उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः ॥ १६ ॥
nāsato vidyate bhāvo nābhāvo vidyate sataḥ .
ubhayorapi dṛṣṭo’ntastvanayostattvadarśibhiḥ .. 16 ..
वास्तवमें अविद्यमान शीतोष्णादिका और उनके कारणोंका भाव—होनापन अर्थात् अस्तित्व है ही नहीं, क्योंकि प्रमाणोंद्वारा निरूपण किये जानेपर शीतोष्णादि और उनके कारण कोई पदार्थ ही नहीं ठहरते !
क्योंकि वे शीतोष्णादि सब विकार हैं, और विकार सदा बदलता रहता है। जैसे चक्षुद्वारा निरूपण किया जानेपर घटादिका आकार मिट्टीको छोड़कर और कुछ भी उपलब्ध नहीं होता इसलिये असत् है, वैसे ही सभी विकार कारणके सिवा उपलब्ध न होनेसे असत् हैं।
क्योंकि उत्पत्तिसे पूर्व और नाशके पश्चात् उन सबकी उपलब्धि नहीं है।
पू०—मिट्टी आदि कारणकी और उसके भी कारणकी अपने कारणसे पृथक् उपलब्धि नहीं होनेसे उनका अभाव सिद्ध हुआ, फिर इसी तरह उसका भी अभाव सिद्ध होनेसे सबके अभावका प्रसङ्ग आ जाता है।
उ०—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि सर्वत्र सत्-बुद्धि और असत्-बुद्धि ऐसी दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं।
जिस पदार्थकी विषय करनेवाली बुद्धि बदलती नहीं वह पदार्थ सत् है और जिसको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती हो वह असत् है। इस प्रकार सत् और असत् का विभाग बुद्धिके अधीन है।
सभी जगह समानाधिकरणमें (एक ही अधिष्ठानमें) सबको दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं।
नील कमलके सदृश नहीं, किंतु घड़ा है, कपड़ा है, हाथी है, इस तरह सब जगह दो-दो बुद्धियाँ उपलब्ध होती हैं।*
> अर्थात् ‘नीलोत्पलम्’ इस ज्ञानमें जैसे कमलमें कमलत्वकी और नीलापनकी दो बुद्धियाँ होती हैं उसी प्रकार गुण-गुणी-भावसे यहाँ दो बुद्धियाँ नहीं ली गयी हैं; किंतु मृगतृष्णिकामें भ्रान्तिके कारण जैसे अधिष्ठानसे अतिरिक्त जलबुद्धि भी रहती है उसी तरहकी दो बुद्धियाँ दिखायी गयी हैं।
उन दोनों बुद्धियोंसे घटादिको विषय करनेवाली बुद्धि बदलती है, यह पहले दिखलाया जा चुका है परंतु सत्-बुद्धि बदलती नहीं।
अतः घटादि बुद्धिका विषय (घटादि) असत् है क्योंकि उसमें व्यभिचार (परिवर्तन) होता है। परंतु सत्-बुद्धिका विषय (अस्तित्व) असत् नहीं है, क्योंकि उसमें व्यभिचार (परिवर्तन) नहीं होता।
पू०—घटका नाश हो जानेपर घटविषयक बुद्धिके नष्ट होते ही सत्-बुद्धि भी तो नष्ट हो जाती है।
उ०—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि वस्त्रादि अन्य वस्तुओंमें भी सत्-बुद्धि देखी जाती है। वह सत्-बुद्धि केवल विशेषणको ही विषय करनेवाली है।
पू० —सत् बुद्धिकी तरह घट बुद्धि भी तो दूसरे घटमें दीखती है।
उ०—यह ठीक नहीं; क्योंकि वस्त्रादिमें नहीं दीखती।
पू०—घटका नाश हो जानेपर उसमें सत्-बुद्धि भी तो नहीं दीखती।
उ०—यह ठीक नहीं; क्योंकि (वहाँ) घटरूप विशेष्यका अभाव है। सत्-बुद्धि विशेषणको विषय करनेवाली है, अत: जब घटरूप विशेष्यका अभाव हो गया तब बिना विशेष्यके विशेषणकी अनुपपत्ति होनेसे वह (सत्-बुद्धि) किसको विषय करे ? पर विषयका अभाव होनेसे सत्-बुद्धिका अभाव नहीं होता।
पू०—घटादि विशेष्यका अभाव होनेसे एकाधिकरणता (दोनों बुद्धियोंका एक अधिष्ठानमें होना) युक्तियुक्त नहीं होती।
उ०—यह ठीक नहीं, क्योंकि मृगतृष्णिकादिमें अधिष्ठानसे अतिरिक्त अन्य वस्तुका (जलका) अभाव है तो भी ‘यह जल है’ ऐसी बुद्धि होनेसे समानाधिकरणता देखी जाती है।*
> समानाधिकरणताका अभिप्राय दो वस्तुओंकी प्रतीतिसे है, वास्तविक सत्तासे नहीं।
इसलिये असत् जो शरीरादि एवं शीतोष्णादि द्वन्द्व और उनके कारण हैं उनका किसीका भी भाव—अस्तित्व नहीं है।
वैसे ही सत् जो आत्मतत्त्व है उसका अभाव अर्थात् अविद्यमानता नहीं है; क्योंकि वह सर्वत्र अटल है यह पहले कह आये हैं।
इस प्रकार सत्–आत्मा और असत्–अनात्मा इन दोनोंका ही यह निर्णय तत्त्वदर्शियोंद्वारा देखा गया है अर्थात् प्रत्यक्ष किया जा चुका है कि सत् सत् ही है और असत् असत् ही है।
‘तत्’ यह सर्वनाम है और सर्व ब्रह्म ही है। अतः उसका नाम ‘तत्’ है, उसके भावको अर्थात् ब्रह्मके यथार्थ स्वरूपको तत्त्व कहते हैं, उस तत्त्वको देखना जिनका स्वभाव है वे तत्त्वदर्शी हैं, उनके द्वारा उपर्युक्त निर्णय देखा गया है।
तू भी तत्त्वदर्शी पुरुषोंकी बुद्धिका आश्रय लेकर शोक और मोहको छोड़कर तथा नियत और अनियतरूप शीतोष्णादि द्वन्द्वोंको, इस प्रकार मनमें समझकर कि ये सब विकार हैं, ये वास्तवमें न होते हुए ही मृगतृष्णाके जलकी भाँति मिथ्या प्रतीत हो रहे हैं, (इनको) सहन कर। यह अभिप्राय है॥ १६॥
तो, जो निस्सन्देह सत् है और सदैव रहता है वह क्या है? इसपर कहा जाता है—
तात्पर्य पढ़ें
नासतः अविद्यमानस्य शीतोष्णादेः सकारणस्य न विद्यते नास्ति भावो भवनम् अस्तिता। न हि शीतोष्णादि सकारणं प्रमाणैः निरूप्यमाणं वस्तु सम्भवति।
विकारो हि सः। विकारः च व्यभिचरति, यथा घटादिसंस्थानं चक्षुषा निरूप्यमाणं मृद् व्यतिरेकेण अनुपलब्धेः असत् तथा सर्वो विकारः कारणव्यतिरेकेण अनुपलब्धेः असन्।
जन्मप्रध्वंसाभ्यां प्राग् ऊर्ध्वं च अनुपलब्धेः।
मृदादिकारणस्य तत्कारणस्य च तत्कारण-व्यतिरेकेण अनुपलब्धेः असत्त्वम्। तदसत्त्वे च सर्वाभावप्रसङ्ग इति चेत्।
न, सर्वत्र बुद्धिद्वयोपलब्धेः सद्बुद्धिः असद्-बुद्धिः इति।
यद्विषया बुद्धिः न व्यभिचरति तत् सत्, यद्विषया बुद्धिः व्यभिचरति तद् असद् इति सदसद्विभागे बुद्धितन्त्रे स्थिते।
सर्वत्र द्वे बुद्धी सर्वैः उपलभ्येते समाना-धिकरणे।
न नीलोत्पलवत् सन् घटः सन् पटः सन् हस्ती इति एवं सर्वत्र।
तयोः बुद्धयोः घटादिबुद्धिः व्यभिचरति, तथा च दर्शितम्। न तु सद्बुद्धिः।
तस्माद् घटादिबुद्धिविषयः असन् व्यभि-चारात्, न तु सद्बुद्धिविषयः अव्यभि-चारात्।
घटे विनष्टे घटबुद्धौ व्यभिचरन्त्यां सद्बुद्धिः अपि व्यभिचरति इति चेत्।
न, पटादौ अपि सद्बुद्धिदर्शनात्। विशेषण-
विषया एव सा सद्बुद्धिः।
सद्बुद्धिवद् घटबुद्धिः अपि घटान्तरे दृश्यते इति चेत्।
न, पटादौ अदर्शनात्।
सद्बुद्धिरपि नष्टे घटे न दृश्यते इति चेत्।
न, विशेष्याभावात्। सद्बुद्धिः विशेषण-
विषया सती विशेष्याभावे विशेषणानुपपत्तौ
किं विषया स्यात्, न तु पुनः सद्बुद्धेः विषया-भावात्।
एकाधिकरणत्वं घटादिविशेष्याभावे
न युक्तम् इति चेत्।
नः इदम् उदकम् इति मरीच्यादौ अन्यतरा-
भावे अपि सामानाधिकरण्यदर्शनात्।
तस्माद् देहादेः द्वन्द्वस्य च सकारणस्य असतो
न विद्यते भाव इति।
तथा सतः च आत्मनः अभावः अविद्य-मानता न विद्यते सर्वत्र अव्यभिचाराद् इति अवोचाम।
एवम् आत्मानात्मनोः सदसतोः उभयोः अपि दृष्ट उपलब्धः अन्तो निर्णयः सत् सद् एव असद् असद् एव इति तु अनयोः यथोक्तयोः तत्त्वदर्शिभिः।
तद् इति सर्वनाम सर्वं च ब्रह्म तस्य नाम तद् इति तद्भावः तत्त्वं ब्रह्मणो याथात्म्यं तद्
द्रष्टुं शीलं येषां ते तत्त्वदर्शिनः तैः तत्त्वदर्शिभिः।
त्वम् अपि तत्त्वदर्शिनां दृष्टिम् आश्रित्य शोकं मोहं च हित्वा शीतोष्णादीनि नियतानियत-रूपाणि द्वन्द्वानि विकारः अयम् असन् एव मरीचिजलवत् मिथ्या अवभासते इति मनसि निश्चित्य तितिक्षस्व इति अभिप्रायः॥ १६॥
किं पुनः तद् यत् सद् एव सर्वदा एव अस्ति इति उच्यते—