न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥ १२ ॥
na tvevāhaṃ jātu nāsaṃ na tvaṃ neme janādhipāḥ .
na caiva na bhaviṣyāmaḥ sarve vayamataḥ param .. 12 ..
किसी काल में मैं नहीं था, ऐसा नहीं किंतु अवश्य था अर्थात् भूतपूर्व शरीरों की उत्पत्ति और विनाश होते हुए भी मैं सदा ही था।
वैसे ही तू नहीं था सो नहीं किंतु अवश्य था ये राजागण नहीं थे सो नहीं किंतु ये भी अवश्य थे।
इसके बाद अर्थात् इन शरीरों का नाश होने के बाद भी हम सब नहीं रहेंगे सो नहीं किंतु अवश्य रहेंगे। अभिप्राय यह है कि तीनों कालों में ही आत्मरूप से सब नित्य हैं।
यहाँ बहुवचन का प्रयोग देहभेद के विचार से किया गया है, आत्मभेद के अभिप्राय से नहीं ॥ १२ ॥
आत्मा किसके सदृश नित्य है? इस पर दृष्टान्त कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
न तु एव जातु कदाचिद् अहं न आसं किन्तु आसम् एव, अतीतेषु देहोत्पत्तिविनाशेषु नित्यम् एव अहम् आसम् इति अभिप्रायः।
तथा न त्वं न आसीः किन्तु आसीः एव। तथा न इमे जनाधिपाः न आसन् किन्तु आसन् एव।
तथा न च एव न भविष्यामः, किन्तु भविष्याम एव सर्वे वयम् अतः अस्माद् देह-विनाशात् परम् उत्तरकाले अपि, त्रिषु अपि कालेषु नित्या आत्मस्वरूपेण इति अर्थः।
देहभेदानुवृत्त्या बहुवचनं न आत्मभेदाभि-प्रायेण ॥ १२ ॥
तत्र कथम् इव नित्य आत्मा इति दृष्टान्तम् आह—