अध्याय 18 - श्लोक 67

( शास्त्रके उपसंहारका प्रकरण )
( सिद्धान्तका प्रतिपादन )
विंक च अन्यद् अविहितम् अप्रतिषिद्धं च कर्म
इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन। न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति॥ ६७ ॥

( śāstrake upasaṃhārakā prakaraṇa )
( siddhāntakā pratipādana )
viṃka ca anyad avihitam apratiṣiddhaṃ ca karma
idaṃ te nātapaskāya nābhaktāya kadācana. na cāśuśrūṣave vācyaṃ na ca māṃ yo’bhyasūyati.. 67 ..


तेरे हितके लिये अर्थात् संसारका उच्छेद करनेके लिये, कहा हुआ यह शास्त्र, तपरहित मनुष्यको नहीं सुनाना चाहिये। इस प्रकार ‘वाच्यम्’ इस व्यवधानयुक्त पदसे ‘न’ का सम्बन्ध है।

तपस्वी होनेपर भी जो अभक्त हो अर्थात् गुरु या देवतामें भक्ति रखनेवाला न हो उसे कभी—किसी अवस्थामें भी नहीं सुनाना चाहिये।

भक्त और तपस्वी होकर भी जो शुश्रूषु (सुननेका इच्छुक) न हो उसे भी नहीं सुनाना चाहिये।

तथा जो मुझ वासुदेवको प्राकृत मनुष्य मान-कर, मुझमें दोष-दृष्टि करता हो, मुझे ईश्वर न जाननेसे, मुझमें आत्मप्रशंसादि दोषोंका अध्यारोप करके, मेरे ईश्वरत्वको सहन न कर सकता हो वह भी अयोग्य है, उसे भी (यह शास्त्र) नहीं सुनाना चाहिये।

अर्थापत्तिसे यह निश्चय होता है कि यह शास्त्र भगवान्‌में भक्ति रखनेवाले, तपस्वी, शुश्रूषायुक्त और दोष-दृष्टिरहित पुरुषको ही सुनाना चाहिये।

अन्य स्मृतियोंमें मेधावीको या तपस्वीको, इस प्रकार इन दोनोंका विकल्प देखा जाता है, इसलिये यह समझना चाहिये कि शुश्रूषा और भक्तियुक्त तपस्वीको अथवा इन तीनों गुणोंसे युक्त मेधावीको यह शास्त्र सुनाना चाहिये। शुश्रूषा और भक्तिसे रहित तपस्वी या मेधावी किसीको भी नहीं सुनाना चाहिये।

भगवान्‌में दोष-दृष्टि रखनेवाला तो यदि सर्वगुण-सम्पन्न हो, तो भी उसे नहीं सुनाना चाहिये। गुरु-शुश्रूषा और भक्ति-युक्त पुरुषको ही सुनाना चाहिये। इस प्रकार यह शास्त्र-सम्प्रदायकी विधि है ॥ ६७ ॥

अब इस शास्त्र-परम्पराको चलानेवालोंके लिये फल बतलाते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

इदं शास्त्रं ते तव हिताय मया उक्तं संसारविच्छित्तये अतपस्काय तपोरहिताय न वाच्यम् इति व्यवहितेन सम्बध्यते।

तपस्विने अपि अभक्ताय गुरुदेवभक्तिरहिताय कदाचन कस्याञ्चिद् अपि अवस्थायां न वाच्यम्।

भक्तः तपस्वी अपि सन् अशुश्रूषुः यो भवति तस्मै अपि न वाच्यम् ।

न च यो मां वासुदेवं प्राकृतं मनुष्यं मत्वा अभ्यसूयति आत्मप्रशंसादिदोषाध्यारोपणेन

मम ईश्वरत्वम् अजानन् न सहते असौ अपि अयोग्यः तस्मै अपि न वाच्यम्।

भगवति भक्ताय तपस्विने शुश्रूषवे अनसूयवे च वाच्यं शास्त्रम् इति सामर्थ्याद् गम्यते।

तत्र मेधाविने तपस्विने वा इति अनयोः विकल्पदर्शनात् शुश्रूषाभक्तियुक्ताय तपस्विने तद्युक्ताय मेधाविने वा वाच्यम्। शुश्रूषाभक्तिवियुक्ताय न तपस्विने न अपि मेधाविने वाच्यम्।

भगवति असूयायुक्ताय समस्तगुणवते अपि न वाच्यम् । गुरुशुश्रूषाभक्तिमते च वाच्यम् इति एष शास्त्रसम्प्रदायविधिः ॥ ६७ ॥

सम्प्रदायस्य कर्तुः फलम् इदानीम् आह—