सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः ॥ १० ॥
tamuvāca hṛṣīkeśaḥ prahasanniva bhārata .
senayorubhayormadhye viṣīdantamidaṃ vacaḥ .. 10 ..
यहाँ ‘दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम्’ इस श्लोक से लेकर ‘न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह’ इस श्लोक तक के ग्रन्थ की व्याख्या यों कर लेनी चाहिये कि यह प्रकरण प्राणियों के शोक, मोह आदि जो संसार के बीजभूत दोष हैं, उनकी उत्पत्तिका कारण दिखलाने के लिये है।
क्योंकि ‘कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये’ इत्यादि श्लोकों द्वारा अर्जुन ने इसी तरह राज्य, गुरुपुत्र, मित्र, सुहृद्, स्वजन, सम्बन्धी और बान्धवों के विषय में ‘यह मेरे हैं, मैं इनका हूँ’ इस प्रकार अज्ञानजनित स्नेह-विच्छेद आदि कारणों से होने वाले अपने शोक और मोह दिखाये हैं।
यद्यपि (वह अर्जुन) स्वयं ही पहले क्षात्रधर्मरूप युद्ध में प्रवृत्त हुआ था तो भी शोक-मोह के द्वारा विवेक-विज्ञान के दब जाने पर (वह) उस युद्ध से रुक गया और भिक्षा द्वारा जीवन-निर्वाह करना आदि दूसरों के धर्म का आचरण करने के लिये प्रवृत्त हो गया।
इसी तरह शोक-मोह आदि दोषों से जिनका चित्त घिरा हुआ हो, ऐसे सभी प्राणियों से स्वधर्म का त्याग और निषिद्ध धर्म का सेवन स्वाभाविक ही होता है।
यदि वे स्वधर्मपालन में लगे हुए हों तो भी उनके मन, वाणी और शरीरादि की प्रवृत्ति फलाकांक्षापूर्वक और अहंकारसहित ही होती है।
ऐसा होने से पुण्य-पाप दोनों बढ़ते रहने के कारण अच्छे-बुरे जन्म और सुख-दुःखों की प्राप्तिरूप संसार निवृत्त नहीं हो पाता, अतः शोक और मोह यह दोनों संसार के बीजरूप हैं।
इन दोनों की निवृत्ति सर्व-कर्म-संन्यासपूर्वक आत्मज्ञान के अतिरिक्त अन्य उपाय से नहीं हो सकती। अतः उसका (आत्मज्ञान का) उपदेश करने की इच्छा वाले भगवान् वासुदेव सब लोगों पर अनुग्रह करने के लिये अर्जुन को निमित्त बनाकर कहने लगे ‘अशोच्यान्’ इत्यादि।
इसपर कितने ही टीकाकार कहते हैं कि केवल सर्व-कर्म-संन्यासपूर्वक आत्मज्ञान-निष्ठामात्र से ही कैवल्य की (मोक्ष की) प्राप्ति नहीं हो सकती, किंतु अग्निहोत्रादि श्रौत-स्मार्त-कर्मों सहित ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है, यही सारी गीता का निश्चित अभिप्राय है।
इस अर्थ में वे प्रमाण भी बतलाते हैं, जैसे— ‘अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि’ ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ ‘कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम्’ इत्यादि।
(वे यह भी कहते हैं कि) हिंसा आदि से युक्त होने के कारण वैदिक कर्म अधर्म का कारण है, ऐसी शंका भी नहीं करनी चाहिये; क्योंकि गुरु, भ्राता और पुत्रादि की हिंसा ही जिसका स्वरूप है ऐसा अत्यन्त क्रूर युद्धरूप क्षात्रकर्म भी स्वधर्म माना जाने के कारण अधर्म का हेतु नहीं है, ऐसा कहने वाले तथा उसके न करने में ‘ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि’ इस प्रकार दोष बतलाने वाले भगवान् का यह कथन तो पहले ही सुनिश्चित हो जाता है कि ‘जीवनपर्यन्त कर्म करें’ इत्यादि श्रुतिवाक्यों द्वारा वर्णित पशु आदि की हिंसारूप कर्मों को करना अधर्म नहीं है।
परंतु वह (उन लोगों का कहना) ठीक नहीं है; क्योंकि भिन्न-भिन्न दो बुद्धियों के आश्रित रहने वाली ज्ञाननिष्ठा और कर्मनिष्ठा का अलग-अलग वर्णन है।
‘अशोच्यान्’ इस श्लोक से लेकर ‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य’ इस श्लोक के पहले के प्रकरण से भगवान् ने जिस परमार्थ-आत्मतत्त्व का निरूपण किया है वह सांख्य है, तद्विषयक जो बुद्धि है अर्थात् आत्मा में जन्मादि छहों विकारों का अभाव होने के कारण आत्मा अकर्ता है, इस प्रकार का जो निश्चय उक्त प्रकरण के अर्थ का विवेचन करने से उत्पन्न होता है, वह सांख्यबुद्धि है, वह जिन ज्ञानियों के लिये उचित होती है (जो उसके अधिकारी हैं) वे सांख्ययोगी हैं।
इस (उपर्युक्त) बुद्धि के उत्पन्न होने से पहले-पहले, आत्मा का देहादि से पृथक्पन, कर्तापन और भोक्तापन मानने की अपेक्षा रखने वाला, जो धर्म-अधर्म के विवेक से युक्त मार्ग है, मोक्षसाधनों का अनुष्ठान करने के लिये चेष्टा करना ही जिसका स्वरूप है, उसका नाम योग है और तद्विषयक जो बुद्धि है, वह योग-बुद्धि है, वह जिन कर्मियों के लिये उचित होती है (जो उसके अधिकारी हैं) वे योगी हैं।
इसी प्रकार भगवान् ने ‘एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु’ इस श्लोक से अलग-अलग दो बुद्धियाँ दिखलायी हैं।
उन दोनों बुद्धियों में से सांख्यबुद्धि के आश्रित रहने वाली सांख्ययोगियों की ज्ञानयोग से (होने वाली) निष्ठा को ‘पुरा वेदात्मना मया प्रोक्ता’ इत्यादि वचनों से अलग कहेंगे।
तथा योगबुद्धि के आश्रित रहने वाली कर्मयोग से (होने वाली) निष्ठा को ‘कर्मयोगेन योगिनाम्’ इत्यादि वचनों से अलग कहेंगे।
कर्तापन-अकर्तापन और एकता-अनेकता-जैसी भिन्न-भिन्न बुद्धि के आश्रित रहने वाले जो ज्ञान और कर्म हैं, उन दोनों का एक पुरुष में होना असम्भव मानने वाले भगवान् ने ही स्वयं उपर्युक्त प्रकार से सांख्यबुद्धि और योगबुद्धि का आश्रय लेकर अलग-अलग दो निष्ठाएँ कही हैं।
जिस प्रकार (गीताशास्त्र में) इन दोनों निष्ठाओं का अलग-अलग वर्णन है, वैसे ही शतपथ ब्राह्मण में भी दिखलाया गया है। (वहाँ) ‘इस आत्मलोक को ही चाहने वाले वैराग्यशील ब्राह्मण संन्यास लेते हैं’ इस प्रकार सर्व-कर्म-संन्यास का विधान करके उसी वाक्य के शेष वाक्य से कहा है कि ‘जिन हम लोगों का यह आत्मा ही लोक है (वे हम) सन्तति से क्या (सिद्ध) करेंगे।’
वहीं यह भी कहा है कि ‘प्राकृत आत्मा अर्थात् अज्ञानी मनुष्य धर्मजिज्ञासा के बाद और विवाह से पहले तीनों लोकों की प्राप्ति के साधनरूप पुत्र की तथा दैव और मानुष—ऐसे दो प्रकार के धन की इच्छा करने लगा। इनमें पितृलोक की प्राप्ति का साधनरूप ‘कर्म’ तो मानुषधन है और देवलोक की प्राप्ति का साधनरूप ‘विद्या’ देवधन है।’
इस तरह (उपर्युक्त श्रुति में) अविद्या और कामना वाले पुरुष के लिये ही श्रौतादि सम्पूर्ण कर्म बताये गये हैं।
‘उन सब (कर्मों)-से निवृत्त होकर संन्यास ग्रहण करते हैं’ इस कथन से केवल आत्मलोक को चाहने वाले निष्कामी पुरुष के लिये संन्यास का ही विधान किया है।
यदि (इसपर भी यह बात मानी जायगी कि) भगवान् को श्रौतकर्म और ज्ञान का समुच्चय इष्ट है तो यह उपर्युक्त विभक्त विवेचन अयोग्य ठहरेगा।
तथा (ऐसा मान लेने से) ‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते’ इत्यादि जो अर्जुन का प्रश्न है वह भी नहीं बन सकता।
यदि ज्ञान और कर्म का एक पुरुष द्वारा एक साथ किया जाना असम्भव और कर्म की अपेक्षा ज्ञान का श्रेष्ठत्व भगवान् ने पहले न कहा होता, तो इस तरह अर्जुन बिना सुनी हुई बात का झूठे ही भगवान् में अध्यारोप कैसे करता कि ‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः’।
यदि सभी के लिये ज्ञान और कर्म का समुच्चय कहा होता तो अर्जुन के लिये भी वह कहा ही गया था, फिर दोनों का समुचित उपदेश होते हुए ‘यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्’ इस प्रकार दोनों में से एक के ही सम्बन्ध में प्रश्न कैसे होता?
क्योंकि पित्त की शान्ति चाहने वाले को वैद्य के द्वारा यह उपदेश दिया जाने पर कि मधुर और शीत पदार्थ सेवन करना चाहिये, रोगी का यह प्रश्न नहीं बन सकता कि उन दोनों में से किसी एक को ही पित्त की शान्ति का उपाय बतलाइये।
यदि ऐसी कल्पना की जाय कि भगवान् द्वारा कहे हुए वचन न समझने के कारण अर्जुन ने प्रश्न किया है, तो फिर भगवान् को प्रश्न के अनुरूप ही यह उत्तर देना चाहिये था कि मैंने तो ज्ञान और कर्म का समुच्चय बतलाया है, तू ऐसा भ्रान्त क्यों हो रहा है?
परंतु प्रश्न से विपरीत दूसरा ही उत्तर देना कि मैंने दो निष्ठाएँ पहले कही हैं (उपर्युक्त कल्पना के) उपयुक्त नहीं है।
इसके सिवा यदि केवल स्मार्त-कर्म के साथ ही ज्ञान का समुच्चय माना जाय तो भी विभक्त वर्णन आदि सब उपयुक्त नहीं ठहरते।
तथा ऐसा मानने से युद्धरूप स्मार्त-कर्म क्षत्रिय का स्वधर्म है, यह जानने वाले अर्जुन का इस प्रकार उलाहना देना भी नहीं बन सकता कि ‘तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि’।
सुतरां यह सिद्ध हुआ कि गीताशास्त्र में किञ्चिन्मात्र भी श्रौत या स्मार्त किसी भी कर्म के साथ आत्मज्ञान का समुच्चय कोई भी नहीं दिखा सकता।
अज्ञान से या आसक्ति आदि दोषों से कर्म में लगे हुए जिस पुरुष को यज्ञ से, दान से या तप से अन्तःकरण शुद्ध होकर परमार्थ-तत्त्वविषयक ऐसा ज्ञान प्राप्त हो जाता है कि यह सब एक ब्रह्म ही है और वह अकर्ता है।
उसके कर्म में कर्म और फल दोनों ही यद्यपि निवृत्त हो चुकते हैं तो भी लोकसंग्रह के लिये पहले की भाँति यत्नपूर्वक कर्मों में लगे रहने वाले पुरुष का जो प्रवृत्ति-रूप कर्म दिखलायी देता है, वह वास्तव में कर्म नहीं है, जिससे कि ज्ञान के साथ उसका समुच्चय हो सके।
जैसे भगवान् वासुदेव द्वारा किये हुए क्षात्रकर्मों का मोक्ष की सिद्धि के लिये ज्ञान के साथ समुच्चय नहीं होता वैसे ही फलेच्छा और अहंकार के अभाव की समानता होने के कारण ज्ञानी के कर्मों का भी (ज्ञान के साथ समुच्चय नहीं होता)।
क्योंकि आत्मज्ञानी न तो ऐसा ही मानता है कि मैं करता हूँ और न उन कर्मों का फल ही चाहता है।
इसके सिवा जैसे काम-साधनरूप अग्निहोत्रादि कर्मों का अनुष्ठान करने के लिये सकाम अग्निहोत्रादि में लगे हुए स्वर्गादि की कामना वाले अग्निहोत्री की कामना यदि आधा कर्म कर चुकने पर नष्ट हो जाय और फिर भी उसके द्वारा वही अग्निहोत्रादि कर्म होता रहे, तो भी वह काम्य-कर्म नहीं होता (वैसे ही ज्ञानी के कर्म भी कर्म नहीं हैं)।
‘कुर्वन्नपि न लिप्यते’ ‘न करोति न लिप्यते’ इत्यादि वचनों से भगवान् भी जगह-जगह यही बात दिखलाते हैं।
इसके सिवा जो ‘पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्’ ‘कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः’ इत्यादि वचन हैं उनको विभागपूर्वक समझना चाहिये।
पू०—वह किस प्रकार समझें?
उ०—यदि वे पूर्व में होने वाले जनकादि तत्त्ववेत्ता होकर भी लोकसंग्रह के लिये कर्मों में प्रवृत्त थे, तब तो यह अर्थ समझना चाहिये कि ‘गुण ही गुणों में बरत रहे हैं’ इस ज्ञान से ही वे परम सिद्धि को प्राप्त हुए अर्थात् कर्म-संन्यास की योग्यता प्राप्त होने पर भी कर्मों का त्याग नहीं किया, कर्म करते-करते ही परम सिद्धि को प्राप्त हो गये।
यदि वे जनकादि तत्त्वज्ञानी नहीं थे तो ऐसी व्याख्या करनी चाहिये कि वे ईश्वर के समर्पण किये हुए साधनरूप कर्मों द्वारा चित्त-शुद्धिरूप सिद्धि को अथवा ज्ञानोत्पत्तिरूप सिद्धि को प्राप्त हुए।
यही बात भगवान् कहेंगे कि ‘(योगी) अन्तःकरण की शुद्धि के लिये कर्म करते हैं।’
तथा ‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ ऐसा कहकर फिर उस सिद्धिप्राप्त पुरुष के लिये ‘सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म’ इत्यादि वचनों से ज्ञाननिष्ठा कहेंगे।
सुतरां गीताशास्त्र में निश्चय किया हुआ अर्थ यही है कि केवल तत्त्वज्ञान से ही मुक्ति होती है, कर्मसहित ज्ञान से नहीं।
जैसा यह भगवान् का अभिप्राय है वैसा ही प्रकरण के अनुसार विभागपूर्वक उन-उन स्थानों पर हम आगे दिखलायेंगे।
इस प्रकार धर्म के विषय में जिसका चित्त मोहित हो रहा है और जो महान् शोकसागर में डूब रहा है, ऐसे अर्जुन का बिना आत्मज्ञान के उद्धार होना असम्भव समझकर उस शोकसमुद्र से अर्जुन का उद्धार करने की इच्छा वाले भगवान् वासुदेव आत्मज्ञान की प्रस्तावना करते हुए बोले—
तात्पर्य पढ़ें
अत्र च—‘दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकम्’ इत्यारभ्य ‘न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह’ इति एतदन्तः प्राणिनां शोकमोहादिसंसारबीज-भूतदोषोद्भवकारणप्रदर्शनार्थत्वेन व्याख्येयो ग्रन्थः ।
तथा हि अर्जुनेन राज्यगुरुपुत्रमित्रसुहृत्स्व-जनसम्बन्धिबान्धवेषु ‘अहम् एषां मम एते’ इति एवं भ्रान्तिप्रत्ययनिमित्तस्नेहविच्छेदादिनिमित्तौ आत्मनः शोकमोहौ प्रदर्शितौ ‘कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये’ इत्यादिना।
शोकमोहाभ्यां हि अभिभूतविवेकविज्ञानः स्वत एव क्षात्रधर्मे युद्धे प्रवृत्तः अपि तस्माद् युद्धाद् उपरराम। परधर्मं च भिक्षाजीवनादिकं कर्तुं प्रववृते।
तथा च सर्वप्राणिनां शोकमोहादिदोषा-विष्टचेतसां स्वभावत एव स्वधर्मपरित्यागः प्रतिषिद्धसेवा च स्यात् ।
स्वधर्मे प्रवृत्तानाम् अपि तेषां वाङ्मनः-कायादीनां प्रवृत्तिः फलाभिसन्धिपूर्विका एव साहङ्कारा च भवति।
तत्र एवं सति धर्माधर्मोपचयाद् इष्टानिष्ट-जन्मसुखदुःखसम्प्राप्तिलक्षणः संसारः अनुपरतो भवति, इत्यतः संसारबीजभूतौ शोकमोहौ ।
तयोः च सर्वकर्मसन्न्यासपूर्वकाद् आत्मज्ञानाद् न अन्यतो निवृत्तिः इति, तदुपदिदिक्षुः सर्वलोकानुग्रहार्थम् अर्जुनं निमित्तीकृत्य आह भगवान् वासुदेवः—‘अशोच्यान्’ इत्यादि।
तत्र केचिद् आहुः, सर्वकर्मसन्न्यासपूर्वकाद् आत्मज्ञाननिष्ठामात्राद् एव केवलात् कैवल्यं न प्राप्यते एव, किं तर्हि अग्निहोत्रादिश्रौत-स्मार्तकर्मसहिताद् ज्ञानात् कैवल्यप्राप्तिः इति सर्वासु गीतासु निश्चितः अर्थ इति।
ज्ञापकं च आहुः अस्य अर्थस्य—‘अथ चेत्त्वमिमं धर्म्यं सङ्ग्रामं न करिष्यसि’ ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ ‘कुरु कर्मैव तस्मात्त्वम्’ इत्यादि।
हिंसादियुक्तत्वाद् वैदिकं कर्म अधर्माय इति इयम् अपि आशङ्का न कार्या, कथम्, क्षात्रं कर्म युद्धलक्षणं गुरुभ्रातृपुत्रादिहिंसालक्षणम् अत्यन्तक्रूरम् अपि स्वधर्मः इति कृत्वा न अधर्माय, तदकरणे च ‘ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि’ इति ब्रुवता याव- ज्जीवादिश्रुतिचोदितानां पश्चादिहिंसालक्षणानां च कर्मणां प्राग् एव न अधर्मत्वम् इति सुनिश्चितम् उक्तं भवति इति।
तद् असत्, ज्ञानकर्मनिष्ठयोः विभागवचनाद्
‘अशोच्यान्’ इत्यादिना भगवता यावत् ‘स्वधर्ममपि चावेक्ष्य’ इति एतदन्तेन ग्रन्थेन यत् परमार्थात्मतत्त्वनिरूपणं कृतं तत् साङ्ख्यम्, तद्विषया बुद्धिः आत्मनो जन्मादिषड्विक्रिया-भावाद् अकर्ता आत्मा इति प्रकरणार्थनिरूपणाद् या जायते सा साङ्ख्यबुद्धिः, सा येषां ज्ञानिनाम् उचिता भवति ते साङ्ख्याः ।
एतस्या बुद्धेः जन्मनः प्राग् आत्मनो देहादि- व्यतिरिक्तत्वकर्तृत्वभोक्तृत्वाद्यपेक्षो धर्माधर्म- विवेकपूर्वको मोक्षसाधनानुष्ठाननिरूपणलक्षणो योगः, तद्विषया बुद्धिः योगबुद्धिः, सा येषां कर्मिणाम् उचिता भवति ते योगिनः ।
तथा च भगवता विभक्ते द्वे बुद्धी निर्दिष्टे— ‘एषा तेऽभिहिता साङ्ख्ये बुद्धिर्योगे त्विमां शृणु’ इति।
तयोः च साङ्ख्यबुद्ध्याश्रयां ज्ञानयोगेन निष्ठां साङ्ख्यानां विभक्तां वक्ष्यति—‘पुरा वेदात्मना मया प्रोक्ता’ इति।
तथा च योगबुद्ध्याश्रयां कर्मयोगेन निष्ठां विभक्तां वक्ष्यति—‘कर्मयोगेन योगिनाम्’ इति।
एवं साङ्ख्यबुद्धिं योगबुद्धिं च आश्रित्य द्वे निष्ठे विभक्ते भगवता एव उक्ते ज्ञानकर्मणोः कर्तृत्वाकर्तृत्वैकत्वानेकत्वबुद्ध्याश्रययोः एक-पुरुषाश्रयत्वासम्भवं पश्यता ।
यथा एतद् विभागवचनं तथैव दर्शितं शातपथीये ब्राह्मणे—‘एतमेव प्रव्राजिनो लोक-मिच्छन्तो ब्राह्मणाः प्रव्रजन्ति’ (बृ० ४। ४। २२) इति। सर्वकर्मसन्न्यासं विधाय तच्छेषेण—‘किं प्रजया करिष्यामो येषां नोऽयमात्मायं लोकः’ (बृ० ४। ४। २२) इति।
तत्र एव च—‘प्राग्दारपरिग्रहात्पुरुष आत्मा प्राकृतो धर्मजिज्ञासोत्तरकालं लोकत्रयसाधनं पुत्रं द्विप्रकारं च वित्तं मानुषं दैवं च तत्र मानुषं वित्तं कर्मरूपं पितृलोकप्राप्तिसाधनं विद्यां च दैवं वित्तं देवलोकप्राप्तिसाधनं सोऽकामयत्’ (बृ० १।४।१७)।
इति अविद्याकामवत एव सर्वाणि कर्माणि श्रौतादीनि दर्शितानि।
‘तेभ्यो व्युत्थाय प्रव्रजन्ति’ (बृ० ४।४।२२)
तद् एतद् विभागवचनम् अनुपपन्नं स्याद् यदि श्रौतकर्मज्ञानयोः समुच्चयः अभिप्रेतः स्याद् भगवतः ।
न च अर्जुनस्य प्रश्न उपपन्नो भवति। ‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते’ इत्यादिः।
एकपुरुषानुष्ठेयत्वासम्भवं बुद्धिकर्मणोः भगवता पूर्वम् अनुक्तं कथम् अर्जुनः अश्रुतं बुद्धेः च कर्मणो ज्यायस्त्वं भगवति अध्यारोपयेद् मृषा एव ‘ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिः’ इति।
किं च यदि बुद्धिकर्मणोः सर्वेषां समुच्चय उक्तः स्याद् अर्जुनस्य अपि स उक्त एव इति; ‘यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम्’ इति कथम् उभयोः उपदेशे सति अन्यतरविषयः एव प्रश्नः स्यात् ।
न हि पित्तप्रशमनार्थिनो वैद्येन मधुरं शीतं
अथ अर्जुनस्य भगवदुक्तवचनार्थविवेका-नवधारणनिमित्तः प्रश्नः कल्पयेत्, तथापि भगवता प्रश्नानुरूपं प्रतिवचनं देयम्, मया बुद्धिकर्मणोः समुच्चय उक्तः किमर्थम् इत्थं त्वं भ्रान्तः असि इति।
न तु पुनः प्रतिवचनम् अननुरूपं पृष्टाद् अन्यद् एव द्वे निष्ठा मया पुरा प्रोक्ते इति वक्तुं युक्तम्।
न अपि स्मार्तेन एव कर्मणा बुद्धेः समुच्चये
किं च क्षत्रियस्य युद्धं स्मार्तं कर्म स्वधर्म
तस्माद् गीताशास्त्रे ईषन्मात्रेण अपि श्रौतेन स्मार्तेन वा कर्मणा आत्मज्ञानस्य समुच्चयो न केनचिद् दर्शयितुं शक्यः ।
यस्य तु अज्ञानाद् रागादिदोषतो वा कर्मणि प्रवृत्तस्य यज्ञेन दानेन तपसा वा विशुद्धसत्त्वस्य ज्ञानम् उत्पन्नं परमार्थतत्त्वविषयकम् एकम् एव इदं सर्वं ब्रह्म अकर्तुं च इति।
तस्य कर्मणि कर्मप्रयोजने च निवृत्ते अपि लोकसङ्ग्रहार्थं यत्नपूर्वं यथा प्रवृत्तस्तथा एव कर्मणि प्रवृत्तस्य यत् प्रवृत्तिरूपं दृश्यते न तत् कर्म येन बुद्धेः समुच्चयः स्यात्।
यथा भगवतो वासुदेवस्य क्षात्रकर्मचेष्टितं
तत्त्ववित् तु न अहं करोमि इति मन्यते न च तत्फलम् अभिसन्धत्ते।
यथा च स्वर्गादिकामार्थिनः अग्निहोत्रादि-कामसाधनानुष्ठानाय आहिताग्नेः काम्ये एव अग्निहोत्रादौ प्रवृत्तस्य सामिकृते विनष्टे अपि कामे तद् एव अग्निहोत्रादि अनुतिष्ठतः अपि न तत्काम्यम् अग्निहोत्रादि भवति ।
तथा च दर्शयति भगवान् ‘कुर्वन्नपि’ ‘न
यच्च ‘पूर्वैः पूर्वतरं कृतम्’ ‘कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः’ इति तत् तु प्रविभज्य विज्ञेयम् ।
तत् कथम्?
यदि तावत् पूर्वे जनकादयः तत्त्वविदः अपि प्रवृत्तकर्माणः स्युः ते लोकसङ्ग्रहार्थं ‘गुणा गुणेषु वर्तन्ते’ इति ज्ञानेन एव संसिद्धिम् आस्थिताः, कर्मसन्न्यासे प्राप्ते अपि कर्मणा सह एव संसिद्धिम् आस्थिता न कर्मसन्न्यासं कृतवन्त इति एषः अर्थः ।
अथ न ते तत्त्वविदः, ईश्वरसमर्पितेन कर्मणा साधनभूतेन संसिद्धिं सत्त्वशुद्धिं ज्ञानोत्पत्तिलक्षणां वा संसिद्धिम् आस्थिता जनकादयः इति व्याख्येयम् ।
एतम् एव अर्थं वक्ष्यति भगवान् ‘सत्त्वशुद्धये कर्म कुर्वन्ति’ इति।
‘स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ इति उक्त्वा सिद्धिं प्राप्तस्य च पुनः ज्ञाननिष्ठां वक्ष्यति ‘सिद्धिं प्राप्तो यथा ब्रह्म’ इत्यादिना।
तस्माद् गीतासु केवलाद् एव तत्त्वज्ञानाद् मोक्षप्राप्तिः न कर्मसमुच्चिताद् इति निश्चितः अर्थः ।
यथा च अयम् अर्थः तथा प्रकरणशो
तत्र एवं धर्मसम्मूढचेतसो महति शोक-सागरे निमग्नस्य अर्जुनस्य अन्यत्र आत्मज्ञानाद् उद्धरणम् अपश्यन् भगवान् वासुदेवः ततः अर्जुनम् उद्दिधारयिषुः आत्मज्ञानाय अवतारयन् आह—
बुद्धिद्वयाश्रययोः ।
इति व्युत्थानम् आत्मानम् एव लोकम् इच्छतः अकामस्य विहितम्।
च भोक्तव्यम् इति उपदिष्टे तयोः अन्यतरत् पित्तप्रशमनकारणं ब्रूहि इति प्रश्नः सम्भवति।
अभिप्रेते विभागवचनादि सर्वम् उपपन्नम्।
इति जानतः ‘तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि’ इति उपालम्भः अनुपपन्नः।
न ज्ञानेन समुच्चीयते पुरुषार्थसिद्धये तद्वत्
फलाभिसन्ध्यहङ्काराभावस्य तुल्यत्वाद् विदुषः ।
करोति न लिप्यते’ इति तत्र तत्र।।
विभज्य तत्र तत्र दर्शयिष्यामः ।