तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ २६ ॥
atha cainaṃ nityajātaṃ nityaṃ vā manyase mṛtam .
tathāpi tvaṃ mahābāho naivaṃ śocitumarhasi .. 26 ..
‘अथ’ ‘च’ ये दोनों अव्यय औपचारिक स्वीकृति के बोधक हैं।
यदि तू इस आत्मा को सदा जन्मनेवाला अर्थात् लोकप्रसिद्धिके अनुसार अनेक शरीरों की प्रत्येक उत्पत्ति के साथ-साथ उत्पन्न हुआ माने तथा उनके प्रत्येक विनाश के साथ-साथ सदा नष्ट हुआ माने।
तो भी अर्थात् ऐसे नित्य जन्मने और नित्य मरनेवाले आत्मा के निमित्त भी हे महाबाहो! तुझे इस प्रकार शोक करना उचित नहीं है; क्योंकि जन्मनेवाले का मरण और मरनेवाले का जन्म, यह दोनों अवश्य ही होनेवाले हैं ॥ २६ ॥
ऐसा होनेसे—
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अथ च इति अभ्युपगमार्थः ।
एनं प्रकृतम् आत्मानं नित्यजातं लोकप्रसिद्ध्या प्रत्यनेकशरीरोत्पत्तिं जातो जात इति मन्यसे। तथा प्रतितद्विनाशं नित्यं वा मन्यसे मृतं मृतो मृत इति।
तथापि तथाभाविनि अपि आत्मनि त्वं महाबाहो एवं न शोचितुम् अर्हसि, जन्मवतो नाशो नाशवतो जन्म च इति एतौ अवश्यं भाविनौ इति ॥ २६ ॥