानकी स्तुतिके लिये ही है। क्योंकि गौण शब्द या गौण ज्ञानसे कोई सिंहका कार्य (किसीको भक्षण कर जाना) या अग्निका कार्य (किसीको जला डालना) सिद्ध

नहीं किया जा सकता। परंतु मिथ्या प्रत्ययका कार्य (जन्म-मरणरूप) अनर्थ, (मनुष्य) अनुभव कर रहा है।

इसके सिवा गौण प्रतीतिके विषयको मनुष्य ऐसा जानता भी है कि वास्तवमें यह देवदत्त सिंह नहीं है और यह बालक अग्नि नहीं है।

(यदि उपर्युक्त प्रकारसे शरीरादि संघातमें भी आत्मभाव गौण होता तो) शरीरादिके संघातरूप गौण आत्माद्वारा किये हुए कर्म, अहंभावके मुख्य विषय आत्माके किये हुए नहीं माने जाते। क्योंकि गौण सिंह (देवदत्त) और गौण अग्नि (बालक) द्वारा किये हुए कर्म मुख्य सिंह और अग्निके नहीं माने जाते। तथा उस क्रूरता और पिङ्गलताद्वारा कोई मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे केवल स्तुतिके लिये कहे हुए होनेसे हीनशक्ति हैं।

जिनकी स्तुति की जाती है वे (देवदत्त और बालक) भी यह जानते हैं कि ‘मैं सिंह नहीं हूँ’, ‘मैं अग्नि नहीं हूँ’ तथा ‘सिंहका कर्म मेरा नहीं है’, ‘अग्निका कर्म मेरा नहीं है।’ इसी प्रकार (यदि शरीर आदिमें गौण भावना होती तो) संघातके कर्म मुझ मुख्य आत्माके नहीं हैं—ऐसी ही प्रतीति होनी चाहिये थी, ऐसी नहीं कि ‘मैं कर्ता हूँ’, ‘मेरे कर्म हैं’ (सुतरां यह सिद्ध हुआ कि शरीरमें आत्मभाव गौण नहीं, मिथ्या है)।

जो ऐसा कहते हैं कि अपने स्मृति, इच्छा और प्रयत्न इन कर्महेतुओंके द्वारा आत्मा कर्म किया करता है, उनका कथन ठीक नहीं; क्योंकि ये सब मिथ्या प्रतीतिपूर्वक ही होनेवाले हैं। अर्थात् स्मृति, इच्छा और प्रयत्न आदि सब मिथ्या प्रतीतिसे होनेवाले, इष्ट-अनिष्टरूप अनुभूत कर्मफलजनित संस्कारोंको लेकर ही होते हैं।

जिस प्रकार इस वर्तमान जन्ममें धर्म, अधर्म और उनके फलोंका अनुभव (सुख-दुःख) शरीरादि संघातमें आत्मबुद्धि और राग-द्वेषादिद्वारा किये हुए होते हैं, वैसे ही भूतपूर्व जन्ममें और उससे पहलेके जन्मोंमें भी थे।

इस न्यायसे यह अनुमान करना चाहिये कि यह बीता हुआ और आगे होनेवाला (जन्म–मरणरूप) संसार अनादि एवं अविद्याकर्तृक ही है।

इससे यह सिद्ध होता है कि ज्ञाननिष्ठामें सर्व-कर्मोंके संन्याससे संसारकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है; क्योंकि देहाभिमान अविद्यारूप है, अत: उसकी निवृत्ति हो जानेपर शरीरान्तरकी प्राप्ति न होनेके कारण (जन्म-मरणरूप) संसारकी प्राप्ति नहीं हो सकती।

शरीरादि संघातमें जो आत्माभिमान है वह अविद्यारूप है; क्योंकि संसारमें भी ‘मैं गौ आदिसे अन्य हूँ और गौ आदि वस्तुएँ मुझसे अन्य हैं’ ऐसा जाननेवाला कोई भी मनुष्य उनमें ऐसी बुद्धि नहीं करता कि ‘यह मैं हूँ।’

न जाननेवाला ही स्थाणुमें पुरुषकी भ्रान्तिके समान अविवेकके कारण, शरीरादि संघातमें ‘मैं हूँ’ ऐसा आत्मभाव कर सकता है; पर विवेकपूर्वक जाननेवाला नहीं कर सकता।

तथा पुत्रमें जो ‘हे पुत्र! तू मेरा आत्मा ही है’ ऐसी आत्मबुद्धि है, वह जन्य-जनक-सम्बन्धके कारण होनेवाली गौण बुद्धि है, उस गौण आत्मा (पुत्र)-से भोजन आदिकी भाँति१ कोई मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। जैसे कि गौण सिंह और गौण अग्निरूप देवदत्त और बालकद्वारा, मुख्य सिंह और मुख्य अग्निका कार्य नहीं किया जा सकता।

> जैसे पुत्रके भोजन करनेसे पिता तृप्त नहीं हो सकता उसी प्रकार गौण आत्मासे मुख्य आत्माका कोई भी कार्य नहीं हो सकता।

पू०—स्वर्गादि अदृष्ट पदार्थोंके लिये कर्मोंका विधान करनेवाली श्रुतिका प्रमाणत्व होनेसे, यह सिद्ध होता है कि शरीर-इन्द्रिय आदि गौण आत्माओंके द्वारा मुख्य आत्माके कार्य किये जाते हैं।

उ०—ऐसा कहना ठीक नहीं, क्योंकि उनका आत्मत्व अविद्याकर्तृक है। अर्थात् शरीर, इन्द्रिय आदि गौण आत्मा नहीं हैं (किंतु मिथ्या हैं)।

पू०—तो फिर (इनमें आत्मभाव) कैसे होता है?

उ०—मिथ्या प्रतीतिसे ही सङ्गरहित आत्माकी सङ्गति मानकर, इनसे आत्मभाव किया जाता है; क्योंकि उस मिथ्याप्रतीतिके रहते हुए ही उनमें आत्मभावकी सत्ता है, उसके अभावसे आत्मभावना-का भी अभाव हो जाता है।

अभिप्राय यह कि मूर्ख अज्ञानियोंका ही अज्ञान-कालमें ‘मैं बड़ा हूँ, मैं गौर हूँ’ इस प्रकार शरीर-इन्द्रिय आदिके संघातमें आत्माभिमान देखा जाता है। परंतु ‘मैं शरीरादि संघातसे अलग हूँ’ ऐसा समझनेवाले विवेकशीलोंकी, उस समय शरीरादि संघातमें अहंबुद्धि नहीं होती।

सुतरां, मिथ्याप्रतीतिके अभावसे देहात्मबुद्धिका अभाव हो जानेके कारण, यह सिद्ध होता है कि शरीरादिमें आत्मबुद्धि अविद्याकृत ही है, गौण नहीं।

जिनकी समानता और विशेषता अलग-अलग समझ ली गयी है, ऐसे सिंह और देवदत्तमें या अग्नि और बालक आदिमें ही गौण प्रतीति या गौण शब्दका प्रयोग हो सकता है; जिनकी समानता और विशेषता नहीं समझी गयी उनमें नहीं।

तुमने जो कहा कि श्रुतिको प्रमाणरूप माननेसे यह पक्ष सिद्ध होता है वह भी ठीक नहीं; क्योंकि उसकी प्रमाणता अदृष्टविषयक है। अर्थात् प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध न होनेवाले अग्निहोत्रादिके, साध्य, साधन और सम्बन्धके विषयमें ही श्रुतिकी प्रमाणता है; प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उपलब्ध हो जानेवाले विषयोंमें नहीं। क्योंकि श्रुतिकी प्रमाणता अदृष्ट विषयको दिखलानेके लिये ही है (अर्थात् अप्रत्यक्ष विषयको बतलाना ही उसका काम है)।

सुतरां देहादि-संघातमें, प्रत्यक्ष ही मिथ्या ज्ञानसे होनेवाली अहंप्रतीतिको, गौण मानना नहीं बन सकता।

क्योंकि ‘अग्नि ठण्डा है या अप्रकाशक है’ ऐसा कहनेवाली सैकड़ों श्रुतियाँ भी प्रमाणरूप नहीं मानी जा सकतीं। यदि श्रुति ऐसा कहे कि ‘अग्नि ठण्डा है अथवा अप्रकाशक है’ तो ऐसा मान लेना चाहिये कि श्रुतिको कोई और ही अर्थ अभीष्ट है। क्योंकि अन्य प्रकारसे उसकी प्रामाणिकता सिद्ध नहीं हो सकती। परंतु प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणोंके विरुद्ध या श्रुतिके अपने वचनोंके विरुद्ध श्रुतिके अर्थकी कल्पना करना उचित नहीं।

पू०—कर्म मिथ्या ज्ञानयुक्त पुरुषद्वारा ही किये जानेवाले हैं, ऐसा माननेसे वास्तवमें कर्ताका अभाव हो जानेके कारण श्रुतिकी अप्रमाणता (अनर्थकता) ही सिद्ध होती है ऐसा कहें तो?

उ०—नहीं, क्योंकि ब्रह्मविद्यामें उसकी सार्थकता सिद्ध होती है।

पू०—कर्मविधायक श्रुतिकी भाँति ब्रह्मविद्या-विधायक श्रुतिकी अप्रमाणताका प्रसङ्ग आ जायगा, ऐसा माने तो?

उ०—यह ठीक नहीं, क्योंकि उसका कोई बाधक प्रत्यय नहीं हो सकता। अर्थात् जैसे ब्रह्मविद्याविधायक श्रुतिद्वारा आत्मसाक्षात्कार हो जानेपर, देहादि संघातमें आत्मबुद्धि बाधित हो जाती है, वैसे आत्मामें ही होनेवाला आत्मभावका बोध किसीके द्वारा किसी भी कालमें किसी प्रकार भी बाधित नहीं किया जा सकता। क्योंकि वह आत्मज्ञान स्वयं ही फल है, उससे भिन्न किसी अन्य फलकी प्राप्ति नहीं है, जैसे अग्नि उष्ण और प्रकाशस्वरूप है।

इसके सिवा (वास्तवमें) कर्मविधायक श्रुति भी अप्रामाणिक नहीं है, क्योंकि वह पूर्व-पूर्व (स्वाभाविक) प्रवृत्तियोंको रोक-रोककर उत्तरोत्तर नयी-नयी (शास्त्रीय) प्रवृत्तिको उत्पन्न करती हुई (अन्तमें अन्तःकरणकी शुद्धिद्वारा साधकको) अन्तरात्माके सम्मुख करनेवाली प्रवृत्ति उत्पन्न करती है। अतः उपाय मिथ्या होते हुए भी, उपेयकी सत्यतासे, उसकी सत्यता ही है; जैसे कि विधिवाक्यके अन्तमें कहे जानेवाले अर्थवादवाक्योंकी सत्यता मानी जाती है।

लोकव्यवहारमें भी (देखा जाता है कि) उन्मत्त और बालक आदिको दूध आदि पिलानेके लिये चोटी बढ़ने आदिकी बात कही जाती है।

तथा आत्मज्ञान होनेसे पहले, देहाभिमाननिमित्तक प्रत्यक्षादि प्रमाणोंके प्रमाणत्वकी भाँति प्रकारान्तरमें स्थित (कर्मविधायक) श्रुतियोंकी साक्षात् प्रमाणता भी सिद्ध होती है।

तुम जो यह मानते हो कि आत्मा स्वयं क्रिया न करता हुआ भी संनिधिमात्रसे कर्म करता है, यही आत्माका मुख्य कर्तापन है। जैसे राजा स्वयं युद्ध न करते हुए भी संनिधिमात्रसे ही अन्य योद्धाओंके युद्ध करनेसे ‘राजा युद्ध करता है’ ऐसे कहा जाता है तथा ‘वह जीत गया, हार गया’ ऐसे भी कहा जाता है। इसी प्रकार सेनापति भी केवल वाणीसे ही आज्ञा करता है। फिर भी राजा और सेनापतिका उस क्रियाके फलसे सम्बन्ध होता देखा जाता है। तथा जैसे ऋत्विक्के कर्म यजमानके माने जाते हैं, वैसे ही देहादि संघातके कर्म आत्मकृत हो सकते हैं, क्योंकि उनका फल आत्माको ही मिलता है।

तथा जैसे भ्रामक (भ्रमण करानेवाला चुम्बक) स्वयं क्रिया नहीं करता, तो भी वह लोहेका चलाने-वाला है, इसलिये उसीका मुख्य कर्तापन है, वैसे ही आत्माका मुख्य कर्तापन है।

ऐसा मानना ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा माननेसे न करनेवालेको कारक माननेका प्रसङ्ग आ जायगा।

यदि कहो कि कारक तो अनेक प्रकारके होते हैं, तो भी तुम्हारा कहना ठीक नहीं; क्योंकि राजा आदिका मुख्य कर्तापन भी देखा जाता है। अर्थात् राजा अपने निजी व्यापारद्वारा भी युद्ध करता है। तथा योद्धाओंसे युद्ध कराने और उन्हें धन देनेसे भी निःसन्देह उसका मुख्य कर्तापन है, उसी प्रकार जय-पराजय आदि फलभोगोंमें भी उसकी मुख्यता है।

वैसे ही यजमानका भी प्रधान आहुति स्वयं देनेके कारण और दक्षिणा देनेके कारण निःसन्देह मुख्य कर्तृत्व है।

इससे यह निश्चित होता है कि क्रियारहित वस्तुमें जो कर्तापनका उपचार है वह गौण है। यदि राजा और यजमान आदिमें स्वव्यापाररूप मुख्य कर्तापन न पाया जाता तो उनका संनिधिमात्रसे भी मुख्य कर्तापन माना जा सकता था, जैसे कि लोहेको चलानेमें चुम्बकका संनिधिमात्रसे मुख्य कर्तापन माना जाता है, परंतु चुम्बककी भाँति राजा और यजमानका स्वव्यापार उपलब्ध न होता हो— ऐसी बात नहीं है। सुतरां संनिधिमात्रसे जो कर्तापन है वह भी गौण ही है।

ऐसा होनेसे उसके फलका सम्बन्ध भी गौण ही होगा, क्योंकि गौण कर्ताद्वारा मुख्य कार्य नहीं किया जा सकता। अतः यह मिथ्या ही कहा जाता है कि ‘निष्क्रिय आत्मा देहादिकी क्रियासे कर्ता-भोक्ता हो जाता है।’

परंतु भ्रान्तिके कारण सब कुछ हो सकता है। जैसे कि स्वप्न और मायामें होता है। परंतु शरीरादिमें आत्मबुद्धिरूप अज्ञान-सन्ततिका विच्छेद हो जानेपर, सुषुप्ति और समाधि आदि अवस्थाओंमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि अनर्थ उपलब्ध नहीं होता।

इससे यह सिद्ध हुआ कि यह संसारभ्रम मिथ्या ज्ञान-निमित्तक ही है, वास्तविक नहीं, अतः पूर्ण तत्त्वज्ञानसे उसकी आत्यन्तिक निवृत्ति हो जाती है ॥ ६६ ॥

इस अठारहवें अध्यायमें समस्त गीताशास्त्रके अर्थका उपसंहार करके फिर विशेषरूपसे इस अन्तिम श्लोकमें शास्त्रके अभिप्रायको दृढ़ करनेके लिये संक्षेपसे उपसंहार करके, अब शास्त्र-सम्प्रदायकी विधि बतलाते हैं।

तात्पर्य पढ़ें

सर्वधर्मान् सर्वे च ते धर्माः च सर्वधर्माः तान्। धर्मशब्देन अत्र अधर्मः अपि गृह्यते नैष्कर्म्यस्य विवक्षितत्वात् ‘नाविरतो दुश्चरितात्’ (क० उ० १। २। २४) ‘त्यज धर्ममधर्मं च’ (महा० शान्ति० ३२९। ४०) इत्यादिश्रुतिस्मृतिभ्यः।

सर्वधर्मान् परित्यज्य सन्न्यस्य सर्वकर्माणि इति एतत्। माम् एकं सर्वात्मानं समं सर्वभूतस्थम् ईश्वरम् अच्युतं गर्भजन्मजरामरणविवर्जितम् अहम् एव इति एवम् एकं शरणं व्रज न मत्तः अन्यद् अस्ति इति अवधारय इत्यर्थः।

अहं त्वा त्वाम् एवं निश्चितबुद्धिं सर्वपापेभ्यः सर्वधर्माधर्मबन्धनरूपेभ्यो मोक्षयिष्यामि स्वात्म- भावप्रकाशीकरणेन। उक्तं च—‘नाशयाम्यात्म- भावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता’ इति अतो मा शुचः शोकं मा कार्षीः इत्यर्थः ॥ ६६ ॥

अस्मिन् हि गीताशास्त्रे परं निःश्रेयस-साधनं निश्चितं किं ज्ञानं किं कर्म वा आहोस्विद् उभयम् इति।

कुतः सन्देहः?

‘यज्ञात्वामृतमश्नुते’ ‘ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्’ इत्यादीनि वाक्यानि केवलाद् ज्ञानाद् निःश्रेयसप्राप्तिं दर्शयन्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ ‘कुरु कर्मैव’ इत्येवमादीनि कर्मणाम् अवश्यकर्तव्यतां दर्शयन्ति।

एवं ज्ञानकर्मणोः कर्तव्यतोपदेशात् समुच्चितयोः अपि निःश्रेयसहेतुत्वं स्याद् इति भवेत् संशयः।

किं पुनरत्र मीमांसाफलम्।

ननु एतद् एव एषाम् अन्यतमस्य परम-निःश्रेयससाधनत्वावधारणम्। अतो विस्तीर्णतरं मीमांस्यम् एतत्।

आत्मज्ञानस्य तु केवलस्य निःश्रेयस-हेतुत्वं भेदप्रत्ययनिवर्तकत्वेन कैवल्यफलावसान-त्वात्।

क्रियाकारकफलभेदबुद्धिः अविद्यया आत्मनि नित्यप्रवृत्ता मम कर्म अहं कर्ता अमुष्मै फलाय इदं कर्म करिष्यामि इति इयम् अविद्या अनादिकालप्रवृत्ता।

अस्या अविद्याया निवर्तकम् अयम् अहम् अस्मि केवलः अकर्ता अक्रियः अफलो न मत्तः अन्यः अस्ति कश्चिद् इति एवंरूपम् आत्म-विषयं ज्ञानम् उत्पद्यमानं कर्मप्रवृत्तिहेतुभूताया भेदबुद्धेः निवर्तकत्वात्।

तु शब्दः पक्षद्वयव्यावृत्त्यर्थो न केवलेभ्यः कर्मभ्यो न च ज्ञानकर्मभ्यां समुच्चिताभ्यां निःश्रेयसप्राप्तिः इति पक्षद्वयं निवर्तयति।

अकार्यत्वात् च निःश्रेयस्य कर्मसाधन-त्वानुपपत्तिः। न हि नित्यं वस्तु कर्मणा ज्ञानेन वा क्रियते।

केवलं ज्ञानम् अपि अनर्थकं तर्हि?

न अविद्यानिवर्तकत्वे सति दृष्टकैवल्य- फलावसानत्वात् । अविद्यातमोनिवर्तकस्य ज्ञानस्य दृष्टं कैवल्यफलावसानत्वम् ।

रज्ज्वादिविषये सर्पाद्यज्ञानतमोनिवर्तकप्रदीप-

प्रकाशफलवत्, विनिवृत्तसर्पविकल्परज्जु-

कैवल्यावसान हि प्रकाशफलं तथा ज्ञानम्।

दृष्टार्थानां च छिदिक्रियाग्निमन्थनादीनां व्यापृतकर्त्रादिकारकाणां द्वैधीभावाग्नि-दर्शनादिफलाद् अन्यफले कर्मान्तरे व्यापारा-नुपपत्तिः यथा तथा ज्ञाननिष्ठाक्रियायां दृष्टार्थायां व्यापृतस्य ज्ञात्रादिकारकस्य आत्मकैवल्यफलाद् अन्यफले कर्मान्तरे प्रवृत्तिः अनुपपन्ना इति न ज्ञाननिष्ठा कर्मसहिता उपपद्यते।

भुज्यग्निहोत्रादिक्रियावत् स्याद् इति चेत्।

न, कैवल्यफले ज्ञाने क्रियाफलार्थित्वा-

नुपपत्तेः । कैवल्यफले हि ज्ञाने प्राप्ते सर्वतः–

सम्प्लुतोदके फले कूपतडागादिक्रियाफलार्थि-

त्वाभाववत् फलान्तरे तत्साधनभूतायां वा क्रियायाम् अर्थित्वानुपपत्तिः।

न हि राज्यप्राप्तिफले कर्मणि व्यापृतस्य

क्षेत्रप्राप्तिफले व्यापारोपपत्तिः तद्विषयं च अर्थित्वम्।

तस्माद् न कर्मणः अस्ति निःश्रेयससाधन-

त्वम्। न च ज्ञानकर्मणोः समुच्चितयोः नापि

ज्ञानस्य कैवल्यफलस्य कर्मसाहाय्यापेक्षा

अविद्यानिवर्तकत्वेन विरोधात्।

न हि तमः तमसो निवर्तकम् अतः केवलम्

एवं ज्ञानं निःश्रेयससाधनम् इति।

न, नित्याकरणे प्रत्यवायप्राप्तेः कैवल्यस्य च नित्यत्वात्। यत् तावत् केवलज्ञानात् कैवल्यप्राप्तिः इति एतद् असत्। यतो नित्यानां कर्मणां श्रुत्युक्तानाम् अकरणे प्रत्यवायो नरकादिप्राप्तिलक्षणः स्यात्।

ननु एवं तर्हि कर्मभ्यो मोक्षो नास्ति इति अनिर्मोक्ष एव। न एष दोषः, नित्यत्वाद् मोक्षस्य। नित्यानां कर्मणाम् अनुष्ठानात् प्रत्यवायस्य अप्राप्तिः। प्रतिषिद्धस्य च अकरणाद् अनिष्ट-शरीरानुपपत्तिः। काम्यानां च वर्जनाद् इष्टशरीरानुपपत्तिः। वर्तमानशरीरारम्भकस्य च कर्मणः फलोपभोगक्षये पतिते अस्मिन् शरीरे देहान्तरोत्पत्तौ च कारणाभावाद् आत्मनो रागादीनां च अकरणात् स्वरूपावस्थानम् एव कैवल्यम् इति अप्रयत्नकैवल्यम् इति।

अतिक्रान्तानेकजन्मान्तरकृतस्य स्वर्ग-

नरकादिप्राप्तिफलस्य अनारब्धकार्यस्य उपभोगा-

नुपपत्तेः क्षयाभाव इति चेद्।

न, नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखोपभोगस्य तत्फलोपभोगत्वोपपत्तेः। प्रायश्चित्तवद् वा पूर्वोपात्तदुरितक्षयार्थत्वाद् नित्यकर्मणाम्। आरब्धानां च उपभोगेन एव कर्मणां क्षीणत्वाद् अपूर्वाणां च कर्मणाम् अनारम्भे अयत्नसिद्धं कैवल्यम् इति।

न, ‘तमेव विदित्वातिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय’ (श्वे० उ० ३। ८) इति विद्याया अन्यः पन्था मोक्षाय न विद्यते इति श्रुतेः चर्मवत् आकाशवेष्टनासम्भववद् अविदुषो मोक्षासम्भवश्रुतेः। ज्ञानात् कैवल्यम् आप्नोति इति च पुराणस्मृतेः।

अनारब्धफलानां पुण्यानां कर्मणां क्षया- नुपपत्तेः च । यथा पूर्वोपात्तानां दुरितानाम् अनारब्धफलानां सम्भवः तथा पुण्यानाम् अपि अनारब्धफलानां स्यात् सम्भवः । तेषां च देहान्तरम् अकृत्वा क्षयानुपपत्तौ मोक्षा- नुपपत्तिः ।

धर्माधर्महेतूनां च रागद्वेषमोहानाम् अन्यत्र आत्मज्ञानाद् उच्छेदानुपपत्तेः धर्माधर्मोच्छेदानुपपत्तिः।

नित्यानां च कर्मणां पुण्यलोकफलश्रुतेः

‘वर्णा आश्रमाश्च स्वकर्मनिष्ठा:’ (आ० स्मृ० २।२।)

२। ३) इत्यादिस्मृतेः च कर्मक्षयानुपपत्तिः।

ये तु आहुः नित्यानि कर्माणि दुःखरूप- त्वाद् पूर्वकृतदुरितकर्मणां फलम् एव न तु तेषां स्वरूपव्यतिरेकेण अन्यत् फलम् अस्ति अश्रुत- त्वाद् जीवनादिनिमित्ते च विधानाद् इति । न, अप्रवृत्तानां फलदानासम्भवात्, दुःखफल- विशेषानुपपत्तिः च स्यात् ।

यद् उक्तं पूर्वजन्मकृतदुरितानां कर्मणां फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखं भुज्यते इति तद् असत् । न हि मरणकाले फलदानाय अनङ्कुरीभूतस्य कर्मणः फलम् अन्यकर्मारब्धे जन्मनि उपभुज्यते इति उपपत्तिः ।

अन्यथा स्वर्गफलोपभोगाय अग्निहोत्रादि कर्मारब्धे जन्मनि नरककर्मफलोपभोगा- नुपपत्तिः न स्यात् ।

तस्य दुरितदुःखविशेषफलत्वानुपपत्तेः च, अनेकेषु हि दुरितेषु सम्भवत्सु भिन्नदुःखसाधन-फलेषु नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखमात्रफलेषु कल्प्यमानेषु द्वन्द्वरोगादिबाधानिमित्तं न हि शक्यते कल्पयितुं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखम् एव पूर्वकृतदुरितफलं न शिरसा पाषाण-वहनादिदुःखम् इति ।

अप्रकृतं च इदम् उच्यते नित्यकर्मानुष्ठाना- यासदुःखं पूर्वकृतदुरितकर्मफलम् इति । कथम्, अप्रसूतफलस्य पूर्वकृतदुरितस्य क्षयो न उपपद्यते इति प्रकृतं तत्र प्रसूतफलस्य कर्मणः फलं नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखम् आह भवान् न अप्रसूतफलस्य इति ।

अथ सर्वम् एव पूर्वकृतं दुरितं प्रसूतफलम् एव इति मन्यते भवान् ततो नित्यकर्मानुष्ठाना-

यासदुःखम् एव फलम् इति विशेषणम् अयुक्तं

नित्यकर्मविध्यानर्थक्यप्रसङ्गः च उपभोगेन एव प्रसूतफलस्य दुरितकर्मणः क्षयोपपत्तेः ।

किं च श्रुतस्य नित्यस्य दुःखं कर्मणः चेत्

फलम्, नित्यकर्मानुष्ठानायासाद् एव तद् दृश्यते

व्यायामादिवत् तद् अन्यस्य इति कल्पना-नुपपत्तिः ।

जीवनादिनिमित्ते च विधानाद् नित्यानां कर्मणाम्, प्रायश्चित्तवत् पूर्वकृतदुरितफलत्वानुपपत्तिः । यस्मिन् पापकर्मनिमित्ते यद्विहितं प्रायश्चित्तं न तु तस्य पापस्य तत् फलम् । अथ तस्य एव पापस्य निमित्तस्य प्रायश्चित्तदुःखं फलं जीवनादिनिमित्तम् अपि नित्यकर्मानुष्ठानायासदुःखं जीवनादिनिमित्तस्य एव तत् फलं प्रसज्येत नित्यप्रायश्चित्तयोः नैमित्तिकत्वाविशेषात् ।

किं च अन्यद् नित्यस्य काम्यस्य च अग्निहोत्रादेः अनुष्ठानायासदुःखस्य तुल्यत्वाद् नित्यानुष्ठानायासदुःखम् एव पूर्वकृतदुरितस्य फलं न तु काम्यानुष्ठानायासदुःखम् इति विशेषो न अस्ति इति तद् अपि पूर्वकृत-दुरितफलं प्रसज्येत।

तथा च सति नित्यानां फलाश्रवणात् तद्विधानान्यथानुपपत्तेः च नित्यानुष्ठानायास-दुःखं पूर्वकृतदुरितफलम् इति अर्थापत्तिकल्पना अनुपपन्ना ।

एवं विधानान्यथानुपपत्तेः अनुष्ठानायास-दुःखव्यतिरिक्तफलत्वानुमानात् च नित्यानाम् ।

विरोधात् च। विरुद्धं च इदम् उच्यते नित्यकर्मणि अनुष्ठीयमाने अन्यस्य कर्मणः फलं भुज्यते इति अभ्युपगम्यमाने स एव उपभोगो नित्यस्य कर्मणः फलम् इति नित्यस्य कर्मणः फलाभाव इति च विरुद्धम् उच्यते।

किं च काम्याग्निहोत्रादौ अनुष्ठीयमाने नित्यम् अपि अग्निहोत्रादि तन्त्रेण एव अनुष्ठितं भवति इति तदायासदुःखेन एव काम्याग्नि- होत्रादिफलम् उपक्षीणं स्यात् तत्तन्त्रत्वात् ।

अथ काम्याग्निहोत्रादिफलम् अन्यद् एव स्वर्गादि तदनुष्ठानायासदुःखम् अपि भिन्नं प्रसज्येत । न च तद् अस्ति दृष्टविरोधात् । न हि काम्यानुष्ठानायासदुःखात् केवलनित्यानुष्ठानायासदुःखं विद्यते ।

तत्कालफलम्। भवेद् यदि तदा स्वर्गादिषु अपि अदृष्टफलशासने च उद्यमो न स्यात्।

अग्निहोत्रादीनाम् एव कर्मस्वरूपाविशेषे अनुष्ठानायासदुःखमात्रेण उपक्षयः । काम्यानां च स्वर्गादिमहाफलत्वम् अङ्गेतिकर्तव्यता-द्याधिक्ये तु असति फलकामित्वमात्रेण इति न शक्यं कल्पयितुम् ।

तस्माद् न नित्यानां कर्मणाम् अदृष्टफलाभावः कदाचिद् अपि उपपद्यते । अतः च अविद्या-पूर्वकस्य कर्मणो विद्या एव शुभस्य अशुभस्य वा क्षयकारणम् अशेषतो न नित्यकर्मानुष्ठानम् ।

अविद्याकामबीजं हि सर्वम् एव कर्म । तथा च उपपादितम् । अविद्वद्विषयं कर्म विद्वद्विषया च सर्वकर्मसन्न्यासपूर्विका ज्ञाननिष्ठा ।

‘उभौ तौ न विजानीतः’ ‘वेदाविनाशिनं नित्यम्’ ‘ज्ञानयोगेन साङ्ख्यानां कर्मयोगेन योगिनाम्’ ‘अज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्’ ‘तत्त्ववित्तु’ ‘गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते’ ‘सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते’ ‘नैव किञ्चित् करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्’ अर्थाद् अज्ञः करोमि इति।

आरुरुक्षोः कर्म कारणम् आरूढस्य योगस्थस्य शम एव कारणम्। उदाराः त्रयः अपि अज्ञाः, ज्ञानी तु आत्मा एव मे मतम्।

अज्ञाः कर्मिणो गतागतं कामकामा लभन्ते । अनन्याः चिन्तयन्तो मां नित्ययुक्ता यथोक्तम् आत्मानम् आकाशकल्पम् अकल्मषम् उपासते ।

‘ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते।’

अर्थाद् न कर्मिणः अज्ञा उपयान्ति ।

भगवत्कर्मकारिणो ये युक्ततमा अपि

कर्मिणः अज्ञाः ते उत्तरोत्तरहीनफलत्यागा- वसानसाधनाः ।

अनिर्देश्याक्षरोपासकाः तु ‘अद्वेष्टा सर्व-भूतानाम्’ इत्यादि आअध्यायपरिसमाप्ति उक्त-साधनाः क्षेत्राध्यायाद्यध्यायत्रयोक्तज्ञान-साधनाः च ।

अधिष्ठानादिपञ्चहेतुकसर्वकर्मसन्न्यासिनाम् आत्मैकत्वाकर्तृत्वज्ञानवतां परस्यां ज्ञाननिष्ठायां वर्तमानानां भगवत्तत्त्वविदाम् अनिष्टादिकर्म- फलत्रयं परमहंसपरिव्राजकानाम् एवं लब्धभग- वत्स्वरूपात्मैकत्वशरणानां न भवति। भवति एव अन्येषाम् अज्ञानां कर्मिणाम् असन्न्यासिनाम् इति एष गीताशास्त्रोक्तस्य कर्तव्याकर्तव्यार्थस्य विभागः ।

अविद्यापूर्वकत्वं सर्वस्य कर्मणः असिद्धम् इति चेत् ।

न, ब्रह्महत्यादिवत् । यद्यपि शास्त्रावगतं

नित्यं कर्म तथापि अविद्यावत एव भवति।।

यथा प्रतिषेधशास्त्रावगतम् अपि ब्रह्महत्यादि-

लक्षणं कर्म अनर्थकारणम् अविद्याकामादिदोष-

वतो भवति अन्यथा प्रवृत्त्यनुपपत्तेः तथा

नित्यनैमित्तिककाम्यानि अपि इति ।

व्यतिरिक्तात्मनि अज्ञाते प्रवृत्तिः नित्यादि-

कर्मसु अनुपपन्ना इति चेत्।

न, चलनात्मकस्य कर्मणः अनात्मकर्तृकस्य

अहं करोमि इति प्रवृत्तिदर्शनात् ।

देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो गौणो न मिथ्या

इति चेत् । न, तत्कार्येषु अपि गौणत्वोपपत्तेः ।

आत्मीये देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो गौणो

यथा आत्मीये पुत्रे ‘आत्मा वै पुत्र नामासि’

(तै० सं० २। ११) इति, लोके च अपि मम

प्राण एव अयं गौः इति तद्वद् न एव अयं

मिथ्याप्रत्ययः, मिथ्याप्रत्ययः तु स्थाणुपुरुषयोः

अगृह्यमाणविशेषयोः ।

न गौणप्रत्ययस्य मुख्यकार्यार्थत्वम् अधि-

करणस्तुत्यर्थत्वाद् लुप्तोपमाशब्देन ।

यथा सिंहो देवदत्तः अग्निः माणवक इति

सिंह इव अग्निः इव क्रौर्यपैङ्गल्यादिसामान्य-

वत्त्वाद् देवदत्तमाणवकाधिकरणस्तुत्यर्थम् एव,

न तु सिंहकार्यम् अग्निकार्यं वा गौणशब्दप्रत्यय-

निमित्तं किञ्चित् साध्यते, मिथ्याप्रत्ययकार्यं तु

अनर्थम् अनुभवति ।

गौणप्रत्ययविषयं च जानाति न एष सिंहो

देवदत्तः स्याद् न अयम् अग्निः माणवक इति ।

तथा गौणेन देहादिसङ्घातेन आत्मना कृतं कर्म न मुख्येन अहम्प्रत्ययविषयेण आत्मना कृतं स्यात्। न हि गौणसिंहाग्निभ्यां कृतं कर्म मुख्यसिंहाग्निभ्यां कृतं स्यात्। न च क्रौर्येण पैङ्गल्येन वा मुख्यसिंहाग्न्योः कार्यं किञ्चित् क्रियते स्तुत्यर्थत्वेन उप- क्षीणत्वात्।

स्तूयमानौ च जानीतो न अहं सिंहो न

अहम् अग्निः इति, न सिंहस्य कर्म मम अग्नेः

च इति, तथा न सङ्घा तस्य कर्म मम मुख्यस्य

आत्मन इति प्रत्ययो युक्ततरः स्याद् न पुनः

अहं कर्ता मम कर्म इति।

यत् च आहुः आत्मीयैः स्मृतीच्छाप्रयत्नैः

कर्महेतुभिः आत्मा करोति इति। न, तेषां

मिथ्याप्रत्ययपूर्वकत्वात् । मिथ्याप्रत्यय-

निमित्तेष्टानिष्टानुभूतक्रियाफलजनितसंस्कार-

पूर्वका हि स्मृतीच्छाप्रयत्नादयः ।

यथा अस्मिन् जन्मनि देहादिसङ्घाताभिमान-

रागद्वेषादिकृतौ धर्माधर्मौ तत्फलानुभवः च

तथा अतीते अतीततरे अपि जन्मनि इति

अनादिः अविद्याकृतः संसारः अतीतः अनागतः

च अनुमेयः ।

ततः च सर्वकर्मसन्न्यासाद् ज्ञाननिष्ठायाम् आत्यन्तिकः संसारोपरम इति सिद्धम् ।

अविद्यात्मकत्वात् च देहाभिमानस्य तन्निवत्तौ देहानुपपत्तेः संसारानुपपत्तिः ।

देहादिसङ्घाते आत्माभिमानः अविद्यात्मकः । न हि लोके गवादिभ्यः अन्यः अहं मत्तः च अन्ये गवादय इति जानन् तेषु अहम् इति प्रत्ययं मन्यते कश्चित् ।

अजानन् तु स्थाणौ पुरुषविज्ञानवद् अविवेकतो देहादिसङ्घाते कुर्याद् अहम् इति प्रत्ययं न विवेकतो जानन् ।

यः तु ‘आत्मा वै पुत्र नामासि’ (तै० सं० २। ११) इति पुत्रे अहम्प्रत्ययः स तु जन्यजनकसम्बन्धनिमित्तो गौणः । गौणेन च आत्मना भोजनादिवत् परमार्थकार्यं न शक्यते कर्तुं गौणसिंहाग्निभ्यां मुख्यसिंहाग्निकार्यवत् ।

अदृष्टविषयचोदनाप्रामाण्याद् आत्मकर्तव्यं

गौणैः देहेन्द्रियात्मभिः क्रियते इति चेत् ।

न, अविद्याकृतात्मकत्वात् तेषाम् । न गौणाः

आत्मानो देहेन्द्रियादयः ।

कथं तर्हि ।

मिथ्याप्रत्ययेन एव असङ्गस्य आत्मनः

सङ्गत्यात्मत्वम् आपाद्यते तद्भावे भावात्

तदभावे च अभावात्।

अविवेकिनां हि अज्ञानकाले बालानां दृश्यते दीर्घः अहं गौरः अहम् इति देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो न तु विवेकिनाम् अन्यः अहं देहादिसङ्घाताद् इति ज्ञानवतां तत्काले देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो भवति ।

तस्माद् मिथ्याप्रत्ययाभावे अभावात् तत्कृत

एव न गौणः ।

पृथग्गृह्यमाणविशेषसामान्ययोः हि सिंह-

देवदत्तयोः अग्निमाणवकयोः वा गौणः प्रत्ययः

शब्दप्रयोगो वा स्याद् न अगृह्यमाणसामान्य- विशेषयोः।

यत् तु उक्तं श्रुतिप्रामाण्याद् इति। न, तत्

प्रामाण्यस्य अदृष्टविषयत्वात् । प्रत्यक्षादि-

प्रमाणानुपलब्धे हि विषये अग्निहोत्रादिसाध्य-

साधनसम्बन्धे श्रुतेः प्रामाण्यं न प्रत्यक्षादिविषये

अदृष्टदर्शनार्थत्वात् प्रामाण्यस्य ।

तस्माद् न दृष्टमिथ्याज्ञाननिमित्तस्य अहम्प्रत्ययस्य देहादिसङ्घाते गौणत्वं कल्पयितुं शक्यम् ।

न हि श्रुतिशतम् अपि शीतः अग्निः अप्रकाशो वा इति ब्रुवत् प्रामाण्यम् उपैति। यदि ब्रूयात् शीतः अग्निः अप्रकाशो वा इति अथापि अर्थान्तरं श्रुतेः विवक्षितं कल्प्यं प्रामाण्यान्यथानुपपत्तेः न तु प्रमाणान्तरविरुद्धं स्ववचनविरुद्धं वा।

कर्मणो मिथ्याप्रत्ययवत्कर्तृकत्वात् कर्तुः

अभावे श्रुतेः अप्रामाण्यम् इति चेत्।

न, ब्रह्मविद्यायाम् अर्थवत्त्वोपपत्तेः।

कर्मविधिश्रुतिवद् ब्रह्मविद्याविधिश्रुतेः।

अप्रामाण्यप्रसङ्ग इति चेत्।

न, बाधकप्रत्ययानुपपत्तेः। यथा ब्रह्मविद्या-विधिश्रुत्या आत्मनि अवगते देहादिसङ्घाते अहम्प्रत्ययो बाध्यते तथा आत्मनि एव आत्मावगतिः न कदाचित् केनचित् कथञ्चिद् अपि बाधितुं शक्या फलाव्यतिरेकावगतेः यथा अग्निः उष्णः प्रकाशः च इति।

न च कर्मविधिश्रुतेः अप्रामाण्यम्, पूर्वपूर्व- प्रवृत्तिनिरोधेन उत्तरोत्तरापूर्वप्रवृत्तिजननस्य प्रत्यगात्माभिमुख्यप्रवृत्त्युत्पादनार्थत्वात्। मिथ्यात्वे अपि उपायस्य उपेयसत्यतया सत्यत्वम् एव स्याद् यथा अर्थवादानां विधिशेषाणाम्।

लोके अपि बालोन्मत्तादीनां पय आदौ

पाययितव्ये चूडावर्धनादिवचनम्।

प्रकारान्तरस्थानां च साक्षाद् एव प्रामाण्य-

सिद्धिः प्राग् आत्मज्ञानाद् देहाभिमाननिमित्त-प्रत्यक्षादिप्रामाण्यवत्।

यत् तु मन्यसे स्वयम् अव्याप्रियमाणः अपि आत्मा सन्निधिमात्रेण करोति तद् एव च मुख्यं कर्तृत्वम् आत्मनः यथा राजा युध्यमानेषु योधेषु युध्यते इति प्रसिद्धं स्वयम् अयुध्यमानः अपि सन्निधानाद् एव जितः पराजितः च इति च तथा सेनापतिः वाचा एव करोति क्रियाफलसम्बन्धः च राज्ञः सेनापतेः च दृष्टः, यथा च ऋत्विक्कर्म यजमानस्य, तथा देहादीनां कर्म आत्मकृतं स्यात् तत्फलस्य आत्मगामित्वात्।

यथा च भ्रामकस्य लोहभ्रामयितृत्त्वाद्

अव्यापृतस्य एव मुख्यम् एव कर्तृत्वं तथा च आत्मन इति।

तद् असत्, अकुर्वतः कारकत्वप्रसङ्गात्।

कारकम् अनेकप्रकारम् इति चेत्। न, राजप्रभृतीनां मुख्यस्य अपि कर्तृत्वस्य दर्शनात्। राजा तावत् स्वव्यापारेण अपि युध्यते योधानां योधयितृत्वेन धनदानेन च मुख्यम् एव कर्तृत्वं तथा जयपराजयफलोपभोगे।

तथा यजमानस्य अपि प्रधानत्यागेन

दक्षिणादानेन च मुख्यम् एव कर्तृत्वम् ।

तस्माद् अव्यापृतस्य कर्तृत्वोपचारो यः स गौण इति अवगम्यते। यदि मुख्यं कर्तृत्वं स्वव्यापारलक्षणं न उपलभ्यते राजयजमानप्रभृतीनां तदा सन्निधिमात्रेण अपि कर्तृत्वं मुख्यं परिकल्प्येत यथा भ्रामकस्य लोहभ्रामणेन न तथा राजयजमानादीनां स्वव्यापारो न उपलभ्यते। तस्मात् सन्निधि-मात्रेण अपि कर्तृत्वं गौणम् एव।

तथा च सति तत्फलसम्बन्धः अपि गौण एव स्यात्। न गौणेन मुख्यं कार्यं निर्वर्त्यते। तस्माद् असद् एव एतद् गीयते देहादीनां व्यापारेण अव्यापृत आत्मा कर्ता भोक्ता च स्याद् इति।

भ्रान्तिनिमित्तं तु सर्वम् उपपद्यते। यथा स्वप्ने मायायां च एवम्। न च देहाद्यात्मा-प्रत्ययभ्रान्तिसन्तानविच्छेदेषु सुषुप्तिसमाध्यादिषु कर्तृत्वभोक्तृत्वादिः अनर्थ उपलभ्यते।

तस्माद् भ्रान्तिप्रत्ययनिमित्त एव अयं संसारभ्रमो न तु परमार्थ इति सम्यग्दर्शनाद् अत्यन्तम् एव उपरम इति सिद्धम् ॥ ६६ ॥

सर्वं गीताशास्त्रार्थम् उपसंहृत्य अस्मिन् अध्याये विशेषतः च अन्ते इह शास्त्रार्थ-दार्ढ्याय सङ्क्षेपत उपसंहारं कृत्वा अथ इदानीं शास्त्रसम्प्रदायविधिम् आह—