तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥ १३ ॥
dehino’sminyathā dehe kaumāraṃ yauvanaṃ jarā .
tathā dehāntaraprāptirdhīrastatra na muhyati .. 13 ..
जिसका देह है वह देही है, उस देही की अर्थात् शरीरधारी आत्मा की इस—वर्तमान शरीर में जैसे कौमार—बाल्यावस्था, यौवन—तरुणावस्था और जरा—वृद्धावस्था—ये परस्पर विलक्षण तीनों अवस्थाएँ होती हैं।
इनमें पहली अवस्था के नाश से आत्मा का नाश नहीं होता और दूसरी अवस्था की उत्पत्ति से आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती; तो फिर क्या होता है? कि निर्विकार आत्मा को ही दूसरी और तीसरी अवस्था की प्राप्ति होती हुई देखी गयी है।
वैसे ही निर्विकार आत्मा को ही देहान्तर की प्राप्ति अर्थात् इस शरीर से दूसरे शरीर का नाम देहान्तर है, उसकी प्राप्ति होती है (होती हुई-सी दीखती है)।
ऐसा होने से अर्थात् आत्मा को निर्विकार और नित्य समझ लेने के कारण धीर—बुद्धिमान् इस विषय में मोहित नहीं होता—मोह को प्राप्त नहीं होता ॥ १३ ॥
यद्यपि ‘आत्मा नित्य है ऐसे जाननेवाले ज्ञानी को आत्म-विनाश-निमित्तक मोह होना तो सम्भव नहीं, तथापि शीत-उष्ण और सुख-दुःख-प्राप्ति-जनित लौकिक मोह तथा सुख-वियोग-जनित और दुःख-संयोग-जनित शोक भी होता हुआ देखा जाता है, ऐसे अर्जुन के वचनों की आशङ्का करके भगवान् कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
देहः अस्य अस्ति इति देही तस्य देहिनो देहवदात्मनः अस्मिन् वर्तमाने देहे यथा येन प्रकारेण कौमारं कुमारभावो बाल्यावस्था, यौवनं यूनो भावो मध्यमावस्था, जरा वयो हानिः जीर्णावस्था इति एताः तिस्रः अवस्था अन्योन्यविलक्षणाः ।
तासां प्रथमावस्थानाशे न नाशो द्वितीया-वस्थोपजनने न उपजननम् आत्मनः, किं तर्हि, अविक्रियस्य एव द्वितीयतृतीयावस्थाप्राप्तिः आत्मनो दृष्टा।
तथा तद्वद् एव देहाद् अन्यो देहान्तरं तस्य प्राप्तिः देहान्तरप्राप्तिः अविक्रियस्य एव आत्मन इत्यर्थः ।
धीरो धीमान् तत्र एवं सति न मुह्यति न मोहम्
आपद्यते ॥ १३ ॥
यद्यपि आत्मविनाशनिमित्तो मोहो न सम्भवति नित्य आत्मा इति विजानतः तथापि शीतोष्णसुखदुःखप्राप्तिनिमित्तो मोहो लौकिको दृश्यते, सुखवियोगनिमित्तो दुःख-संयोगनिमित्तः च शोक इति एतद् अर्जुनस्य वचनम् आशङ्क्य आह —