इति ॥ ९ ॥
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जो अधिकारी, आसक्ति और फलवासना छोड़कर नित्यकर्म करता है, उसका फलासक्ति आदि दोषोंसे दूषित न किया हुआ अन्तःकरण, नित्यकर्मोंके अनुष्ठानद्वारा संस्कृत होकर विशुद्ध हो जाता है।
विशुद्ध और प्रसन्न अन्तःकरण ही आध्यात्मिक विषयकी आलोचनामें समर्थ होता है। अतः इस प्रकार नित्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जिसका अन्तःकरण विशुद्ध हो गया है एवं जो आत्मज्ञानके अभिमुख है, उसकी उस आत्मज्ञानमें जिस प्रकार क्रमसे स्थिति होती है, वह कहनी है, इसलिये कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
यः तु अधिकृतः सङ्गं त्यक्त्वा फलाभिसन्धिं च नित्यं कर्म करोति तस्य फलरागादिना अकलुषीक्रियमाणम् अन्तःकरणं नित्यैः च कर्मभिः संस्क्रियमाणं विशुध्यति ।
विशुद्धं प्रसन्नम् आत्मालोचनक्षमं भवति तस्य एव नित्यकर्मानुष्ठानेन विशुद्धान्तःकरणस्य आत्मज्ञानाभिमुखस्य क्रमेण यथा तन्निष्ठा स्यात् तद् वक्तव्यम् इति आह—