अध्याय 2 - श्लोक 11

अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥ ११ ॥

aśocyānanvaśocastvaṃ prajñāvādāṃśca bhāṣase .
gatāsūnagatāsūṃśca nānuśocanti paṇḍitāḥ .. 11 ..


जो शोक करने योग्य नहीं होते उन्हें अशोच्य कहते हैं, भीष्म, द्रोण आदि सदाचारी और परमार्थरूप से नित्य होने के कारण अशोच्य हैं। उन न शोक करने-योग्य भीष्मादि के निमित्त तू शोक करता है कि वे मेरे हाथों मारे जायँगे; मैं उनसे रहित होकर राज्य और सुखादि का क्या करूँगा?

तथा तू प्रज्ञावानों के अर्थात् बुद्धिमानों के वचन भी बोलता है, अभिप्राय यह है कि इस तरह तू उन्मत्त की भाँति मूर्खता और बुद्धिमत्ता इन दोनों परस्परविरुद्ध भावों को अपने में दिखलाता है।

क्योंकि जिनके प्राण चले गये हैं—जो मर गये हैं उनके लिये और जिनके प्राण नहीं गये —जो जीते हैं उनके लिये भी पण्डित —आत्मज्ञानी शोक नहीं करते।

‘पाण्डित्य को सम्पादन करके’ इस श्रुतिवाक्यानुसार आत्मविषयक बुद्धि का नाम पण्डा है और वह बुद्धि जिनमें हो वे पण्डित हैं।

परंतु परमार्थदृष्टि से नित्य और अशोचनीय भीष्म आदि श्रेष्ठ पुरुषों के लिये तू शोक करता है, अतः तू मूढ है। यह अभिप्राय है ॥ ११ ॥

वे भीष्मादि अशोच्य क्यों हैं ? इसलिये कि वे नित्य हैं। नित्य कैसे हैं ?—

तात्पर्य पढ़ें

न शोच्या अशोच्या भीष्मद्रोणादयः सद्वृत्तत्वात् परमार्थरूपेण च नित्यत्वात्, तान् अशोच्यान् अन्वशोचः अनुशोचितवान् असि ते म्रियन्ते मन्निमित्तम् अहं तैः विनाभूतः किं करिष्यामि राज्यसुखादिना इति।

त्वं प्रज्ञावादान् प्रज्ञावतां बुद्धिमतां वादान् च वचनानि च भाषसे। तद् एतद् मौढ्यं पाण्डित्यं च विरुद्धम् आत्मनि दर्शयसि उन्मत्त इव इति अभिप्रायः ।

यस्माद् गतासून् गतप्राणान् मृतान् अगतासून् अगतप्राणान् जीवतः च न अनुशोचन्ति पण्डिताः आत्मज्ञाः ।

पण्डा आत्मविषया बुद्धिः येषां ते हि पण्डिताः ‘पाण्डित्यं निर्विद्य’ (बृ० ३।५।१) इति श्रुतेः।

परमार्थतः तु नित्यान् अशोच्यान् अनुशोचसि अतो मूढः असि इति अभिप्रायः ॥ ११ ॥

कुतः ते अशोच्याः, यतो नित्याः। कथम्—