अध्याय 2 - श्लोक 18

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः ।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥ १८ ॥

antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śarīriṇaḥ .
anāśino’prameyasya tasmādyudhyasva bhārata .. 18 ..


जिनका अन्त होता है—विनाश होता है वे सब अन्तवाले हैं। जैसे मृगतृष्णादिमें रहनेवाली जल-विषयक सत्-बुद्धि प्रमाणद्वारा निरूपण की जानेके बाद विच्छिन्न हो जाती है वही उसका अन्त है, वैसे ही ये सब शरीर अन्तवान् हैं तथा स्वप्न और मायाके शरीरादिकी भाँति भी ये सब शरीर अन्तवाले हैं।

इसलिये इस अविनाशी, अप्रमेय, शरीरधारी नित्य आत्माके ये सब शरीर विवेकी पुरुषों द्वारा अन्तवाले कहे गये हैं। यह अभिप्राय है।

‘नित्य’ और ‘अविनाशी’ यह कहना पुनरुक्ति नहीं है, क्योंकि संसारमें नित्यत्वके और नाशके दो-दो भेद प्रसिद्ध हैं।

जैसे, शरीर जलकर भस्मीभूत हुआ अदृश्य होकर भी ‘नष्ट हो गया’ कहलाता है और रोगादिसे युक्त हुआ विपरीत परिणामको प्राप्त होकर विद्यमान रहता हुआ भी ‘नष्ट हो गया’ कहलाता है।

अतः ‘अविनाशी’ और ‘नित्य’ इन दो विशेषणोंका यह अभिप्राय है कि इस आत्माका दोनों प्रकारके ही नाशसे सम्बन्ध नहीं है।

ऐसे नहीं कहा जाता तो आत्माका नित्यत्व भी पृथ्वी आदि भूतोंके सदृश होता। परंतु ऐसा नहीं होना चाहिये इसलिये इसको ‘अविनाशी’ और ‘नित्य’ कहा है।

प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे जिसका स्वरूप निश्चित नहीं किया जा सके वह अप्रमेय है।

पू०—जब कि शास्त्रद्वारा आत्माका स्वरूप निश्चित किया जाता है, तब प्रत्यक्षादि प्रमाणोंसे उसका जान लेना तो पहले ही सिद्ध हो चुका (फिर वह अप्रमेय कैसे है?)।

उ०—यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि आत्मा स्वतः सिद्ध है। प्रमातारूप आत्माके सिद्ध होनेके बाद ही जिज्ञासुकी प्रमाणविषयक खोज (शुरू) होती है।

क्योंकि ‘मैं अमुक हूँ’ इस प्रकार पहले अपनेको बिना जाने ही अन्य जाननेयोग्य पदार्थको जाननेके लिये कोई प्रवृत्त नहीं होता। तथा अपना आपा किसीसे भी अप्रत्यक्ष (अज्ञात) नहीं होता है।

शास्त्र जो कि अन्तिम प्रमाण है* वह आत्मामें किये हुए अनात्मपदार्थोंके अध्यारोप को दूर करनेमात्रसे ही आत्माके विषयमें प्रमाणरूप होता है, अज्ञात वस्तुका ज्ञान करवानेके निमित्तसे नहीं।

> प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम—इन तीन प्रमाणोंमें आगम अर्थात् शास्त्र अन्तिम प्रमाण है। जो वस्तु शास्त्रद्वारा बतलायी जाती है, वह पहलेसे किसी-न-किसीद्वारा प्रत्यक्ष की हुई होती है या अनुमानसे समझी हुई होती है, यह युक्तियुक्त बात है, इस युक्तिको लेकर ही उपर्युक्त शंका है। उसका यह उत्तर दिया गया है।

ऐसे ही श्रुति भी कहती है कि ‘जो साक्षात् अपरोक्ष है वही ब्रह्म है जो आत्मा सबके हृदयमें व्याप्त है’ इत्यादि।

जिससे कि आत्मा इस प्रकार नित्य और निर्विकार सिद्ध हो चुका है, इसलिये तू युद्ध कर, अर्थात् युद्धसे उपराम न हो।

यहाँ (उपर्युक्त कथनसे) युद्ध की कर्तव्यताका विधान नहीं है, क्योंकि युद्धमें प्रवृत्त हुआ ही वह (अर्जुन) शोक-मोहसे प्रतिबद्ध होकर चुप हो गया था, उसके कर्तव्य के प्रतिबन्धमात्र को भगवान् हटाते हैं। इसलिये ‘युद्ध कर’ यह कहना अनुमोदनमात्र है, विधि (आज्ञा) नहीं है ॥ १८ ॥

गीताशास्त्र संसारके कारणरूप शोक-मोह आदि को निवृत्त करनेवाला है, प्रवर्तक नहीं है। इस अर्थकी साक्षिभूत दो ऋचाओंको भगवान् उद्धृत करते हैं।

जो तू मानता है कि ‘मेरे द्वारा युद्धमें भीष्मादि मारे जायँगे, मैं ही उनका मारनेवाला हूँ’—यह तेरी बुद्धि (भावना) सर्वथा मिथ्या है। कैसे ?—

तात्पर्य पढ़ें

अन्तवन्तः अन्तो विनाशो विद्यते येषां ते अन्तवन्तो यथा मृगतृष्णिकादौ सद्बुद्धिः अनुवृत्ता प्रमाणनिरूपणान्ते विच्छिद्यते स तस्या अन्तः तथा इमे देहाः स्वप्नमायादेहादिवत् च अन्तवन्तः ।

नित्यस्य शरीरिणः शरीरवतः अनाशिनः अप्रमेयस्य आत्मनः अन्तवन्तः इति उक्ता विवेकिभिः इत्यर्थः ।

नित्यस्य अनाशिन इति न पुनरुक्तं नित्यत्वस्य द्विविधत्वात् लोके नाशस्य च।

यथा देहो भस्मीभूतः अदर्शनं गतो नष्टं उच्यते विद्यमानः अपि अन्यथा परिणतो व्याध्यादियुक्तो जातो नष्टं उच्यते।

तत्र अनाशिनो नित्यस्य इति द्विविधेन

अपि नाशेन असम्बन्धः अस्य इत्यर्थः ।

अन्यथा पृथिव्यादिवद् अपि नित्यत्वं स्याद् आत्मनः तद् मा भूद् इति नित्यस्य अनाशिन इति आह।

अप्रमेयस्य न प्रमेयस्य प्रत्यक्षादिप्रमाणैः अपरिच्छेद्यस्य इत्यर्थः ।

ननु आगमेन आत्मा परिच्छिद्यते प्रत्यक्षा-

दिना च पूर्वम्।

न, आत्मनः स्वतःसिद्धत्वात्। सिद्धे हि आत्मनि प्रमातरि प्रमित्सोः प्रमाणान्वेषणा भवति।

न हि पूर्वम् इत्थम् अहम् इति आत्मानम्

अप्रमाय पश्चात् प्रमेयपरिच्छेदाय प्रवर्तते। न हि आत्मा नाम कस्यचिद् अप्रसिद्धो भवति।

शास्त्रं तु अन्त्यं प्रमाणम् अतद्धर्माध्यारोपण-

मात्रनिवर्तकत्वेन प्रमाणत्वम् आत्मनि प्रतिपद्यते न तु अज्ञातार्थज्ञापकत्वेन।

तथा च श्रुतिः ‘यत्साक्षादपरोक्षाद्ब्रह्म य

आत्मा सर्वान्तरः’ (बृ० ३। ४। १) इति।

यस्माद् एवं नित्यः अविक्रियः च आत्मा तस्माद् युध्यस्व युद्धाद् उपरमं मा कार्षीः इत्यर्थः ।

न हि अत्र युद्धकर्तव्यता विधीयते। युद्धे प्रवृत्त एव हि असौ शोकमोहप्रतिबद्धः तूष्णीम् आस्ते तस्य कर्तव्यप्रतिबन्धापनयनमात्रं भगवता क्रियते। तस्मात् ‘युध्यस्व’ इति अनुवादमात्रं न विधिः ॥ १८ ॥

शोकमोहादिसंसारकारणनिवृत्त्यर्थं गीता-शास्त्रं न प्रवर्तकम् इति, एतस्य अर्थस्य साक्षि-भूते ऋचौ आनिनाय भगवान्।

यत् तु मन्यसे युद्धे भीष्मादयो मया हन्यन्ते अहम् एव तेषां हन्ता इति एषा बुद्धिः मृषा एव ते। कथम्—