अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ २८ ॥
avyaktādīni bhūtāni vyaktamadhyāni bhārata .
avyaktanidhanānyeva tatra kā paridevanā .. 28 ..
अव्यक्त यानी न दीखना—उपलब्ध न होना ही जिनकी आदि है ऐसे ये कार्य-करण के संघातरूप पुत्र, मित्र आदि समस्त भूत अव्यक्तादि हैं अर्थात् जन्म से पहले ये सब अदृश्य थे।
उत्पन्न होकर मरण से पहले-पहल बीचमें व्यक्त हैं—दृश्य हैं। और पुनः अव्यक्तनिधन हैं, अदृश्य होना ही जिनका निधन यानी मरण है उनको अव्यक्तनिधन कहते हैं, अभिप्राय यह कि मरने के बाद भी ये सब अदृश्य हो ही जाते हैं।
ऐसे ही कहा भी है कि ‘यह भूतसंघात अदर्शनसे आया और पुनः अदृश्य हो गया। न वह तेरा है और न तू उसका है, व्यर्थ ही शोक किस लिये?’
सुतरां इनके विषयमें अर्थात् बिना हुए ही दीखने और नष्ट होनेवाले भ्रान्तिरूप भूतों के विषयमें चिन्ता ही क्या है ? रोना–पीटना भी किस लिये है ? ॥ २८ ॥
जिसका प्रकरण चल रहा है यह आत्मतत्त्व दुर्विज्ञेय है । सर्वसाधारणको भ्रान्ति करा देनेवाले विषयमें केवल एक तुझे ही क्या उलाहना दूँ ? यह आत्मा दुर्विज्ञेय कैसे है ? सो कहते हैं—
तात्पर्य पढ़ें
अव्यक्तानि अव्यक्तम् अदर्शनम् अनुपलब्धिः आदिः येषां भूतानां पुत्रमित्रादि कार्यकरणसङ्घातात्मकानां तानि अव्यक्तादीनि भूतानि प्राग् उत्पत्तेः ।
उत्पन्नानि च प्राग् मरणाद् व्यक्तमध्यानि। अव्यक्तनिधनानि एव पुनः अव्यक्तम् अदर्शनं निधनं मरणं येषां तानि अव्यक्तनिधनानि मरणाद् ऊर्ध्वम् अपि अव्यक्तताम् एव प्रतिपद्यन्ते इत्यर्थः।
तथा च उक्तम्—‘अदर्शनादापतितः पुनश्चादर्शनं’ गतः । नासौ तव न तस्य त्वं वृथा का परिदेवना ॥’ (महा० स्त्री० २। १३) इति।
तत्र का परिदेवना को वा प्रलापः अदृष्टदृष्ट-प्रणष्टभ्रान्तिभूतेषु भूतेषु इत्यर्थः ॥ २८ ॥
दुर्विज्ञेयः अयं प्रकृत आत्मा किं त्वाम् एव एकम् उपालभे साधारणे भ्रान्तिनिमित्ते । कथं दुर्विज्ञेयः अयम् आत्मा इति आह—