नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥ ७३ ॥
arjuna uvāca—
naṣṭo mohaḥ smṛtirlabdhā tvatprasādānmayācyuta .
sthito’smi gatasandehaḥ kariṣye vacanaṃ tava .. 73 ..
हे अच्युत! मेरा अज्ञानजन्य मोह, जो कि समस्त संसाररूप अनर्थ का कारण था और समुद्र की भाँति दुस्तर था, नष्ट हो गया है। और हे अच्युत! आपकी कृपा के आश्रित होकर मैंने आपकी कृपा से आत्मविषयक ऐसी स्मृति भी प्राप्त कर ली है कि जिसके प्राप्त होने से समस्त ग्रन्थियाँ—संशय विच्छिन्न हो जाते हैं।
इस मोहनाश विषयक प्रश्नोत्तर से यह बात निश्चित रूप से दिखलायी गयी है कि जो यह अज्ञानजनित मोह का नाश और आत्मविषयक स्मृति का लाभ है, बस, इतना ही समस्त शास्त्रों के अर्थज्ञान का फल है।
इसी तरह (छान्दोग्य) श्रुति में भी ‘मैं आत्मा को न जाननेवाला शोक करता हूँ’ इस प्रकार प्रकरण उठाकर आत्मज्ञान होने पर समस्त ग्रन्थियों का विच्छेद बतलाया है।
तथा ‘हृदय की ग्रन्थि विच्छिन्न हो जाती है’ ‘वहाँ एकता का अनुभव करनेवाले को कैसा मोह और कैसा शोक?’ इत्यादि मन्त्रवर्ण भी हैं।
अब मैं संशयरहित हुआ आपकी आज्ञा के अधीन खड़ा हूँ। मैं आपका कहना करूँगा। अभिप्राय यह है कि मैं आपकी कृपा से कृतार्थ हो गया हूँ (अब) मेरा कोई कर्तव्य शेष नहीं है ॥ ७३ ॥
शास्त्र का अभिप्राय समाप्त हो चुका। अब कथा का सम्बन्ध दिखलाने के लिये संजय बोला—
तात्पर्य पढ़ें
नष्टो मोहः अज्ञानजः समस्तसंसारानर्थहेतुः सागर इव दुस्तरः । स्मृतिः च आत्मतत्त्वविषया लब्धा । यस्या लाभात् सर्वग्रन्थीनां विप्रमोक्षः । त्वत्प्रसादात् तव प्रसादाद् मया त्वत्प्रसादम् आश्रितेन अच्युत ।
अनेन मोहनाशप्रश्नप्रतिवचनेन सर्व-शास्त्रार्थज्ञानफलम् एतावद् एव इति निश्चितं दर्शितं भवति यद् उत अज्ञानासम्मोहनाश आत्मस्मृतिलाभः च इति।
तथा च श्रुतौ ‘अनात्मवित् शोचामि’ (छा० उ० ७। १। ३) इति उपन्यस्य आत्मज्ञाने सर्वग्रन्थिविप्रमोक्ष उक्तः।
‘भिद्यते हृदयग्रन्थिः’ (मु० उ० २। २। ८) ‘तत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः’ (ई० उ० ७) इति च मन्त्रवर्णः।
अथ इदानीं त्वच्छासने स्थितः अस्मि गतसन्देहो मुक्तसंशयः करिष्ये वचनं तव अहं त्वत्प्रसादात् कृतार्थो न मम कर्तव्यम् अस्ति इति अभिप्रायः ॥ ७३ ॥
परिसमाप्तः शास्त्रार्थः अथ इदानीं कथासम्बन्धप्रदर्शनार्थं सञ्जय उवाच—