समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥ १५ ॥
yaṃ hi na vyathayantyete puruṣaṃ puruṣarṣabha.
samaduḥkhasukhaṃ dhīraṃ so’mṛtatvāya kalpate .. 15 ..
सुख-दुःख को समान समझनेवाले अर्थात् जिसकी दृष्टिमें सुख-दुःख समान हैं—सुख-दुःख की प्राप्तिमें जो हर्ष-विषादसे रहित रहता है ऐसे जिस धीर—बुद्धिमान् पुरुषको ये उपर्युक्त शीतोष्णादि व्यथा नहीं पहुँचा सकते अर्थात् नित्य आत्मदर्शनसे विचलित नहीं कर सकते।
वह नित्य आत्मदर्शननिष्ठ और शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको सहन करनेवाला पुरुष मृत्युसे अतीत हो जाने के लिये यानी मोक्ष के लिये समर्थ होता है ॥ १५ ॥
इसलिये भी शोक और मोह न करके शीतोष्णादि को सहन करना उचित है, जिससे कि—
तात्पर्य पढ़ें
यं हि पुरुषं समदुःखसुखं समे दुःखसुखे यस्य तं समदुःखसुखं सुखदुःखप्राप्तौ हर्षविषाद- रहितं धीरं धीमन्तं न व्यथयन्ति न चालयन्ति नित्यात्मदर्शनाद् एते यथोक्ताः शीतोष्णादयः।
स नित्यात्मदर्शननिष्ठो द्वन्द्वसहिष्णुः अमृतत्वाय अमृतभावाय मोक्षाय कल्पते समर्थो भवति ॥ १५ ॥
इतः च शोकमोहौ अकृत्वा शीतोष्णादि-सहनं युक्तं यस्मात्—