अध्याय 2 - श्लोक 20

न जायते प्रियते वा कदाचिन्नायं भूत्वाऽभविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥ २० ॥

na jāyate priyate vā kadācinnāyaṃ bhūtvā’bhavitā vā na bhūyaḥ .
ajo nityaḥ śāśvato’yaṃ purāṇo na hanyate hanyamāne śarīre .. 20 ..


यह आत्मा उत्पन्न नहीं होता अर्थात् उत्पत्तिरूप वस्तुविकार आत्मा में नहीं होता और यह मरता भी नहीं। ‘वा’ शब्द यहाँ ‘च’ के अर्थ में है।

‘मरता भी नहीं’ इस कथन से विनाशरूप अन्तिम विकार का प्रतिषेध किया जाता है।

‘कदाचित्’ शब्द सभी विकारों के प्रतिषेध के साथ सम्बन्ध रखता है। जैसे यह आत्मा न कभी जन्मता है न कभी मरता है इत्यादि।

जिससे कि यह आत्मा उत्पन्न होकर अर्थात् उत्पत्तिरूप विकार का अनुभव करके फिर अभाव को प्राप्त होनेवाला नहीं है इसलिये मरता नहीं, क्योंकि जो उत्पन्न होकर फिर नहीं रहता वह ‘मरता है’ इस प्रकार लोक में कहा जाता है।

‘वा’ शब्द से और ‘न’ शब्द से यह भी पाया जाता है कि यह आत्मा शरीर की भाँति पहले न होकर फिर होनेवाला नहीं है इसलिये यह जन्मता नहीं; क्योंकि जो न होकर फिर होता है वही ‘जन्मता है’ यह कहा जाता है। आत्मा ऐसा नहीं है, इसलिये नहीं जन्मता।

ऐसा होने के कारण आत्मा अज है और मरता नहीं, इसलिये नित्य है।

यद्यपि आदि और अन्त के दो विकारों के प्रतिषेध से (बीच के) सभी विकारों का प्रतिषेध हो जाता है, तो भी बीच में होनेवाले विकारों का भी उन-उन विकारों के प्रतिषेधार्थक खास-खास शब्दों द्वारा प्रतिषेध करना उचित है। इसलिये ऊपर न कहे हुए जो यौवनादि सब विकार हैं उनका भी जिस प्रकार प्रतिषेध हो, ऐसे भाव को ‘शाश्वत’ इत्यादि शब्दों से कहते हैं—

सदा रहने वाले का नाम शाश्वत है, ‘शाश्वत’ शब्द से अपक्षय (क्षय होना) रूप विकार का प्रतिषेध किया जाता है क्योंकि आत्मा अवयवरहित है, इस कारण स्वरूप से उसका क्षय नहीं होता और निर्गुण होने के कारण गुणों के क्षय से भी उसका क्षय नहीं होता।

‘पुराण’ इस शब्द से, अपक्षय के विपरीत जो वृद्धिरूप विकार है उसका भी प्रतिषेध किया जाता है। जो पदार्थ किसी अवयव की उत्पत्ति से पुष्ट होता है वह ‘बढ़ता है’ ‘नया हुआ है’ ऐसे कहा जाता है, परंतु यह आत्मा तो अवयवरहित होने के कारण पहले भी नया था, अतः ‘पुराण’ है अर्थात् बढ़ता नहीं।

तथा शरीर का नाश होने पर यानी विपरीत परिणाम को प्राप्त हो जाने पर भी आत्मा नष्ट नहीं होता अर्थात् दुर्बलतादि अवस्था को प्राप्त नहीं होता ।

यहाँ हन्ति क्रिया का अर्थ पुनरुक्तिदोष से बचने के लिये विपरीत परिणाम समझना चाहिये, इसलिये यह अर्थ हुआ कि आत्मा अपने स्वरूप से बदलता नहीं।

इस मन्त्र में लौकिक वस्तुओं में होनेवाले छः भावविकारों का आत्मा में अभाव दिखलाया जाता है। आत्मा सब प्रकार के विकारों से रहित है, यह इस मन्त्र का वाक्यार्थ है।

ऐसा होने के कारण वे दोनों ही (आत्मस्वरूप को) नहीं जानते। इस प्रकार पूर्व मन्त्र से इसका सम्बन्ध है ॥ २० ॥

‘य एनं वेत्ति हन्तारम्’—इस मन्त्र से ‘आत्मा हननक्रिया का कर्ता और कर्म नहीं है’—यह प्रतिज्ञा करके, तथा ‘न जायते’ इस मन्त्र से आत्मा की निर्विकारता के हेतु को बतलाकर, अब प्रतिज्ञापूर्वक कहे हुए अर्थ का उपसंहार करते हैं—

तात्पर्य पढ़ें

न जायते न उत्पद्यते जनिलक्षणा वस्तुविक्रिया न आत्मनो विद्यते इत्यर्थः। न म्रियते वा। वाशब्दः चार्थे।

न म्रियते च इति अन्त्या विनाशलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते।

कदाचिद् शब्दः सर्वविक्रियाप्रतिषेधैः सम्बध्यते न कदाचिद् जायते, न कदाचिद् म्रियते, इति एवम्।

यस्माद् अयम् आत्मा भूत्वा भवनक्रियाम् अनुभूय पश्चाद् अभविता अभावं गन्ता न भूयः पुनः तस्माद् न म्रियते। यो हि भूत्वा न भविता स म्रियते इति उच्यते लोके।

वाशब्दाद् नशब्दात् च अयम् आत्मा अभूत्वा भविता वा देहवद् न भूयः पुनः तस्माद् न जायते। यो हि अभूत्वा भविता स जायते इति उच्यते, न एवम् आत्मा अतो न जायते।

यस्माद् एवं तस्माद् अजः, यस्माद् न म्रियते तस्माद् नित्यः च।

यद्यपि आद्यन्तयोः विक्रिययोः प्रतिषेधे सर्वा विक्रियाः प्रतिषिद्धा भवन्ति तथापि मध्यभाविनीनां विक्रियाणां स्वशब्दैः एव तदर्थैः प्रतिषेधः कर्तव्य इति अनुक्तानाम् अपि यौवनादिसमस्तविक्रियाणां प्रतिषेधो यथा स्याद् इति आह ‘शाश्वत’ इत्यादिना।

शाश्वत इति अपक्षयलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते शश्वद्भवः शाश्वतः । न अपक्षीयते स्वरूपेण निरवयवत्वाद् निर्गुणत्वात् च न अपि गुणक्षयेण अपक्षयः ।

अपक्षयविपरीता अपि वृद्धिलक्षणा विक्रिया प्रतिषिध्यते पुराण इति। यो हि अवयवागमेन उपचीयते स वर्धते अभिनव इति च उच्यते। अयं तु आत्मा निरवयवत्वात् पुरा अपि नव एव इति पुराणो न वर्धते इत्यर्थः।

तथा न हन्यते न विपरिणम्यते हन्यमाने

विपरिणम्यमाने अपि शरीरे ।

हन्तिः अत्र विपरिणामार्थो द्रष्टव्यः अपुन-

रुक्तायै न विपरिणम्यते इत्यर्थः ।

अस्मिन् मन्त्रे षड्भावविकारा लौकिक-वस्तुविक्रिया आत्मनि प्रतिषिध्यन्ते। सर्व-प्रकारविक्रियारहित आत्मा इति वाक्यार्थः।

‘य एनं वेत्ति हन्तारम्’ इति अनेन मन्त्रेण हननक्रियायाः कर्ता कर्म च न भवति इति प्रतिज्ञाय ‘न जायते’ इति अनेन अविक्रियत्वे हेतुम् उक्त्वा प्रतिज्ञातार्थम् उपसंहरति—